Sunday, September 6, 2026

बिंदुमती बोली, मैंने कभी किसी में भेद नहीं किया

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बौद्ध ग्रंथों और लोककथाओं में पाटलिपुत्र के संबंध में एक बड़ी ही रोचक घटना बताई गई है। उस समय सम्राट अशोक पाटलिपुत्र पर शासन कर रहे थे। कुछ लोग इस घटना के समय महात्मा बुद्ध की उपस्थिति बताते हैं, लेकिन सम्राट अशोक के शासनकाल से लगभग 180 साल पहले ही महात्मा बुद्ध परिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बरसात के दिनों में पाटलिपुत्र के किनारे से होकर बहने वाली भागीरथी नदी के किनारे सम्राट अशोक अपने मंत्रियों के साथ खड़े प्रकृति का आनंद उठा रहे थे। 

तभी नदी का जल नगर की ओर बढ़ने लगा। ऐसा लगा कि गंगा नदी पूरी पाटलिपुत्र को डुबोकर ही मानेगी। तब सम्राट अशोक ने अपने मंत्रियों से कहा कि क्या हमारे राज्य में कोई ऐसा तपस्वी नहीं है, जो अपने तपोबल से वेगवती भागीरथी की धारा को उल्टा प्रवाहित कर दे। यह बात जब नगरवधू बिंदुमती ने सुना तो उसने कहा कि मैं अपने तपोबल से गंगा की धारा को लौटने को मजबूर कर सकती हूं। 

अशोक ने कहा कि तुम जैसी स्त्री जो शील और सदाचार से सर्वथा रहित है, वह ऐसा कैसे कर सकती है। सम्राट अशोक की अनुमति से बिंदुमती ने पूजा की थाल सजाया और उसने मन ही मन ईश्वर और गंगा मैया को साक्षी मानकर एक 'सत्य प्रतिज्ञा' की, हे गंगा मैया! यदि यह सत्य है कि मैंने अपने जीवन में अपने द्वार पर आने वाले हर व्यक्ति को समान माना है; चाहे वह कोई राजा हो, चोर हो, ब्राह्मण हो या कोई नीच जाति का व्यक्ति हो— मैंने कभी किसी में भेद नहीं किया और बिना किसी भेदभाव के अपनी कला और कर्तव्य का पालन किया है। यदि मेरा यह समभाव और व्यावसायिक सत्य निष्कलंक है, तो तुम उलटी दिशा में बहने लगो। 

तभी चमत्कार हुआ और गंगा वापस लौट गईं। अशोक ने उस नगरवधू के चरणों में झुकते हुए पूछा, आपने यह सब कैसे किया। बिंदुमती ने कहा कि सत्य और कर्तव्य निष्ठा से यह संभव हुआ है।

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