Monday, July 6, 2026

अब हरियाणा के नहरी पानी में राजस्थान भी होगा हिस्सेदार


अशोक मिश्र

हरियाणा को सदियों से हरियाली प्रदेश कहा जाता रहा है। लेकिन आज हरियाणा की जड़ें प्यास से दरक रही हैं। भाखड़ा-नांगल और पश्चिमी यमुना नहर के भरोसे खड़ा हरियाणा अब पानी के तीन मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है-अपने लिए घटती उपलब्धता, पड़ोसियों से हक की जंग और जमीन के नीचे सूखता जल भंडार। इसके बावजूद केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नई दिल्ली में हरियाणा और राजस्थान सरकार के बीच यमुना जल परियोजना को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। 

यमुना जल परियोजना के अंतर्गत राजस्थान के हिस्से का 577 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) यमुना जल हथिनीकुंड बैराज से लगभग 295.5 किमी लंबी भूमिगत पाइपलाइन प्रणाली से चूरू जिले के हंसियावास जलाशय तक पहुंचाया जाएगा। इस परियोजना की अनुमानित लागत 34,102 करोड़ रुपये है। अब जब राजस्थान के साथ समझौता हो गया है, तो स्वाभाविक है कि हरियाणा को 577 एमसीएम पानी देना ही पड़ेगा। जबकि हरियाणा की स्वयं हालत यह है कि नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुंचता तो किसान समर्सिबल की गहराई बढ़ाता है और हर फीट नीचे जाता जलस्तर आने वाली नस्लों के हिस्से का पानी चुरा रहा है। 

केंद्रीय भूजल बोर्ड की मानें तो हरियाणा के 141 ब्लॉक में से 88 ओवर-एक्सप्लॉइटेड हैं यानी जितना पानी जमीन उगलती है, उससे डेढ़ गुना हर साल खींच लिया जाता है। धान-गेहूं का चक्र, जो कभी हरित क्रांति का नायक था, अब विलेन बन गया है। एक किलो चावल के लिए हरियाणा चार हजार लीटर पानी खर्च करता है, जबकि पंजाब के पास नदियां हैं, हरियाणा के पास सिर्फ नहरों का हक। एसवाईएल नहर का मसला चार दशक से सुप्रीम कोर्ट की फाइलों और सियासी भाषणों में उलझा है। 

नतीजा यह है कि 214 किमी लंबी नहर का हरियाणा वाला 91 किमी हिस्सा सूखा खड़ा है। उधर यमुना पर दिल्ली का दबाव अलग है। हथिनीकुंड बैराज से तयशुदा नौ हजार क्यूसेक में से गर्मियों में आधा भी नसीब नहीं होता। दिल्ली की प्यास और ऊपरी राज्यों की खींचतान के बीच हरियाणा का हिस्सा सबसे पहले कटता है। दक्षिण हरियाणा महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, नूंह तो वैसे ही डार्क जोन हैं। हरियाणा का 80 फीसदी पानी खेती में जाता है और खेती का 70 फीसदी धान-गेहूं में। 

हरियाणा में नहरें सूखीं तो खेत बिकेंगे, खेत बिके तो गांव उजड़ेंगे और गांव उजड़े तो शहरों में पानी के लिए मारामारी मचेगी। जब तक फसल का पैटर्न नहीं बदलेगा, बूंद-बूंद का हिसाब नहीं होगा और पड़ोसी को दुश्मन नहीं, हिस्सेदार माना जाएगा, तब तक हर बजट में नहर निकलेगी, पर खेत तक पानी नहीं पहुंचेगा। क्योंकि प्यासे को नक्शा नहीं, नल चाहिए। यह नल ही हरियाणावासियों को जीवनदान दे सकता है।

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