Wednesday, October 7, 2026

महिलाओं के साथ होने वाले अपराध को रोकने की समाज की भी जिम्मेदारी

 

अशोक मिश्र

जब किसी महिला या बच्ची के साथ दुराचार या यौन शोषण होता है, तो शरीर पर लगने वाले घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, लेकिन उसके मन पर जो दंश लगता है, वह आजीवन उसे सालता रहता है। वह बलात्कार की पीड़ा से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाती है। बलात्कारी किसी महिला या बच्ची के शरीर को ही घायल नहीं करता है, बल्कि वह पीड़िता की आत्मा को भी छलनी कर देता है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से, पार्कों से, बसों से जो खबरें आई हैं, उन्होंने फिर एक बार सबके भीतर कुछ तोड़ दिया है। एक के बाद एक लड़कियों के साथ हुई हैवानियत की घटनाएं मर्माहत करती हैं। 

दिल्ली जैसी शहर, जो कभी सपनों का शहर कहलाता था, अब अपनी ही बेटियों के लिए सबसे असुरक्षित जगह बनता जा रहा है। तभी सुप्रीम कोर्ट की गुस्से और बेबसी दोनों से भरी टिप्पणी सामने आती है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से साफ कहा कि अब सिर्फ अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना काफी नहीं है, अपराध को होने से रोकना भी पुलिस का काम है। अदालत ने कहा कि जब तक असामाजिक तत्वों के मन में यह डर पैदा नहीं होगा कि अब कुछ किया तो मारे जाएंगे, तब तक जघन्य अपराधों पर रोक लगाना संभव नहीं है। 

यह शब्द कानून की किताब से ज्यादा एक पिता के आक्रोश जैसे लगते हैं। लेकिन क्या यही एकमात्र तरीका है। अगर फांसी के डर से ही बलात्कार रुक जाते तो शायद दुनिया में कहीं भी यह अपराध नहीं होता। कानून किताब में लिखा एक शब्द है, पर उसे जमीन पर उतारती है पुलिस व्यवस्था, और हमारी व्यवस्था अक्सर तब जागती है, जब सब कुछ लुट चुका होता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी पर चोट की है कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से जमीनी स्तर पर महिलाएं सुरक्षित नहीं होंगी। हमें गश्त बढ़ाने वाली, सर्विलांस बढ़ाने वाली, पहले से रोकने वाली पुलिस चाहिए। एक ऐसी पुलिस जो रात दस बजे सड़क पर अकेली चल रही लड़की को शक की नजर से नहीं, जिम्मेदारी की नजर से देखे। सबसे बड़ा सवाल इस समाज से है। किसी भी समाज में अपराधी अचानक पैदा नहीं होता। यह उसी घर में पनपता है जहां बेटे को सिखाया जाता है कि वह ज्यादा ताकतवर है। 

उसी स्कूल में पनपता है जहां लड़की की हंसी को गलत समझा जाता है। उसी मोहल्ले में पनपता है जहां हम चुप रहना सीख लेते हैं। जब तक हम अपने लड़कों को औरत की इज्जत करना नहीं सिखाएंगे, जब तक हम अपनी भाषा में, अपने मजाक में, अपनी सोच में औरत को वस्तु समझना बंद नहीं करेंगे, तब तक कोई भी कानून, कितना भी कड़ा क्यों न हो, इस जड़ को नहीं काट पाएगा। यह काम सिर्फ अदालत या थाने का नहीं है। यह काम हर घर का है। हमें ऐसी पीढ़ी बनानी होगी जो डर से नहीं, समझ से अपराध से दूर रहे।

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