बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध ने लगभग पचास वर्ष तक देश के विभिन्न भागों में घूम घूमकर लोककल्याण के लिए मानव धर्म का प्रचार-प्रसार किया। महात्मा बुद्ध एक स्थान पर बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं रुकते थे। वह लोगों को सत्य, अहिंसा और जरूरत से ज्यादा संचय न करने का उपदेश दिया करते थे। उनके संघ में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था। वह स्त्री-पुरुष और जातिगत भावना से ऊपर उठकर लोगों से व्यवहार किया करते थे।एक बार की बात है। भिक्षुक संघ में कुछ लोगों में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया कि प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा किसे दिया जाए? भिक्षुक संघ में जितने लोग थे, उतने मत थे। इस बारे में किसी ने कहा कि ब्राह्मण को पहला आसन और पहला भोजन दिया जाए क्योंकि जातीयता में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। किसी ने क्षत्रिय का पक्ष लिया, तो किसी ने वैश्य और दलित जातियों का।
सभी अपने-अपने विचारों पर अडिग था। कोई किसी से हार मानने वाला नहीं था। ऐसी स्थिति में बात जब बिगड़ने लगी, तो कुछ लोगों ने तथागत से इस बारे में सलाह लेने की बात कही। सब लोग महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। महात्मा बुद्ध ने सबकी बातें बड़ी गंभीरता से सुनी।
उन्होंने कहा कि संघ में जाति के आधार पर भेदभाव करना बहुत गलत है। संघ में जिसने पहले प्रवज्या ली है और लोककल्याण में जो सबसे आगे रहता हो, वही प्रथम आसन और भोजन का प्रथम परोसा पाने का हकदार है। भले ही वह किसी भी कुल या जाति में पैदा हुआ हो। बुद्ध की इस व्यवस्था से सभी लोग सहमत हो गए। इसका परिणाम यहहुआ कि बौद्ध का प्रसार भारत ही नहीं, भारत के बाहर भी हुआ।
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