अशोक मिश्र
किसी भी महिला की गर्भावस्था की अवधि उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस समय महिला को सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की होती है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ रहे। मानसिक शांति के साथ-साथ परिवार का सहयोग और आर्थिक मजबूती बहुत जरूरी होती है। यदि महिला कार्यरत है, तो उसे सरकार या जिस संस्था में वह कार्यरत है, उससे भी उसे भरपूर सहयोग मिले। स्थायी कर्मचारियों को जो गर्भावस्था के दौरान सुविधाएं मिलती हैं, वह गर्भवती संविदा कर्मियों को भी मिले, ऐसी उम्मीद करना कोई गलत भी नहीं है।लेकिन हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चांदपुरा गांव के वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में संविदा पर कार्यरत शिक्षिका को इस मामले में निराश ही होना पड़ा। शिक्षिका की नियुक्ति 16 मार्च 2024 को हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई थी। नौकरी के दौरान उसे गर्भावस्था संबंधी गंभीर समस्याएं हो गईं। चिकित्सकों ने उसे नौ महीने तक बेड रेस्ट की सलाह दी। शिक्षिका ने डॉक्टर की सलाह के मुताबिक अपने विभाग से मेडिकल अवकाश मांगा, लेकिन उसे मेडिकल अवकाश देने की जगह 16 मार्च 2026 को नौकरी से ही हटा दिया गया। जबकि दूसरे संविदा कर्मियों की नियुक्ति अवधि बढ़ा दी गई। 15 अप्रैल 2026 को शिक्षिका ने बच्चे को जन्म दिया और वह अपने निष्कासन के खिलाफ अदालत गई।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मां बनने की कीमत नौकरी नहीं हो सकती है। अदालत ने शिक्षिका की सेवा को बहाल करने के साथ-साथ अन्य सुविधाएं प्रदान करने का आदेश दिया है। हरियाणा समेत देश के कई राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विभागों में हजारों महिलाएं संविदा के आधार पर काम कर रही हैं। ये नर्सें, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षिका और क्लर्क सरकारी मशीनरी को चलाने में उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं जितनी नियमित कर्मचारी। फर्क सिर्फ इतना है कि इनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कई बार प्रबंधन गर्भावस्था की सूचना मिलते ही अनुबंध खत्म कर देता है। तर्क दिया जाता है कि संविदा की अवधि पूरी हो गई या पद की जरूरत नहीं रही।
पर संयोग इतना साफ होता है कि बर्खास्तगी का पत्र उसी महीने आता है जब महिला मातृत्व अवकाश मांगती है। समस्या यह भी है कि संविदा प्रणाली को लचीलेपन के नाम पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसमें सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान ही नहीं हैं। न पीएफ, न ईएसआई, न मातृत्व अवकाश। विभाग काम तो पूरा लेते हैं पर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। गर्भवती महिला को काम से निकाल देना न केवल अमानवीय है बल्कि उस विकास के दावे को भी खोखला करता है जिसमें हम बेटी बचाओ और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तो देश भी सशक्त और विकसित होगा।
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