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Sunday, July 19, 2026

पत्थर बोला, उफ! मुझे मत मारो


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जीवन में कुछ हासिल करने के लिए कष्ट सहना पड़ता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जो कष्ट से घबरा जाता है, वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है। वह तिरस्कार का भागी होता है। वहीं जिसने विपरीत परिस्थितियों से जूझकर सफलता पाई है, वह पूजा के योग्य माना जाता है। एक कथा है। कहते हैं कि किसी राज्य में एक नामी मूर्तिकार रहता था। 

मूर्तिकार की मूर्तियां एकदम जीवंत लगती थीं। जो भी उसकी बनाई हुई मूर्तियों को देखता, सराहना किए बिना नहीं रह सकता था। एक दिन मूर्तिकार कहीं जा रहा था। काफी देर तक चलते रहने की वजह से वह थक गया। थोड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ की छांव में बैठ गया। उसने उस पेड़ के आसपास देखा, तो उसे काफी बड़े-बड़े पत्थर दिखाई दिए। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद उसने एक पत्थर को उठाया। 

उसने जैसे ही पहली हथौड़ी का प्रहार किया, पत्थर ने रोते हुए गुहार लगाई, मुझे मत मारो। दूसरा वार होते ही पत्थर ने कहा कि मुझे आपकी हथौड़ी से पीड़ा पहुंच रही है। मुझे मत मारो। पत्थर की बात सुनकर मूर्तिकार ने उसे छोड़ दिया। उसने दूसरा पत्थर उठाया और वह उसे तराशने लगा। कठिन मेहनत के बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर को एक देवी का रूप दे दिया। उस मूर्ति को वहीं छोड़कर वह आगे बढ़ गया। कुछ साल इस घटना को बीत गए। एक दिन वह फिर उस रास्ते से गुजरा। 

उसने देखा कि लोगों ने उस मूर्ति की पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। लोग उस पर फूल और नैवेद्य आदि चढ़ा रहे हैं। जो पत्थर रोया था, उस पर  लोग मूर्ति पर चढ़ाने के लिए नारियल फोड़ते हैं। यह देखकर पत्थर पछता रहा था। सच ही कहा गया है कि बिना कष्ट सहे, जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता है।