Wednesday, May 20, 2026

भिक्षुक कहता था, कर भला तो हो भला

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हमारे देश में ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया की सभी सभ्यताओं में यह बात कही जाती है कि किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए। जहां तक संभव हो, हर किसी के बारे में अच्छा सोचना चाहिए और अच्छा करना चाहिए। हमारे देश में कहा गया है कि जो व्यक्ति किसी के साथ भला करता है, तो उसका भी भला ही होता है। इस संबंध में एक रोचक प्रसंग है। किसी राज्य में एक भिक्षुक रहता था। 

वह सुबह-शाम भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करता था। जब भी वह किसी भी घर से भिक्षा मांगने जाता था, तो वह केवल एक ही बात कहता था-कर भला तो हो भला। इसके अलावा वह कुछ नहीं कहता था। जिसको भिक्षा देनी होती थी, वह आकर उसके भिक्षा पात्र में डाल देता था। 

नहीं तो विनम्रतापूर्वक मना कर देता था।  जिस गांव में वह अक्सर भिक्षा मांगने जाता था, उस गांव में एक महिला रहती थी। वह भिक्षुक के ‘कर भला तो हो भला’ वाले वाक्य पर कहा करती थी कि यह सब बेकार की बातें हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूं जो बुरे हैं, लेकिन उनका ही भला होता है। एक दिन उसने  भिक्षा मांगने पर भिक्षुक को दो लड्डू दिए जिसमें उसने जहर लगा दिया था। 

भिक्षुक उस लड्डू को लेकर अपनी कुटिया में पहुंचा, तो उसने देखा कि एक यात्री थका और प्यासा आया है। उसने दोनों लड्डू उस यात्री को दे दिया। लड्डू खाते ही यात्री की मौत हो गई। राजा के सिपाही उस भिक्षुक को पकड़कर ले गए और राजा के सामने पेश कर दिया। 

भिक्षुक ने लड्डू मिलने की कथा बताई। उस महिला को भी पकड़कर लाया गया। महिला ने उस यात्री को देखा, तो विलाप करने लगी। असल में वह यात्री उसका ही बेटा था, जो परदेस से लौट रहा था। राजा ने उस भिक्षुक को स्वतंत्र कर दिया और महिला को कैद खाने में डाल दिया।

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