Thursday, September 10, 2026

संवाद और आपसी समझ से दूर किया जा सकता है भाषा विवाद

अशोक मिश्र

फरीदाबाद में महिला आयोग की सोमवार को शुरू हुई दो दिवसीय कार्यशाला ‘शी इज ए चेंज मेकर’ में केरल विधानसभा की उपाध्यक्ष और कुछ महिला विधायकों द्वारा हिंदी में संचालन का विरोध किया गया। यह उस लंबे भाषा-विवाद की एक छोटी सी झलक है जो आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति और समाज के साथ चल रहा है। केरलम विधानसभा की उपाध्यक्ष सहित कई महिला विधायकों ने कार्यक्रम छोड़ दिया क्योंकि सत्र मुख्य रूप से हिंदी में चलाए जा रहे थे और अनुवाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। 

विरोध करने वाली विधायकों ने कहा कि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के प्रतिभागियों के लिए सामग्री समझना कठिन हो गया था। ऐसे विवाद की जड़ में इतिहास है। उससे भी ज्यादा इस मामले में गलतफहमी है। संविधान में कहीं भी हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है, अनुच्छेद 343 में उसे संघ की राजभाषा कहा गया है और अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में जारी रखने की व्यवस्था की गई थी। 


1965 में जब अंग्रेजी को हटाने की बात आई तो तमिलनाडु में बड़ा आंदोलन हुआ और अंतत: त्रिभाषा फार्मूला लाया गया। उत्तर भारत ने हिंदी को स्वाभाविक रूप से अपना लिया क्योंकि वह उसकी बोलियों के करीब थी, जबकि दक्षिण में हिंदी को एक नई, ऊपर से थोपी गई भाषा के रूप में देखा गया। वहीं से यह भावना बनी कि हिंदी थोपने का अर्थ है उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व थोपना। केरल की उपाध्यक्ष और अन्य विधायकों को हिंदी न समझ पाने की तकलीफ वास्तविक हो सकती है, उन्हें सच में हिंदी समझने में कठिनाई हुई हो, लेकिन उस वास्तविक कठिनाई को तुरंत एक राजनीतिक नैरेटिव में बदल देना ही राजनीति है। 

उन्हें ऐसा करने से हर हालत में बचना चाहिए था। हिंदी-भाषी क्षेत्रों में कभी-कभी यह भावना रहती है कि हिंदी सबसे व्यापक भाषा है इसलिए उसे राष्ट्र की एकता का माध्यम बनाना स्वाभाविक है। दोनों पक्षों के पास तर्क हैं। एक ओर विशाल आबादी हिंदी समझती या बोलती है, दूसरी ओर देश में बाईस अनुसूचित भाषाएं हैं। कई राज्य अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। जब राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में केवल एक भाषा का इस्तेमाल होता है तो गैर-हिंदी भाषी प्रतिनिधि खुद को बाहर महसूस करते हैं। 


यह असुविधा वास्तविक है। इस समस्या का समाधान संभव है लेकिन इसके लिए व्यावहारिक सोच की जरूरत है। राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से बहुभाषी व्यवस्था होनी चाहिए। हिंदी के साथ अंग्रेजी और जरूरत पड़ने पर अन्य प्रमुख भाषाओं में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। प्रौद्योगिकी आज इतनी आगे बढ़ चुकी है कि वास्तविक समय का अनुवाद संभव है। फरीदाबाद वाली घटना याद दिलाती है कि राष्ट्रीय मंचों पर सबको बराबर भागीदारी का मौका मिलना चाहिए। 

जब प्रतिभागी अपनी बात समझ सकें और रख सकें तभी कार्यक्रम सार्थक बनते हैं। भाषाई संवेदनशीलता और व्यावहारिक व्यवस्था दोनों अपनाकर इस पुराने विवाद को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। राजनीति अगर इसे और उलझाएगी तो समस्या बनी रहेगी, अगर संवाद और सुविधा पर ध्यान देगी तो समाधान की दिशा खुलेगी।

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