अशोक मिश्र
अराजक तत्वों के यही शरणगाह बनते हैं। दिन के उजाले में ये जगहें विकास की उम्मीद जगाती हैं, लेकिन शाम ढलते ही यही सुनसान जगहें एक डर में बदल जाती हैं। यही वह जगहें बन जाती हैं जहाँ अंधेरा केवल रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए एक कवच बन जाता है। उधर से गुजरने वाले राहगीर, काम से लौटती महिलाएं, स्कूल से आते-जाते बच्चे, सबके मन में एक अनजाना भय रहता है। लूटपाट, हमले और महिलाओं के साथ होने वाले जघन्य अपराध अक्सर इसी सुनसान का फायदा उठाकर किए जाते हैं।
ग्रेटर फरीदाबाद में अभी दो-तीन दिन पहले हुई घटना ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। एक नाबालिग बच्ची और उसके नाबालिग दोस्त के साथ हुई दरिंदगी ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी बेटियां अपने ही शहर में, अपने ही घर के आसपास सुरक्षित नहीं हैं। यह केवल एक इलाके की घटना नहीं है। हरियाणा के कई जिलों से गुरुग्राम, सोनीपत, पलवल, हिसार तक से ऐसी खबरें आती रहती हैं जहाँ अवैध रूप से बसी कॉलोनियों, निमार्णाधीन साइटों या वर्षों से खाली पड़े मकानों को अपराधी अपना ठिकाना बना लेते हैं। इन जगहों की जानकारी स्थानीय स्तर पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को ज्यादा होती है।
वे जानते हैं कि कहाँ रोशनी नहीं है, कहाँ कोई आता-जाता नहीं, कहाँ पुलिस की गाड़ी देर से पहुँचती है। सच तो यह है कि सरकार हर सुनसान गली, हर खाली मकान पर पहरा नहीं बिठा सकती। पुलिस की संख्या सीमित है और शहर रोज फैल रहा है। बस, इसी बात का फायदा उठाते हैं आपराधिक प्रवृत्ति के लोग। वह जानते हैं कि अपराध करके वह इन अंधेरी जगहों पर अपने को छिपा सकते हैं।
अक्सर लोग सोचते हैं कि खाली पड़ा मकान पड़ोसी की समस्या है, सुनसान कॉलोनी बिल्डर की जिम्मेदारी है। लेकिन जब उसी सुनसान में किसी की जिंदगी तबाह होती है, तो वह पूरे समाज का जख्म बन जाती है। खाली पड़े मकानों की सूची स्थानीय थाने को देना, वहाँ सोलर लाइट लगवाना, सीसीटीवी का एक छोटा सा नेटवर्क बनाना, ये छोटे कदम बहुत बड़ा फर्क ला सकते हैं। बिल्डर और कॉलोनाइजर जो कॉलोनी काटकर चले जाते हैं, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए कि जब तक पूरी बसावट नहीं होती, वहाँ सुरक्षा और रोशनी की व्यवस्था वही देखेंगे।
No comments:
Post a Comment