Friday, August 14, 2026

बुद्ध को गुरु बनाने में मुझे कोई संकोच नहीं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो कुछ दिखता है, उसमें दुख छिपा हुआ है। जो कुछ दृश्यमान है, वह जल्दी ही नष्ट हो जाने वाला है। ऐसी स्थिति में जब सब कुछ नष्ट हो जाने वाला है, तो उसके फंदे में पड़ा ही क्यों जाए। तपस्या या उपवास से इन स्थितियों को बदला नहीं जा सकता है। तो फिर तपस्या या उपवास करने का कोई मतलब भी नहीं है। इन स्थितियों से छुटकारा केवल मन से ही पाया जा सकता है। इसलिए मन को शुद्ध रखना चाहिए। 

उन दिनों मगध में कस्सप और नादिंकस्सप नाम के दो अत्यंत प्रसिद्ध साधु रहते थे। इन दोनों साधुओं की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। इनके पांच-पांच सौ शिष्य थे। कस्सप और नादिंकस्सप का आदर मगध नरेश बिंबसार भी करते थे। एक दिन जब महात्मा बुद्ध अपने प्रवचन दे रहे थे, तो इन दोनों साधुओं ने भी उपदेश का श्रवण किया। इन दोनों साधुओं को महात्मा बुद्ध की बात सही लगी। 

इन दोनों ने बुद्ध को अपना गुरु बना लिया। अब यह दोनों साधु महात्मा बुद्ध के साथ ही रहने लगे। कुछ दिनों बाद संयोग से महात्मा बुद्ध बिंबसार की राजधानी राजगृह पहुंचे तो तथागत के साथ इन दोनों साधुओं को देखकर उन्हें बहुत आश्यर्य हुआ। उन्होंने महात्मा बुद्ध के साथ-साथ इन दोनों साधुओं का भी बड़े आदर के साथ स्वागत किया। एकांत मिलने पर बिंबसार ने कस्सप से पूछा-मेरी समझ में यह नहीं  आ रहा है कि एक वृद्ध साधु किसी नवयुवक का शिष्य कैसे हो सकता है। 

इस पर कस्सप ने जवाब देते हुए कहा कि बुद्ध ने हृदय को निर्मल रखते हुए लोक कल्याण की भावना से काम करने का रास्ता सुझाया जो मुझे उचित लगा। इसलिए मुझे बुद्ध को अपना गुरु बनाने में किसी प्रकार का संकोच नहीं है।


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