बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
श्रावस्ती (सावत्थी) के एक अत्यंत धनी व्यापारी थे सुदत्त। उन्हें अनाथ पिंडक भी कहा जाता था क्योंकि वह श्रावस्ती के आसपास के गरीब और अनाथ बच्चों के भोजन और शिक्षा की व्यवस्था में सदैव आग रहते थे। वह लोगों की भलाई करने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। इसी वजह से उन्हें अनाथपिंडक भी कहा जाता था। उन्होंने प्रसेनजित के पुत्र जेत के वन को बड़ी कीमत देकर खरीदा था और उसे महात्मा बुद्ध को समर्पित कर दिया था।उस वन को जेतवन कहा जाता है। श्रावस्ती में यह वन आज भी मौजूद है। एक बार की बात है। जेतवन में महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ प्रवचन दे रहे थे। सभी शिष्य तथागत के एक-एक शब्द को आत्मसात करने का प्रयास कर रहे थे। उसी समय महात्मा बुद्ध को महाकश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुंद और देवदत्त आते हुए दिखाई दिए।
तथागत ने अपने शिष्य अनाथ पिंडक को निर्देश देते हुए कहा कि वत्स! उठो, ब्राह्मण मंडली आ रही है, उसके बैठने के योग्य उचित आसन की व्यवस्था करो। अनाथ पिंडक शिष्य अचकचा गया। उसने कहा कि भगवन! आप शायद इन्हें पहचानते नहीं हैं। इनमें से एक ब्राह्मण है, बाकी क्षत्रिय, वैश्य और अस्पृश्य हैं।
अनाथ पिंडक की बात सुनकर बुद्ध हंस पड़े और उन्होंने कहा, तात! जाति जन्म से नहीं, गुण, स्वभाव और कर्म से पहचानी जाती है। यह सभी लोग कर्म से ब्राह्मण ही हैं। पास आने पर एक ने अनाथ पिंडक की प्रशंसा की, तो बुद्ध ने कहा कि उसमें बस यही कमी है कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं जान सका। जीवन का उद्देश्य स्वार्थी नहीं परमार्थी बनना है, तो वह ऐसा नहीं कहता। ज्ञानी होने से ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान के मार्ग पर चलना होता है। यह सुनकर अनाथ पिंडक लजा गया और वह बुद्ध का कथन समझ गया।


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