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Saturday, July 25, 2026

सेव अरावली के स्वयंसेवकों ने पाली गांव में कायम की नई मिसाल

अशोक मिश्र

फरीदाबाद के पाली गांव में सेव अरावली संस्था के स्वयंसेवकों ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने आज से पांच साल पहले पाली गांव के आसपास अरावली क्षेत्र में बंजर पड़ी जमीनों पर ढाई हजार पौधों को रोपकर एक नई शुरुआत की थी। आज वह बंजर इलाका हराभरा हो गया है। यह अरावली पर्वतमाला को हराभरा करने की एक नायाब मिसाल है। संस्था के स्वयंसेवकों की अटूट मेहनत और लगन की वजह से दस से बारह फुट ऊंचे ढाई हजार से अधिक देशी पेड़ों का एक विशाल मिनी फारेस्ट तैयार हो गया है। 

इसके लिए सेव अरावली के स्वयंसेवकों की जितनी तारीफ की जाए, वह कम ही है। हरियाणा में अरावली की बंजर होती पहाड़ियों पर अब हरियाली लौटाने का जो संकल्प दिख रहा है, वह केवल पौधरोपण का आंकड़ा नहीं बल्कि मरुस्थलीकरण के खिलाफ एक दीवार खड़ी करने जैसा है। हरियाणा की अरावली पहाड़ियां कभी राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक ढाल थीं, लेकिन खनन, अतिक्रमण और अनदेखी के कारण दक्षिण हरियाणा की बड़ी जमीन बंजर और झाड़-झंखाड़ में बदल गई। अब इसी बंजर जमीन पर हरियाणा सरकार अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर पौधरोपण कर रही है। 

इसका मकसद सिर्फ  पेड़ लगाना नहीं, बल्कि थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकना, धूल भरी आंधियों को थामना और भूजल को बचाना है। केंद्र की अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत हरियाणा ने अपने पाँच जिलों  गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में फैली 33,706 हेक्टेयर रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया की जीआईएस मैपिंग कराई थी जिसमें से 24,990 हेक्टेयर यानी लगभग 61,750 एकड़ जमीन बंजर पाई गई थी। सेव अरावली जैसी संस्थाएँ भी देशी पौधे लगाकर इस सरकारी प्रयास में जन-भागीदारी जोड़ रही हैं। राज्य के पांचों जिलों में खेजड़ी, बबूल, धोक, बेर जैसी स्थानीय प्रजातियां लगाई जा रही हैं क्योंकि ये कम पानी में भी जीवित रहती हैं और मिट्टी को बांधती हैं। 

अरावली का पुनर्जीवन केवल एकड़ गिनने का विषय नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिक दीवार को फिर खड़ा करने का प्रश्न है जो थार को दिल्ली तक आने से सदियों से रोकती आई है। अरावली एनसीआर के लिए प्राकृतिक दीवार का काम करती है। जब यहां हरियाली बढ़ती है तो पश्चिमी राजस्थान से आने वाली धूल और गर्म हवाएं सीधे दिल्ली-गुरुग्राम तक नहीं पहुंचतीं। वायु गुणवत्ता में मामूली सुधार, तापमान में कमी और पक्षियों-वन्यजीवों की वापसी इसके शुरुआती संकेत हैं। भूजल के लिहाज से यह और भी अहम है। सेव अरावली जैसी कुछ और संस्थाएं यदि हरियाणा में सक्रिय हो जाएं, तो अरावली क्षेत्र के साथ-साथ पूरे राज्य को हराभरा बनाना कोई कठिन नहीं होगा।