बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
वैशाली गणराज्य की विजय पताका चतुर्दिक फहरा रही थी। वैशाली राज्य के दंडनायक उग्रतेजा जिधर से घूम जाता, उस ओर सबके सिर भय से झुक जाते थे। लोगों में दंडनायक उग्रतेजा का इतना भय था कि बड़े बडेÞ राजा भी उसके सामने टिकने का साहस नहीं कर सकते थे। उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध वैशाली नगर में अपने संघ के भिक्षुओं के साथ भ्रमण कर रहे थे।
महात्मा बुद्ध का मुखमंडल चमक रहा था। सब मौन साधे तथागत की वाणी का श्रवण कर रहे थे। इतने में संघ के आश्रम में तेज गति से अश्व पर सवार दंडनायक उग्रतेजा ने प्रवेश किया। कुछ दूर चलने के बाद दंडनायक पदाति चलकर गौतम बुद्ध के सामने प्रस्तुत हुए। तथागत ने अपनी दृष्टि उठाई। दंडनायक ने विनीत स्वर में कहा, प्रभु! भिक्षु संघ का स्वागत करने का सौभाग्य मांगने आपके समक्ष आया है यह जन आपके पास।
महात्मा बुद्ध ने शांत स्वर में कहा, भंते! बुद्ध किसी कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं करते हैं। किसी भी बुद्ध ने आज तक किसी कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं की है। यह सुनकर जन समूह आश्चर्यचकित रह गया। लोगों को लगा कि अभी थोड़ी देर में बुद्ध का सिर कटकर नीचे गिर जाएगा।
दंडनायक ने बुद्ध को सिर नवाया और वापस लौट पड़ा। जब वह अपने शिविर में पहुंचा, तब तक यह बात पूरे वैशाली में फैल चुकी थी कि उग्रतेजा को भिक्षुक ने कृपण कहा है। एक सैनिक ने कहा कि उस भिक्षुक का सिर काट लूं। दंडनायक ने सैनिक को डपट दिया। दंडनायक घर पहुंचा और उसने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और बुद्ध के आश्रम में आ खड़ा हुआ। अगले दिन संघ से भिक्षुओं में एक भिक्षु और एक भिक्षुणी की बढ़ोतरी हो गई।
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