बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध और उनका परम प्रिय शिष्य एक जगह पर वार्तालाप कर रहे थे। आनंद ने कहा, आर्य श्रेष्ठ! श्रावस्ती परंपरावादियों का गढ़ है। वहां जाने की अपेक्षा राजगृह जाना ज्यादा उचित होगा क्योंकि राजगृह में संघ का विस्तार हो रहा है, लेकिन श्रावस्ती में तो अभी संघ की नींव ही पड़ी है। आनंद की बात सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद! बिना संघर्ष किए कुछ भी उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकती है।धर्म का प्रचार करना है, तो संघर्ष करना ही होगा। इसलिए श्रावस्ती जाना उचित होगा। जब लोगों को यह समाचार मिला कि तथागत श्रावस्ती आ रहे हैं, तो लोगों से उत्साह का संचार हुआ। उधर, महात्मा महात्मा बुद्ध के विरोधियों ने भी अश्वलायन के नेतृत्व में अपना मोर्चा जमा लिया।
नियत समय पर अश्वलायन अपने साथियों के साथ महात्मा महात्मा बुद्ध के समक्ष प्रस्तुत हुआ और भर्त्सना करते हुए कहा कि तात! आप चारों वर्णों के उद्धार की बात करते हैं। क्या ब्राह्मणों के अलावा किसी को धर्म दीक्षा देने का अधिकार है? तथागत ने स्नेहपूर्वक कहा कि तात! ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का आधार क्या है?
अश्वलायन ने कहा कि ब्राह्मणों का ज्ञान, तप, निर्लोभ निरहंकारिता, साधना और ब्रह्मवर्चस ही उनकी श्रेष्ठता का आधार है। महात्मा बुद्ध ने फिर कहा, क्या ब्राह्मण चोरी नहीं करते, क्या ब्राह्मण झूठ नहीं बोलते। ब्राह्मण अगर नीच कार्य करेगा, तो क्या वह पापी नहीं माना जाएगा। श्रेष्ठ वही है जिसका मन निर्मल है। भले ही वह किसी भी वर्ण में पैदा हुआ हो। अब अश्वलायन के पास महात्मा बुद्ध की बात का कोई जवाब नहीं था। अश्वलायन ने बुद्ध के मत को स्वीकार कर लिया। बाद में वह धर्म चक्र प्रवर्तन कार्य में बहुत अधिक सहायक साबित हुआ।
No comments:
Post a Comment