बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
भारत में जब किसी बहुत बुद्धिमान, तेज दिमाग या असाधारण व्यक्ति को लोग देखते हैं, तो कह उठते हैं कि यह तो बड़ा अफलातून है। अफलातून का वास्तविक नाम प्लेटो था। प्लेटो का जन्म लगभग 427 ईसा पूर्व प्राचीन यूनान में हुआ था। वे केवल दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि गणित, राजनीति, नैतिकता, शिक्षा और मानव जीवन पर गहरी सोच रखने वाले महान चिंतक थे।वह शुकरात के शिष्य थे। अरबी और फारसी भाषाओं में प्लेटो को अफलातून कहा गया और वहीं से यह शब्द भारत तक पहुँचा। उन्होंने अपने जीवनकाल में एक स्कूल खोला था जिसका नाम था एकेडमी। कहते हैं कि प्लेटो से मिलने दुनिया भर से विद्वान आते थे। सभी लोग उससे कुछ न कुछ सीखते रहते थे। लोग प्लेटो को अत्यधिक ज्ञानी मानते थे, लेकिन प्लेटो का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो सकता है क्योंकि वह सब कुछ नहीं जान सकता है।
एक दिन की बात है। प्लेटो के एक मित्र ने कहा कि मुझे आपकी एक बात समझ में नहीं आती है। सारे लोग आपसे ज्ञान लेने आते हैं। वह यहां से कुछ न कुछ सीखकर जाते हैं, लेकिन आप उनसे ही सवाल पूछने लगते हैं। छोटी से छोटी जानकारी हासिल करने का प्रयास करते हैं। जबकि आप खुद विद्वान हैं। ऐसी स्थिति में आपको भला इन लोगों से सीखने की क्या जरूरत है।
यह सुनकर प्लेटो बड़ी जोर जोर से हंसने लगे। उन्होंने मित्र को समझाते हुए कहा कि हर आदमी अपने जीवन में सब कुछ नहीं सीख सकता है। हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ ऐसी जानकारी होती है, जो दूसरों के पास नहीं होती है। मैं वही जानकारी हासिल करने का प्रयास करता हूं। हमें एक विद्यार्थी की तरह कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए।
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