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Friday, July 10, 2026

नफरत को फैलने से रोक सकता है केवल खेल


संजय मग्गू

भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों के बीच नफरत का माहौल देखने को मिल रहा है। नफरती माहौल का कारण धर्म कतई नहीं है। दुनिया के किसी भी धर्म ने नहीं कहा कि तुम दूसरी जाति, धर्म, संप्रदाय या भाषा भाषी के साथ नफरत करो। लेकिन यह भी सच है कि दुनिया में नफरत बढ़ रही है। इसके पीछे केवल और केवल सियासत है। राजनीति अपने फायदे के लिए लोगों को आपस में लड़ा रही है। एक दूसरे से नफरत करने की सीख दे रही है, बढ़ावा दे रही है। ऐसी स्थिति में जब दुनिया भर के धर्म गुरु लोगों को यह शिक्षा दे रहे हैं कि एक इंसान का दूसरे इंसान से नफरत करना, धर्म के खिलाफ है, तो फिर नफरत का विस्तार रुक क्यों नहीं रहा है? 

इसका कारण यह है कि राजनीति ने अब धर्म का लबादा ओढ़ रखा है। धर्म में भी राजनीति का प्रवेश हो चुका है। ऐसी स्थिति में तमाम धर्म उपदेश, संत, महात्मा और धार्मिक गुरु विफल हो रहे हैं। तो सवाल यह उठता है कि क्या नफरत के विस्तार को रोका नहीं जा सकता है? जरूर रोका जा सकता है। नफरत के विस्तार पर अगर कोई रोक लगा सकता है, तो वह है खेल। खेल में ही वह कूबत है, जो नफरत के विस्तार को रोक सकता है। कोई भी खेल हो, उसे खेलने में दो या दो से अधिक लोगों की जरूरत पड़ती है। 

अगर आप खेलते समय खिलाड़ियों के हावभाव, क्रिया कलाप पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि एक सच्चा खिलाड़ी जब खेल रहा होता है, तो वह जाति, धर्म, भाषा, प्रांत और संप्रदाय जैसी बातों से ऊपर उठ चुका होता है। क्रिकेट हो या फुटबाल अथवा रग्बी जैसे खेल हों, जहां टीम की जरूरत होती है, तो उस टीम में एक ही भाषा-भाषी, एक ही प्रांत, एक ही धर्म-जाति अथवा संप्रदाय के खिलाड़ी नहीं होते हैं। विभिन्न जाति, धर्म या प्रांत के खिलाड़ी टीम में शामिल किए जाते हैं। जब खेल शुरू होता है, तो टीम का प्रत्येक सदस्य बस खिलाड़ी होता है। वह यह भूल जाता है कि वह किस धर्म का है, किस जाति का है और उसके साथी उससे भिन्न हैं। खेल के मैदान पर हर खिलाड़ी का साथी जोश और जुनून होता है। 

वह बस यही जानता है कि टीम का प्रत्येक सदस्य उसका साथी है और उसे हर हालत में प्रतियोगिता जीतनी है। उस समय कोई भी हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई नहीं होता है। दर्शक भी खेल देखते समय जातीयता, धार्मिकता, प्रांतीयता जैसी भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता की भावना से ओत प्रोत होते हैं। वह केवल अपने देश को जीतता हुआ देखना चाहते हैं। यदि मैं दो प्रांतों के बीच हो रहा है, तो हर दर्शक अपने प्रांत को ही जीतता हुआ देखने की ख्वाहिश रखते हैं। 

अच्छा प्रदर्शन होने पर विरोधी टीम की प्रशंसा करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। इसका उदाहरण पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में कई बार सामने आ चुका है, जब खिलाड़ी ने सब कुछ भुलाकर प्रतिस्पर्धी टीम की तारीफ की है। खेल खिलाड़ी को एकजुट रहने का संदेश देती है, अलगाव या नफरत का नहीं। खेल ही लोगों में प्रेम का प्रस्फुटन करा सकता है। यह क्षमता केवल खेल में है।