Tuesday, July 7, 2026

गुटबाजी पर लगाम लगाने की कोशिश में जुटे हरियाणा के नए प्रदेश प्रभारी

अशोक मिश्र

हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी बनाए गए संजय सतीशचंद्र दत्त इन दिनों काफी सक्रिय हैं। पिछले कई वर्षों से कांग्रेस में छाई सुस्ती शायद अब छटने लगी है। वैसे तो जब बीके हरिप्रसाद हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी बनाए गए थे, उन्होंने भी सक्रियता शुरुआती दौर में दिखाई थी, लेकिन बाद में वह भी सुस्त पड़ गए थे। संजय की सक्रियता कुछ अलग किस्म की है। प्रभारी बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं से अलग-अलग बात की। 

पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा से लेकर पूर्व मंत्री कुमारी सैलजा तक उन्होंने बातचीत की। संगठन तैयार करने में किस किस्म की कठिनाइयां हैं, इसके बारे में जाना, कैसे तैयार किए जाए संगठन, इस संदर्भ में सबसे बातचीत की। पद संभालते ही उन्होंने जिलों का दौरा शुरू किया। कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद किया और उनकी शिकायतें सुनीं। अब आठ जुलाई को उन्होंने चंडीगढ़ में हाई कमान को विश्वास में लेने के बाद प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जनरल बोर्ड की बैठक बुलाई है। जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं से सलाह मशविरा करने के बाद यह कदम उठाया है, उससे यह बात साफ हो जाती है कि कांग्रेस हाई कमान किसी एक गुट के नेतृत्व में प्रदेश कांग्रेस को सौंपने की इच्छा नहीं रखता है।

 इतने कम समय में नए प्रदेश प्रभारी संजय ने जिस तरह जिलों का दौरा करके कार्यकर्ताओं से संपर्क साधा है और सभी गुटों के नेताओं से विचार विमर्श किया है, उससे लगता है कि वह प्रदेश कांग्रेस के सभी गुटों को एक मंच पर लाकर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन खड़ा करना चाहते हैं। आठ जुलाई को चंडीगढ़ में होने वाली जनरल बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने सभी गुट के नेताओं, वरिष्ठ कांग्रेसियों के साथ-साथ जिला ब्लाक स्तर के नेताओं को बुलाकर यह संकेत दे दिया है कि वह अब प्रदेश कांग्रेस में किसी एक की चलने नहीं देंगे। बैठक में चुनाव हारने वाले वाले उम्मीदवारों को भी न्यौता दिया गया है। 

हालांकि चुनौती आसान नहीं है। हरियाणा में कांग्रेस के सामने भाजपा की मजबूत मशीनरी और सत्ता का लाभ है। साथ ही पार्टी के भीतर गुटों को एक मंच पर लाना सबसे कठिन काम होगा। पर दत्त की शुरुआती सक्रियता से यह संकेत मिला है कि वह टकराव नहीं, समन्वय चाहते हैं। अगर वह सभी धड़ों को साथ लेकर चल पाते हैं और कार्यकर्ताओं को टिकट के लालच के बजाय संघर्ष की राजनीति के लिए तैयार कर पाते हैं, तो कांग्रेस फिर से मुख्य मुकाबले में आ सकती है। 

राजनीति में प्रतीकात्मक बदलाव से ज्यादा जरूरी जमीनी बदलाव होता है। अगर यह ऊर्जा चुनाव तक बनी रही और संगठन बूथ स्तर तक मजबूत हुआ, तो हरियाणा की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर निर्णायक भूमिका में नजर आएगी।

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