अशोक मिश्रआज हम 80वां स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं। भारत को स्वाधीन कराने में हमारे देश के हजारों युवाओं ने अपना बलिदान दिया था। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समय तक चलने वाला स्वाधीनता संग्राम शायद भारत का ही था। ढाई तीन सौ साल के स्वाधीनता संग्राम में देश के हर कोने से लोगों ने अपना बलिदान दिया था। इन्हीं लोगों के बलिदान का परिणाम था कि अंग्रेजों को मजबूर होकर 15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आजाद करना पड़ा।
स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का भी योगदान कम नहीं था। भले ही वह उस समय पंजाब प्रांत का हिस्सा रहा हो। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा (तब पंजाब का हिस्सा) सबसे पहले बिगुल बजाने वाले क्षेत्रों में से एक था। 10 मई 1857 को मेरठ में क्रांति शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद अंबाला छावनी में भी विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी थी। अंबाला से निकली यह आग देखते ही देखते गुड़गांव, रोहतक, हिसार, करनाल और पानीपत तक फैल गई थी। रेवाड़ी के राव तुलाराम ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अपने छोटे से राज्य के साधनों से एक बड़ी सेना खड़ी की।
उन्होंने नारनौल के पास नसीबपुर में अंग्रेजी सेना से डटकर लोहा लिया। उनके साथ झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खान, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली खान ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। अंग्रेजों ने इन तीनों वीरों को दिल्ली के चांदनी चौक पर सरेआम फांसी दी थी, पर वे हरियाणा के लोगों के दिलों में अमर हो गए। महात्मा गांधी के आह्वान पर हरियाणा पूरी तरह से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया। 1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध में रोहतक, भिवानी और अंबाला में बड़ी हड़तालें हुईं। 1920-21 के असहयोग आंदोलन में हरियाणा के किसानों, छात्रों और वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
चौधरी छोटूराम, पंडित नेकीराम शर्मा, लाला दौलतराम और सर शादीलाल जैसे नेताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागृत किया। पंडित नेकीराम शर्मा को तो हरियाणा केसरी कहा जाता था, जिन्होंने भिवानी से संदेश नामक पत्र निकालकर अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंबाला, करनाल और रोहतक में नमक कानून तोड़ा गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो हरियाणा के हर जिले से जत्थे जेल गए। हिसार के हांसी में तो छात्रों ने तहसील पर तिरंगा फहरा दिया था।
आजाद हिंद फौज में भी हरियाणा के हजारों जवान शामिल थे, जिनमें मेजर सूरजमल जैसे अनेक वीरों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यही कारण है कि हरियाणा को वीरों और किसानों की धरती कहा जाता है, जिसने देश की आजादी के लिए अपना खून और पसीना दोनों दिया। स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में देश के अनेक प्रदेशों की तरह हरियाणा का भी नाम अग्रगण्य माना जाता है।
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