-अशोक मिश्र
मेरी जगह आप भी होते, तो चौंक गए होते। वजह यह थी कि मेरे सामने एक अनिंद्य ‘सुंदरी’ खड़ी मुस्कुरा रही थी। मैंने पहले समझा कि कोई भूतनी मुझ पर सवार होने आई है। यह सोचते ही मेरे पूरे शरीर में भय का संचार होने लगा। बचपन में जब भी किसी भूत या भूतनी से मुठभेड़ हो जाती थी, तो हम लोग एकमात्र ब्रह्मास्त्र ‘हनुमान चालीसा’ का जोर-जोर से पाठ शुरू कर देते थे। चूंकि मेनका एकाएक मेरे सामने आ खड़ी हुई थी, इसलिए मैं भय और हड़बड़ी में ‘हनुमान चालीसा’ ही भूल गया। लाख सोचा, लेकिन मौके पर याद ही नहीं आया। अब क्या करूं? तभी मुझे एक उपाय सूझा। जब रत्नावली की एक घुड़की सुनकर तुलसी दास जैसे साधारण गृहस्थ महाकवि हो सकते हैं, ‘रामचरित मानस’ जैसा महाकाव्य रच सकते हैं, तो क्या मैं अपनी घरैतिन के नाम का जाप करके भूतनी को नहीं भगा सकता। बस फिर क्या था? मैं आंखें बंद और हाथ जोड़कर जोर-जोर से घरैतिन के नाम का जाप करने लगा। लेकिन यह क्या! वह ‘सुंदरी’भागने की जगह खड़ी मंद-मंद मुस्कुराती रही।
उसने मेरे कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘चलिए, आपको ‘यमराज सर’ ने बुलाया है।’
मैंने विनीत स्वर में कहा, ‘देवि! आप कौन हैं? मुझे यमराज सर ने क्यों बुलाया है?’
सुंदरी ने किंचित रोष भरे स्वर में कहा, ‘ताज्जुब है, तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं ‘सनातन सुंदरी’ मेनका हूं। यमराज सर ने तत्काल तुम्हें तलब किया है। क्यों बुलाया है, यह तुम उन्हीं से पूछना।’ ‘मरता क्या न करता’ वाली दशा में मुझे यमराज सर के हुजूर में पेश होना पड़ा। यमराज आफिस के बाहर कुछ पुण्यात्माएं खड़ी ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगा रही थीं। एक पुण्यात्मा ने मेनका को देखते ही चीखकर कहा, ‘जवानी से लेकर बूढ़ापे तक संयमित जीवन जीने, दान-पुण्य करके भी हमें स्वर्ग में क्या मिला। वही लाखों साल की बूढ़ी रंभाएं, मेनकाएं, उर्वशियां। अरे हमने विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लाखों-करोड़ों रुपये के सोने-चांदी इसलिए नहीं दान किए थे कि जब मैं स्वर्ग में आऊं, तो राजा मनु से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक जीवित रहने वाली अप्सराएं हमारा स्वागत करें। वैसे भी ये अप्सराएं देवों, दानवों, असुरों और ऋषियों की सेवा करने से फुरसत पाएं, तो हमारा मनोरंजन करें। सत्ता और बाहुबल की हनक के बल पर देवों और असुरों ने इन अप्सराओं को हथिया लिया है। अगर जल्दी ही नई अप्सराओं की भर्ती नहीं हुई, तो हम स्वर्ग में हड़ताल कर देंगे। स्वर्ग सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।’ मुझे लगा कि यह पुण्यात्मा पृथ्वी पर जरूर नेता रही होगी।
मेनका ने मुझसे कहा था, ‘ये बागी हैं, इनकी बातें मत सुनो।’ तब तक यमराज का दफ्तर आ चुका था। मुझे देखते ही यमराज ने कहा, ‘आओ! तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था। रास्ते में तुमने देख ही लिया होगा कि यहां हड़ताल के आसार हैं। मामला क्या है? यह भी तुम्हारे संज्ञान में आ चुका होगा। अत: हमने फैसला किया है कि मर्त्यलोक की कुछ सुंदरियों को अप्सरा नियुक्त किया जाए। अप्सराओं का चयन एक कमेटी करेगी जिसके तुम अध्यक्ष मनोनीत किए गए हो। हम पर पक्षपात का आरोप न लगे, इसलिए तुम्हें बुलाकर अध्यक्ष बनाना पड़ा।’
यमराज की बात सुनकर मैं हक्की-बक्की भूल गया। मैंने कांपते स्वर में पूछा, ‘सर! तो इन सनातन सुंदरियों का क्या होगा?’ यमराज मेरे सामने पहली बार मुस्कुराये, ‘मेनका ने वीआरएस के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए एप्लीकेशन दिया है। रंभा पहले से ही नोटिस पीरियड में चल रही है। अगले हफ्ते तक नोटिस पीरियड खत्म हो जाएगा। उसे इंद्र सर ने अपनी विशेष सेवा में ले लिया है। रिटारमेंट के बाद उसकी तनख्वाह इंद्र सर देंगे। उर्वशी को कोई न कोई आरोप लगाकर सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा। उसकी तैयारी कर ली गई है। बस, यहां का माहौल थोड़ा ठीक हो जाए।’‘’ यमराज द्वारा महत्व दिए जाने से मैं गदगद हो गया। मैंने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा, ‘सर...मुझे क्या करना होगा?’
यमराज कुछ कहते इससे पहले मेनका बोल पड़ी, ‘मर्त्यलोक की कुछ सुंदरियां बुलाई गई हैं, आप चित्रगुप्त जी, नारद जी और वरुण देव जी के साथ बैठकर उन सुंदरियों में से योग्य पात्रों का सलेक्शन कर लें।’ इतना कहकर मेनका ने चलने का इशारा किया। मैं मेनका के साथ एक बड़े से हाल में पहुंचा। वहां रूस, अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों की विश्वविख्यात रूप गर्विता सुंदरियां बैठी अपनी मधु मुस्कान बिखेरती वातावरण को नैसर्गिक सुषमा प्रदान कर रही थीं। मैंने चारों तरफ इस उम्मीद से नजर दौड़ाई कि भारत की कौन-कौन सी सुंदरियां बुलाई गई हैं। मैंने सोचा कि जिन सुंदिरयों ने मुझे भाव नहीं दिया है, कभी गले नहीं लगाया, आज उनका चयन कर उन पर एक एहसान लाद दूंगा, ताकि जब मैं स्वर्ग आऊं, तो वे मेरी विशेष सेवा करें। लेकिन यह क्या? भारत की एक भी सुंदरी उनमें नहीं थी। मैंने मेनका से पूछा, ‘भारत से सुंदरियां नहीं बुलाई गईं?’
मेनका ने इधर उधर देखा और फिर फुसफुसाती हुई बोली, ‘वो क्या है सर...पिछली बार जब भी भर्ती हुई थी, तो सारी अप्सराएं देवभूमि भारत से थीं। स्वर्ग के देव, दानव भारतीय सुंदरियों की सेवा लेते-लेते ऊब चुके हैं। सो, इस बार अमेरिका, चीन, जापान और रूस की सुंदरियों को मौका देने पर विचार किया गया है। यमराज और इंद्र सर भी यही चाहते हैं।’
यह सुनते ही मुझे ताव आ गया। मैं चिल्लाया, ‘यह तो भारत का अपमान है। वहां एक से बढ़कर एक सुंदरियां मौजूद हैं। इन सुंदरियों के आगे तो मेनका, रंभा, उर्वशी जैसी अप्सराएं पानी भरती नजर आएं। राखी सावंत, मल्लिका सहरावत, मलाइका अरोड़ा खान को बुलाओ। उनके बिना तो यह सलेक्शन ही पूरा नहीं होगा। मेरे सामने से हटो। मैं जाकर यमराज से पूछता हूं कि यह भेदभाव उन्होंने क्यों किया।’ इतना कहकर मैंने मेनका को ढकेलकर आगे बढ़ना चाहा। लेकिन यह क्या! मुझे धप्प की आवाज के साथ किसी के गिरने का एहसास हुआ। मैं चौंक गया। मैंने देखा कि मैं अपने बिस्तर पर हूं और घरैतिन नीचे गिरी चिल्ला रही थीं, ‘हाय राम...मर गई।’ अब आप समझ सकते हैं कि हुआ क्या था?
Monday, August 29, 2011
Tuesday, August 2, 2011
स्लटवॉक यानी मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम
-अशोक मिश्र
छबीली को देखकर मेरी आंखें फटी रह गईं। क्या गजब का लुक था! उसने क्या पहन रखा था, यह तो मैं नहीं जानता। या यों कहें कि औरतों के परिधानों की जानकारी के मामले में मैं बचपन से ही घोंचू रहा हूं। लेकिन उसने जो कुछ भी पहन रखा था, वह मल्लिका सहरावत, राखी सावंत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी पटाखा हीरोइनें भी शायद पहनने से इनकार कर दें। उसकी वेशभूषा देखकर मेरी आंखें आवारगी पर उतारू हो गईं। ये नामुराद आंखें उसके शरीर पर कहां-कहां भटक रही थीं, अब आपसे क्या बताऊं। यदि मेरी इकलौती घरैतिन इस मौके पर साथ होती, तो यकीन मानिए, आंखों की आवारगी के चलते मैं बीच चौराहे पर ही बीवी से पिट चुका होता।
मैंने उसे घूरते हुए पूछा, ‘शॉपिंग करने जा रही हो?’
‘नहीं...‘स्लटवॉक’ में शामिल होने जा रही हूं। तुम जैसे बेशर्मों के खिलाफ मोर्चा निकालने। तुम्हारी बेशर्मी तो मैं पिछले बीस साल से ही देख रही हूं...इस वक्त भी तुम उसी तरह दीदे फाड़-फाड़कर मुझे घूर रहे हो, जैसे पांच दिन से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में कड़ाही से निकल रही गर्मागरम कचौड़ी को देखता है।’ इतना कहकर छबीली बड़ी अदा से मुस्कुराई। छबीली की बात सुनकर मैं चौंक गया। अब उसके दशहरे के हाथी और राखी सांवत की तरह सज-धजकर निकलने का अर्थ समझ में आ गया था।
मैंने किसी रास्ता भूले पथिक की तरह अकबका कर पूछा, ‘क्या...स्लटवॉक? यह कौन-सी वॉक है? अब तक मार्निंग वॉक, इवनिंग वॉक, नाइट वॉक तो सुना था, लेकिन यह स्लटवॉक किस खेत की मूली है। मैं नहीं जानता!’ छबीली के सामने मैंने अपना अज्ञान प्रकट किया। मेरी अज्ञानता पर छबीली ठहाका लगाकर हंस पड़ी। उसने आंखें मटकाते हुए कहा, ‘स्लटवॉक यानी कि हम औरतों का तुम बेशर्म मर्दों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन। जस्ट लाइक मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम। अभी तो हम सिर्फ स्लटवॉक निकालने जा रहे हैं। तुम जैसे बेशर्मों को पहले बातों से समझाएंगे। यदि नहीं माने, तो हमारी लातें किस दिन काम आएंगी। हालांकि हम यह भी जानते हैं कि तुम जैसे बेशर्मों की संख्या इस दुनिया में काफी है। सबको ‘शर्मदार’ बनाने में समय लगेगा। इसलिए हम जब तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते, तब तक हर साल इसी दिन हम ‘स्लटवॉक डे’ मनाएंगे।’
छबीली की बात सुनकर मैं गंभीर हो गया। चेहरे पर बत्तीस इंची परमहंसी मुस्कान चिपकाते हुए कहा, ‘इसके लिए स्लट बनना क्या जरूरी है? कम से कम कपड़े पहनकर तुम क्या साबित करना चाहती हो कि यदि तुम अपने पर उतारू हो गईं, तो हम मर्दों से ज्यादा बेशर्म हो सकती हो? और फिर ऐसा करने से क्या हम ‘हयादार’ हो जाएंगे?’
छबीली ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘देखो। यह बहुत पुरानी कहावत है कि लोहा लोहे को काटता है। तुम कलमघसीटू, बुद्धिबेचू पत्रकार हो। इतना तो तुम समझते ही होगे कि दुनिया भर में सभी लड़कियों को तुम मर्द घूरते रहते हो, लेकिन क्या अब तक कभी किसी अखबार या चैनल पर राखी सावंत, मल्लिका सहरावत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी लड़कियों को छेड़ने की खबर आई है? आखिर राखी सावंत जैसी लड़कियां भरे बाजार में भी क्यों नहीं छेड़ी जाती? इसका कारण कभी जानने का प्रयास किया है?’
छबीली की बात सुनकर वाकई मेरी बोलती बंद हो गई। मैं कारण सोचने पर मजबूर हो गया, लेकिन लाख बुद्धि भिड़ाने पर कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने हथियार डालते हुए कहा, ‘माई डियर छबीली! तुम्हीं बता दो कि आखिर राखी को छेड़ने की हिम्मत हम मर्द क्यों नहीं जुटा पाते।’ मैंने अपने चेहरे पर बेचारगी ओढ़ ली। मेरी बात पर छबीली विजयी भाव से मुस्कुराई और चौराहे पर आते-जाते उसे घूर-घूर कर देखते मर्दों पर हेयदृष्टि डालने के बाद बोली, ‘क्योंकि राखी सावंत या मल्लिका बहन तुम लोगों से ज्यादा बेशर्म है। वह जब कम कपड़े पहनकर निकलती है, तुम्हारे चेहरे पर मर्दानगी का भाव जागने की बजाय पसीना छूटने लगता है। जब वह किसी मंच से तुम्हें नामर्द कह देती है, तो तुम आत्महत्या कर लेते हो। अब हम समझ गई हैं कि ईंट का जवाब हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि पत्थर मारना है। अब आज से तुम लोग जितनी बेशर्मी दिखाओगे, उससे ज्यादा बेशर्म बनकर हम दिखाएंगी।’
छबीली की बात सुनकर वाकई मुझे पसीना आने लगा। मुझे लगा कि ज्यादा देर उसके आसपास खड़ा रहा, तो मेरे मोहल्ले का कोई न कोई व्यक्ति हम दोनों को बातचीत करते देख ही लेगा। अगर खुदा न खास्ता यह बात मेरी घरैतिन को बता चल गई, तो घर लौटने पर मेरा ‘स्लटवॉक’ निश्चित है। मेरे वाले ‘स्लटवॉक’ का अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे।
छबीली को देखकर मेरी आंखें फटी रह गईं। क्या गजब का लुक था! उसने क्या पहन रखा था, यह तो मैं नहीं जानता। या यों कहें कि औरतों के परिधानों की जानकारी के मामले में मैं बचपन से ही घोंचू रहा हूं। लेकिन उसने जो कुछ भी पहन रखा था, वह मल्लिका सहरावत, राखी सावंत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी पटाखा हीरोइनें भी शायद पहनने से इनकार कर दें। उसकी वेशभूषा देखकर मेरी आंखें आवारगी पर उतारू हो गईं। ये नामुराद आंखें उसके शरीर पर कहां-कहां भटक रही थीं, अब आपसे क्या बताऊं। यदि मेरी इकलौती घरैतिन इस मौके पर साथ होती, तो यकीन मानिए, आंखों की आवारगी के चलते मैं बीच चौराहे पर ही बीवी से पिट चुका होता।
मैंने उसे घूरते हुए पूछा, ‘शॉपिंग करने जा रही हो?’
‘नहीं...‘स्लटवॉक’ में शामिल होने जा रही हूं। तुम जैसे बेशर्मों के खिलाफ मोर्चा निकालने। तुम्हारी बेशर्मी तो मैं पिछले बीस साल से ही देख रही हूं...इस वक्त भी तुम उसी तरह दीदे फाड़-फाड़कर मुझे घूर रहे हो, जैसे पांच दिन से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में कड़ाही से निकल रही गर्मागरम कचौड़ी को देखता है।’ इतना कहकर छबीली बड़ी अदा से मुस्कुराई। छबीली की बात सुनकर मैं चौंक गया। अब उसके दशहरे के हाथी और राखी सांवत की तरह सज-धजकर निकलने का अर्थ समझ में आ गया था।
मैंने किसी रास्ता भूले पथिक की तरह अकबका कर पूछा, ‘क्या...स्लटवॉक? यह कौन-सी वॉक है? अब तक मार्निंग वॉक, इवनिंग वॉक, नाइट वॉक तो सुना था, लेकिन यह स्लटवॉक किस खेत की मूली है। मैं नहीं जानता!’ छबीली के सामने मैंने अपना अज्ञान प्रकट किया। मेरी अज्ञानता पर छबीली ठहाका लगाकर हंस पड़ी। उसने आंखें मटकाते हुए कहा, ‘स्लटवॉक यानी कि हम औरतों का तुम बेशर्म मर्दों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन। जस्ट लाइक मार्च टुवार्ड्स फ्रीडम। अभी तो हम सिर्फ स्लटवॉक निकालने जा रहे हैं। तुम जैसे बेशर्मों को पहले बातों से समझाएंगे। यदि नहीं माने, तो हमारी लातें किस दिन काम आएंगी। हालांकि हम यह भी जानते हैं कि तुम जैसे बेशर्मों की संख्या इस दुनिया में काफी है। सबको ‘शर्मदार’ बनाने में समय लगेगा। इसलिए हम जब तक अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते, तब तक हर साल इसी दिन हम ‘स्लटवॉक डे’ मनाएंगे।’
छबीली की बात सुनकर मैं गंभीर हो गया। चेहरे पर बत्तीस इंची परमहंसी मुस्कान चिपकाते हुए कहा, ‘इसके लिए स्लट बनना क्या जरूरी है? कम से कम कपड़े पहनकर तुम क्या साबित करना चाहती हो कि यदि तुम अपने पर उतारू हो गईं, तो हम मर्दों से ज्यादा बेशर्म हो सकती हो? और फिर ऐसा करने से क्या हम ‘हयादार’ हो जाएंगे?’
छबीली ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘देखो। यह बहुत पुरानी कहावत है कि लोहा लोहे को काटता है। तुम कलमघसीटू, बुद्धिबेचू पत्रकार हो। इतना तो तुम समझते ही होगे कि दुनिया भर में सभी लड़कियों को तुम मर्द घूरते रहते हो, लेकिन क्या अब तक कभी किसी अखबार या चैनल पर राखी सावंत, मल्लिका सहरावत या मलाइका अरोड़ा खान जैसी लड़कियों को छेड़ने की खबर आई है? आखिर राखी सावंत जैसी लड़कियां भरे बाजार में भी क्यों नहीं छेड़ी जाती? इसका कारण कभी जानने का प्रयास किया है?’
छबीली की बात सुनकर वाकई मेरी बोलती बंद हो गई। मैं कारण सोचने पर मजबूर हो गया, लेकिन लाख बुद्धि भिड़ाने पर कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने हथियार डालते हुए कहा, ‘माई डियर छबीली! तुम्हीं बता दो कि आखिर राखी को छेड़ने की हिम्मत हम मर्द क्यों नहीं जुटा पाते।’ मैंने अपने चेहरे पर बेचारगी ओढ़ ली। मेरी बात पर छबीली विजयी भाव से मुस्कुराई और चौराहे पर आते-जाते उसे घूर-घूर कर देखते मर्दों पर हेयदृष्टि डालने के बाद बोली, ‘क्योंकि राखी सावंत या मल्लिका बहन तुम लोगों से ज्यादा बेशर्म है। वह जब कम कपड़े पहनकर निकलती है, तुम्हारे चेहरे पर मर्दानगी का भाव जागने की बजाय पसीना छूटने लगता है। जब वह किसी मंच से तुम्हें नामर्द कह देती है, तो तुम आत्महत्या कर लेते हो। अब हम समझ गई हैं कि ईंट का जवाब हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि पत्थर मारना है। अब आज से तुम लोग जितनी बेशर्मी दिखाओगे, उससे ज्यादा बेशर्म बनकर हम दिखाएंगी।’
छबीली की बात सुनकर वाकई मुझे पसीना आने लगा। मुझे लगा कि ज्यादा देर उसके आसपास खड़ा रहा, तो मेरे मोहल्ले का कोई न कोई व्यक्ति हम दोनों को बातचीत करते देख ही लेगा। अगर खुदा न खास्ता यह बात मेरी घरैतिन को बता चल गई, तो घर लौटने पर मेरा ‘स्लटवॉक’ निश्चित है। मेरे वाले ‘स्लटवॉक’ का अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे।
Monday, June 27, 2011
स्वामी जी के राहु-केतु
-अशोक मिश्र
आज सुबह चाय पिलाने के बाद बेगम ने हाथ में थैला और नेताओं के करेक्टर की तरह सड़े-गले नोट थमाकर फरमान जारी किया, 'ऊंट की तरह गले तक चाय भर चुके हों, तो घर का एक काम कर दीजिए। बाजार से सब्जी खरीद लाइए।Ó बेगम की व्यंग्यात्मक लहजे में कही गई बात चुभ गई। मैंने सचमुच ऊंट की तरह गर्दन ऊंची की और कहा, 'बेगम...जरा सुर में बात किया करो, तुम्हारा पति हूं। अगर तुम्हारा सुर ज्यादा ही बेसुरा हुआ, तो समझो तुम्हारी फाइल बाबा रामदेव की तरह निपटते देर नहीं लगेगी। अभी इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ हूं कि दूसरी न मिल सके।Ó
बेगम ने मुझे बाहर की ओर ढकेलते हुए कहा, 'जाइए...जाइए...दिग्गी राजा की तरह बहकिए नहीं। जल्दी से सब्जी लेकर आइए, नहीं तो सिर्फ दाल-रोटी खाकर काम चलाना पड़ेगा।Ó मैंने सोचा कि कौन इसके मुंह लगे। सो, थैला और नोट लेकर बाहर निकल आया।
घर से जैसे ही बाहर निकला, किसी चमचमाती नई बीडब्ल्यूएम की तरह आगे आकर खड़ी हो गई। मैं छबीली को कई बार समझा चुका हूं कि तू भगवान भास्कर की तरह मुझे दर्शन मत दिया कर। लेकिन वह है कि किसी न किसी बहाने मुझसे टकरा ही जाती है। एक तो मेरा मूड पहले से ही बिगड़ा हुआ था। मैं उसे देखते ही भड़क उठा, 'देख छबीली...तुझे देखते ही पता नहीं क्यों मेरा दिल सत्याग्रह करने पर आमादा हो जाता है, दिमाग अनशन पर बैठ जाता है। इसलिए मुझ पर इतनी दया कर कि इस तरह दशहरे का हाथी बनकर मेरे सामने न आया कर।Ó
छबीली मेरी बात सुनकर मुस्कुराई। बोली, 'मेरी मानो, तो अपनी कुंडली लेकर किसी ज्योतिषी के पास चले जाइए। आपका कल्याण हो जाएगा। मुझे लगता है कि आपके ग्रह ठीक नहीं चल रहे हैं।Ó
मैंने तल्ख स्वर में कहा, 'पहले तो तू अपने ग्रहों को संभाल। कभी इनसे नैन मटक्का करते हैं, तो कभी उनसे। तेरी तो वही हालत है कि बुढिय़ा औरों को सीख दे और अपनी खटिया भीतर ले।Ó
मेरी बात सुनकर भी छबीली नहीं भड़की। वह मुस्कुराती हुई बोली, 'आप ग्रहों को कम मत समझिए। अपने योग गुरु स्वामी जी को ही लीजिए। उनकी कुंडली के सातवें घर में बैठा चंद्रमा तीसरे ग्रह में बैठे गुरु से टांका भिड़ा बैठा, तो उन्हें वो करना पड़ा जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की। बेचारे स्वामी जी को आधी रात में कुर्ता-सलवार पहनकर भागना पड़ा। शुक्र और राहु ने पल्टासन किया, तो बेचारे हरिद्वार में बिना खाये-पिये अनशन पर बैठे हैं। सरकार उनकी सुन नहीं रही है।Ó
छबीली की बात सुनकर मुझे हंसी आ गई। घरैतिन से हुई 'किच-किचÓ और सब्जी लाने की बात भूलकर उससे बतियाने लगा। मैंने अपने चेहरे पर बत्तीस इंची मुस्कान बिखेरते हुए कहा, 'और क्या गुल खिलाते हैं तुम्हारे ये ग्रह?Ó
मेरी बात सुनकर छबीली उत्साह में आ गई। वह बोली, 'मेरे ग्रह...तुम मेरे ग्रहों की बात छोड़ो। उनकी चाल तो शुरू से ही उलटी रही है। मुझे तो चिंता स्वामी जी के ग्रहों को लेकर हो रही है। बेचारे उधर अनशन पर बैठे हैं और इधर उनके ग्रह ही उनकी भट्ठी बुझाने पर तुले हुए हैं। अब देखिए न! अगर उनके नवें घर में बैठा शनि दूसरे घर में बैठे मंगल एक दूसरे से न टकराते, तो स्वामी जी काहे को रामलीला मैदान में अनशनलीला शुरू करते। बेचारे अनशन पर बैठे इसलिए थे कि वे भी अन्ना हजारे की तरह दूसरे गांधी नहीं, तो तीसरे गांधी बन ही जाएंगे। लोग उनकी जय-जयकार करेंगे। जब वे राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लडेंगे, तो देश की जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाएगी। उनके मन में उपजी लालसा और अहंकार शनि के नवें घर में बैठने से ही है। अगर यह किसी तरह कूद कर चौथे घर में बैठ जाता, तो फिर समझो कि स्वामी जी के बेड़ा पार हो जाता। लेकिन अफसोस की शनि नवें घर में किसी ढीठ किरायेदार की तरह जमकर बैठा हुआ है। अब वह पांचवें घर में बुध के साथ मिलकर उनकी कंपनियों की जांच करा रहा है। उनकी ढंकी छिपी इज्जत का फालूदा बनाकर जनता में बांटने की फिराक में है।Ó इतना कहकर छबीली सांस लेने के लिए रुकी। मैंने उससे कहा, 'अगर स्वामी जी के ग्रह इतने ही कुढंगी चाल चल रहे थे, तो अब तक वे इतने फेमस कैसे हो गए।Ó
'उन्हें फेमस तो होना ही था। सच बताऊं। यह उस समय सीधे चल रहे ग्रहों का ही कमाल था कि स्वामी जी खाये-मुटाए तोंदियल लोगों को योग के नाम पर कसरत सिखाकर खूब चांदी कूट रहे थे। ये खाए-अघाए लोग भी योग के नाम पर रत्ती भर चर्बी घटाने के लिए योगगुरु..योगगुरु के नाम की माला जपते फिर रहे थे। स्वामी जी के किसी शिविर में कोई नंगा-भूखा गया हो, तो बताइए। अरे, स्वामी के कुंडली के सातवें घर में पिछले कई दशक से घर जवांई की तरह रहने वाला केतु उन्हें हजारों करोड़ रुपये का स्वामी बना गया। स्वामी जी तो शिविर में आगे बैठने, पीछे बैठने या बीच में बैठने का भी अलग से चार्ज करते थे।Ó छबीली इतना कह हंसी, तभी दरवाजे पर बेगम नजर आईं और मुझे छबीली के साथ देखकर बोलीं, 'अच्छा, तो आप अभी तक यहीं अटके हुए हैं। मैं तो सोच रही थी कि आप लौट रहे होंगे। और जनाब यहां नैन-मटक्का कर रहे हैं।Ó घरैतिन को देखकर मैं यह कहते हुए पतली गली से सब्जी मंडी की ओर दौड़ पड़ा कि 'बेटा! जल्दी से फूट लो, वरना कुंडली के राहू-केतु भरतनाट्यम करने लगेंगे। ये राहु-केतु सीधे चलें, तो बीवी से पिटवाते हैं और उल्टे चलें, तो पड़ोसन से।Ó
हाईवे पर 'रामदेव' ढाबा
-अशोक मिश्र
पिछले काफी दिनों से पता नहीं क्यों विरक्ति का भाव मन में पैदा हो रहा था। बाबा होने का ख्याल मन में घर करता जा रहा था। वैसे भी बाबाओं के ठाट-बाट देखकर मुझे बाबा होना कोई बुरा नहीं लग रहा था। बाबा तो मैं तब भी बनना चाहता था, जब छबीली से टांका भिड़े दो साल हो गए थे और छबीली का बाप अपनी बेटी का हाथ मुझे सौंपने को तैयार नहीं हो रहा था। अपनी विरक्ति और बाबा बनने की बात छबीली को बताई तो वह उछल पड़ी, 'वाह गुरु! क्या आइडिया सूझा है तुम्हें। तुम बाबा बनो और मैं तुम्हारी चेलिन।'
मैंने डपटते हुए कहा, 'खबरदार! जो तुमने मेरे साथ सटने का प्रयास किया। जब मैं तुम्हारे पीछे पागल बना घूम रहा था, तब तो तुम अपने बाप के पाले में बैठी चोर-सिपाही का गेम खेल रही थी। अब जब मैं भगवान से लौ लगाने जा रहा हूं, तो मेनका बनकर मेरा तप भंग करना चाहती है। तुझे किस आधुनिक इंद्र ने मेरे पीछे लगा दिया है।'
'ओए...बाबा की दुम! अन्ना हजारे की तरह ज्यादा भाव मत खा। थोड़ा-सा मुंह क्या लगा लिया, अपने को रामदेव समझने लग पड़ा। मैं तो तेरे साथ क्या, तेरी ही गाड़ी में हरिद्वार तक जाऊंगी। देखती हूं, तू मेरा क्या बिगाड़ लेता है।' अब छबीली अपनी औकात में आ गई थी। छबीली जब भी अपनी औकात में आती है, मैं अपनी औकात भूल जाता हूं।
सो, मैंने हथियार रखते हुए कहा, 'ठीक है। मेरे साथ चल, लेकिन मेरी प्रमुख चेलिन तू नहीं बनेगी... हां।'
बात तय हो गई। मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले लंगोटिया यार मुसद्दीलाल को पकड़ा और उनकी गाड़ी लेकर हरिद्वार के लिए निकल पड़ा। निकलते समय सोचा था कि यदि अपनी वहां कोई सेटिंग हो गई, तो बाबा बन जाऊंगा। यदि कोई सेटिंग नहीं हुई, तो घूम-फिरकर लौट आऊंगा। हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो गई। भूख काफी तेज लग आई थी। छबीली के पेट में तो चूहों ने बाकायदा पोस्टर-बैनर लेकर अनशन शुरू कर दिया था। गाड़ी रफ्तार में भागी चली जा रही थी कि एकाएक छबीली जोर से चिल्लाई, 'रोको...गाड़ी रोको...!'
ड्राइवर ने हड़बड़ाकर गाड़ी रोक दी। मैंने देखा कि दायीं तरफ एक ढाबा था। ढाबे का नाम था 'रामदेव ढाबा।' मैं चौंक गया। मेरे मन में एक संदेह ने सिर उठाया कि कहीं यह ढाबा अपने योगगुरु स्वामी जी का कोई नया वेंचर तो नहीं है। छबीली गाड़ी रुकते ही लपककर फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा आलीशान ढाबे पर पहुंची और रिसेप्शन के सामने रखे कीमती सोफे पर ढह गई। रिसेप्शन पर बैठी बाला के अलौकिक सौंदर्य को देखकर मैं दहशत में आ गया। मन ही मन 'राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवनसुत नामा' का जाप कर मन में उठ रहे विकारों को दमित करने और 'साधु' बनने का प्रयास करते हुए कहा, 'माते! हम दोनों तुच्छ प्राणी बिभुक्षित (भूखे) हैं। हमें भक्षणार्थ को कुछ मिलेगा।'
उस बाला ने अमृतमयी वाणी में कहा, 'बिभुक्षित हो, तो पहले अपनी वासनाओं का भक्षण करो, विकारों को उदरस्थ करो। अपनी तृष्णाओं का पान करो। भूख मिट जाएगी।' रिसेप्शनिष्ट ने नहले पर दहला जड़ते हुए कहा। यह सुनते ही भूख से बिलबिला रही छबीली बौखला उठी। उसने चिघाड़ते हुए कहा, 'ओ साध्वी की बच्ची! यहां हमारे पेट में चूहे कूद रहे हैं और तू हमें ज्ञान पिला रही है। यह बता तेरे इस ढाबे में खाने को क्या-क्या है?'
मशीनी अंदाज में उस बाला ने बताना शुरू किया, 'योग कोफ्ता, योग पुलाव, लंबितासन रोटी, विलंबित नॉन, पल्टासन भुजिया, फ्राइड मकरासन दाल विद बटर, नैन-मटक्का चटनी....'
'बस...बस...यह तू खाने का आइटम बता रही है या किसी हेल्थ क्लब में सिखाये जा रहे आसनों की जानकारी दे रही है।' छबीली के दिमाग का पारा नीचे आने को तैयार ही नहीं था।
छबीली की बात सुनकर रिसेप्शनिष्ट ने शांत भाव से कहा, 'मैडम...यह हमारे ढाबे का मेन्यू है। यहां परोसे जाने वाले हर व्यंजन का एक औषधिय गुण है। यह आम ढाबे में परोसे जाने वाला खाना नहीं है। अब आप योग कोफ्ता को ही लें। इसे खाने से पहले व्यक्ति भले ही सन्नी देओल की तरह कहता फिरता रहा हो कि जब दस किलो का हाथ पड़ता है, तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है। लेकिन योग कोफ्ता खाने के बाद व्यक्ति पुलपुला हो जाता है। अंदर से खाली, लेकिन बाहर से भरा हुआ दिखता है। पल्टासन भुजिया खाने वाली महिलाओं के सिर्फ बेटा ही होगा, इसकी गारंटी हमारा ढाबा लेता है। हमारे ढाबे की नैन मटक्का चटनी खाने से रूठी हुई प्रेमिका या पत्नी अपना गुस्सा थूककर मान जाती है।' मैंने हस्तक्षेप किया, 'आज की खास रेसिपी क्या है?'
'मंच कूद हलवा, सलवार-कुर्ता पहन खीर...' रिसेप्शनिष्ट ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
छबीली ने मेरा हाथ पकड़कर बाहर खींचते हुए कहा, 'भूख से भले ही मैं मर जाऊं। लेकिन इस ढाबे का पानी तक नहीं पीना है। चलो यहां से।' और मैं कटी पतंग के साथ लटकने वाली डोर की तरह छबीली के साथ खिंचता हुआ गाड़ी तक आया और छबीली ने धक्का देकर मुझे गाड़ी में ठूंसा और ड्राइवर से कहा, 'चलो...वापस चलो। हो गई संत और साध्वी बनने की इच्छा पूरी।' ड्राइवर ने गाड़ी वापस लौटा दी।
Wednesday, April 13, 2011
पलटासन के फायदे
अशोक मिश्रएक राजनीतिक पार्टी का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था। पार्टी अध्यक्ष घपलानंद अपनी पार्टी के नवांकुरों को समझा रहे थे, ‘राजनीति में पलटासन का विशेष महत्व है। चर्चा में बने रहने के लिए कोई विवादास्पद बयान दो और बाद में जब मामला तूल पकड़ जाए, तो पलट जाओ। आपके पलट जाने पर एक बार फिर मामला गर्माएगा और यह गर्माहट आपको एक बार फिर चर्चा में ला देगा। आपकी छवि और निखर कर जनता के सामने आ जाएगी। इस पलटासन का एक फायदा यह भी होता है कि लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं। उन्हें पता नहीं लग पाता कि आपने जो पहले बयान दिया था, वह सही था या आपके पलटने के बाद दिया गया बयान। आप इस कन्फ्यूजन को अपनी पार्टी के हित में उपयोग कर सकते हैं।’
एक छुटभैये नेता ने सवाल दागा, ‘सर, भारतीय राजनीति के संदर्भ में उदाहरण देते हुए समझाइए, ताकि हम लोग इस आसन को अच्छी तरह से आत्मसात कर सकें।’
घपलानंद उस नेता की बात सुनकर मुस्कुराये और बोले, ‘अब देखो, योग गुरु ने लोकपाल बिल प्रारूप कमेटी में भाई-भतीजावाद का मुद्दा उछाला और बाद में जब थुक्का-फजीहत हुई, तो वे पलट गए। कपिल सिब्बल पलटासन के बेहतरीन उदाहरण हैं। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी पलटासन में काफी माहिर हैं। अभी कुछ दिन पहले ये लोग भारत में रहे, भारत का अन्न खाते रहे, तब तक तो भारत उनके लिए बहुत अच्छा था। लेकिन जैसे ही उनके पेट में पाकिस्तानी अन्न पहुंचा, उन्हें भारत के लोग तंगदिल और खुरपेंची नजर आने लगे। इनसे हर राजनीतिक दल के नेता को पलटासन सीखना चाहिए। वैसे तो भारतीय राजनीति का हर बड़ा नेता अपने जीवन में कभी न कभी विवादास्पद बयान देता और बाद में पलट जाता है।’
एक दूसरे नवांकुर ने उत्सुकता जाहिर की, ‘अगर पलटासन फेल हो जाए, तो फिर क्या किया जाए?’
पार्टी अध्यक्ष ने खैनी रगड़कर होंठों के नीचे दबाते हुए कहा, ‘वैसे तो पलटासन के फेल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। लेकिन अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि विशेष काल परिस्थितियों में पलटासन बेअसर साबित होता है, तो बिगड़ी बात को संभालने के लिए कुतर्कासन, मीडिया आरोपासन, चुप्पासन, ढीठासन जैसे कई उपाय हैं जिनका प्रयोग कर विषम परिस्थितियों से निपटा जा सकता है। इन आसनों के बारे में आप लोगों को कल बताया जाएगा, तब तक आप लोग एक दूसरे को विरोधी मानकर खूब कीचड़ उछालिए और पलटासन का अभ्यास कीजिए।’ इतना कहकर अध्यक्ष जी ने प्रशिक्षण शिविर कल तक के लिए स्थगित कर दिया।
Sunday, April 10, 2011
बीवी-बेटे की रिश्वतखोरी भी रुकेगी?
अशोक मिश्र
मैं गहरी निद्रा में था। अपनी एक अदद बीवी की निगाह बचाकर देर रात तक ऐसे-वैसे चैनल देखने के बाद सोया था। सुबह नौ बजे बीवी ने पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा, ‘उठिये...सत्य की जीत हो गई। अन्ना दादा देश से भ्रष्टाचार खत्म करने में सफल हो गए।’ मैं चौंक गया। मुझे लगा कि कहीं भूकंप आया है और घरैतिन बचने के लिए कह रही हों। मैं हड़बड़ाकर उठ गया। मैंने कहा, ‘अरे हुआ क्या? सुबह-सुबह पंचम सुर में काहे को अलाप ले रही हो। कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है या भूकंप आया है।’
बीवी ने उत्साहित होकर बताया, ‘यह अखबार देखो, सरकार ने कह दिया है कि वह आगामी लोकसभा सत्र में जन लोकपाल विधेयक को पेश कर देगी। विधेयक मंजूर होते ही समझो भ्रष्टाचारियों के दिन। फटाफट नहा-धो लो, मंदिर चलना है। मैंने मनौती मानी थी कि यदि अन्ना दादा सफल होते हैं, तो मैं मंदिर में 51 रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी।’ यह सुनते ही मैं चौंक गया। मेरे मुंह से यकायक निकला, ‘हे भगवान! भ्रष्टाचार खत्म होने की खुशी में भगवान को रिश्वत। चलो थोड़ी देर के लिए मान लिया कि इस देश में जन लोकपाल विधेयक पारित होकर कानून बन गया। लेकिन क्या बात-बात में भगवान को घूस देने की इस सनातनी परंपरा पर अंकुश लगाया जा सकेगा?’ यह बात वैसे तो मैंने बहुत धीमें सुर में कही थी, लेकिन घरैतिन के कानों का एंटीना कुछ ज्यादा ही सेंसटिव था। उसने तुरंत मेरी बात को कैच कर लिया और नतीजा यह हुआ कि घरैतिन ने तुरंत मुंह फुला लिया। मुझे लगा कि आज का चाय नाश्ता ही नहीं, खाना-पानी भी कट। मैंने खुशामदी लहजे में कहा, ‘अरी भागवान! यह तो मैंने मजाक किया था। आज तुम कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए।’
घरैतिन नहीं मानी। तो सहायता के लिए आठ वर्षीय बेटे टुन्नू को पुकारा। मामला जैसे ही उसकी समझ में आया, वह किसी रिश्वतखोर बाबू की तरह कुटिलता से मुस्कुराया और बोला, ‘आपने कुछ दिन पहले मुझसे वायदा किया था कि खिलौने खरीदने के लिए पांच सौ रुपये देंगे। लेकिन इस बात को आप महिला आरक्षण विधेयक की तरह लटकाते आ रहे हैं। यदि आप अपने वायदे पूरा करें, तो मैं मम्मी को समझाने का प्रयास करूं।’ बेटे की बात पूरी हुई भी नहीं थी कि बेटी भी बीच में कूद पड़ी। उसने कहा, ‘हां पापा...आप मामले को टरकाने में काफी उस्ताद हैं। आप अपना मतलब निकालने के लिए वायदा तो करते हैं और मतलब निकल जाने पर भूल जाते हैं। आप अपना पिछला वायदा पूरा करने की हामी भरें, तो मैं भी प्रयास करूं।’ ‘मरता क्या न करता’ वाली हालत से मैं दो-चार हो रहा था। बीवी को मनाना था, सो एक बार आश्वासन रूपी ब्रह्मास्त्र आजमाने की सोची। मैंने कहा, ‘ठीक है, आप लोग जो कहेंगे, वह पूरा करूंगा। लेकिन उससे पहले तुम्हारी मम्मी चाय-नाश्ता तो दें। पेट में चूहे कूद रहे हैं।’
बेटे ने कुशल अभिनेता की तरह हाथ नचाते हुए काह, ‘नहीं पापा...इस बार आश्वासन की चासनी हम लोग नहीं चाटने वाले। पहले आप एक हजार रुपये निकालिए, तब कोई बात होगी।’ मजबूरन मुझे अपनी टेंट ढीली करनी पड़ी। रुपया पाते ही भाई-बहन कोपभवन की ओर भागे। थोड़ी देर बाद बेटे ने आकर बताया,‘मम्मी...शाम को मंदिर चलकर भगवान को प्रसाद चढ़ाने को तैयार हैं, लेकिन अभी आपको बाजार जाकर वह साड़ी लानी होगी जिसे पिछले हफ्ते पैसे की कमी का रोना रोकर आप मम्मी को टरका चुके हैं।’
मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘हे भगवान! यह घर-घर में हो रही रिश्वतखोरी कब रुकेगी? इसके खिलाफ भी कोई बिल संसद में पेश होगा या नहीं?’ इतना कहकर मैंने हाथ-मुंह धोया और साड़ी लाने के लिए निकल पड़ा।
मैं गहरी निद्रा में था। अपनी एक अदद बीवी की निगाह बचाकर देर रात तक ऐसे-वैसे चैनल देखने के बाद सोया था। सुबह नौ बजे बीवी ने पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा, ‘उठिये...सत्य की जीत हो गई। अन्ना दादा देश से भ्रष्टाचार खत्म करने में सफल हो गए।’ मैं चौंक गया। मुझे लगा कि कहीं भूकंप आया है और घरैतिन बचने के लिए कह रही हों। मैं हड़बड़ाकर उठ गया। मैंने कहा, ‘अरे हुआ क्या? सुबह-सुबह पंचम सुर में काहे को अलाप ले रही हो। कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है या भूकंप आया है।’
बीवी ने उत्साहित होकर बताया, ‘यह अखबार देखो, सरकार ने कह दिया है कि वह आगामी लोकसभा सत्र में जन लोकपाल विधेयक को पेश कर देगी। विधेयक मंजूर होते ही समझो भ्रष्टाचारियों के दिन। फटाफट नहा-धो लो, मंदिर चलना है। मैंने मनौती मानी थी कि यदि अन्ना दादा सफल होते हैं, तो मैं मंदिर में 51 रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी।’ यह सुनते ही मैं चौंक गया। मेरे मुंह से यकायक निकला, ‘हे भगवान! भ्रष्टाचार खत्म होने की खुशी में भगवान को रिश्वत। चलो थोड़ी देर के लिए मान लिया कि इस देश में जन लोकपाल विधेयक पारित होकर कानून बन गया। लेकिन क्या बात-बात में भगवान को घूस देने की इस सनातनी परंपरा पर अंकुश लगाया जा सकेगा?’ यह बात वैसे तो मैंने बहुत धीमें सुर में कही थी, लेकिन घरैतिन के कानों का एंटीना कुछ ज्यादा ही सेंसटिव था। उसने तुरंत मेरी बात को कैच कर लिया और नतीजा यह हुआ कि घरैतिन ने तुरंत मुंह फुला लिया। मुझे लगा कि आज का चाय नाश्ता ही नहीं, खाना-पानी भी कट। मैंने खुशामदी लहजे में कहा, ‘अरी भागवान! यह तो मैंने मजाक किया था। आज तुम कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए।’
घरैतिन नहीं मानी। तो सहायता के लिए आठ वर्षीय बेटे टुन्नू को पुकारा। मामला जैसे ही उसकी समझ में आया, वह किसी रिश्वतखोर बाबू की तरह कुटिलता से मुस्कुराया और बोला, ‘आपने कुछ दिन पहले मुझसे वायदा किया था कि खिलौने खरीदने के लिए पांच सौ रुपये देंगे। लेकिन इस बात को आप महिला आरक्षण विधेयक की तरह लटकाते आ रहे हैं। यदि आप अपने वायदे पूरा करें, तो मैं मम्मी को समझाने का प्रयास करूं।’ बेटे की बात पूरी हुई भी नहीं थी कि बेटी भी बीच में कूद पड़ी। उसने कहा, ‘हां पापा...आप मामले को टरकाने में काफी उस्ताद हैं। आप अपना मतलब निकालने के लिए वायदा तो करते हैं और मतलब निकल जाने पर भूल जाते हैं। आप अपना पिछला वायदा पूरा करने की हामी भरें, तो मैं भी प्रयास करूं।’ ‘मरता क्या न करता’ वाली हालत से मैं दो-चार हो रहा था। बीवी को मनाना था, सो एक बार आश्वासन रूपी ब्रह्मास्त्र आजमाने की सोची। मैंने कहा, ‘ठीक है, आप लोग जो कहेंगे, वह पूरा करूंगा। लेकिन उससे पहले तुम्हारी मम्मी चाय-नाश्ता तो दें। पेट में चूहे कूद रहे हैं।’
बेटे ने कुशल अभिनेता की तरह हाथ नचाते हुए काह, ‘नहीं पापा...इस बार आश्वासन की चासनी हम लोग नहीं चाटने वाले। पहले आप एक हजार रुपये निकालिए, तब कोई बात होगी।’ मजबूरन मुझे अपनी टेंट ढीली करनी पड़ी। रुपया पाते ही भाई-बहन कोपभवन की ओर भागे। थोड़ी देर बाद बेटे ने आकर बताया,‘मम्मी...शाम को मंदिर चलकर भगवान को प्रसाद चढ़ाने को तैयार हैं, लेकिन अभी आपको बाजार जाकर वह साड़ी लानी होगी जिसे पिछले हफ्ते पैसे की कमी का रोना रोकर आप मम्मी को टरका चुके हैं।’
मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘हे भगवान! यह घर-घर में हो रही रिश्वतखोरी कब रुकेगी? इसके खिलाफ भी कोई बिल संसद में पेश होगा या नहीं?’ इतना कहकर मैंने हाथ-मुंह धोया और साड़ी लाने के लिए निकल पड़ा।
Saturday, April 9, 2011
अब चाहिए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार

अशोक मिश्र
भ्रष्टाचार को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर 97 घंटे तक अनशन करने वाले अन्ना हजारे की सदिच्छा पर शायद ही किसी को कोई अविश्वास हो। उन पर कभी किसी आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप शायद ही लगे हों और यदि लगे भी हों, तो उस पर किसी ने विश्वास नहीं किया होगा क्योंकि अन्ना हजारे ने हमेशा कुछ करके दिखाने में विश्वास किया है, बयानबाजी करने में नहीं। उन्हें जहां भी लगा कि गलत हो रहा है, उसका मुखर विरोध किया। इसके लिए कभी अपने-पराये का भेद भी नहीं किया। शायद यही वजह है कि जब उन्होंने जन लोकपाल विधेयक पारित कराने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का फैसला किया, तो पूरा देश उनके साथ उठ खड़ा हुआ। लेकिन अब जब उन्होंने केंद्र सरकार के आश्वासन पर अपना अनशन तोड़ दिया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस उद्देश्य को लेकर उन्होंने अनशन किया और जिसे पूरे देश का भरपूर समर्थन मिला, वह उद्देश्य पूरा होगा? सरकार ठीक वैसा ही लोकपाल विधेयक संसद में पेश करेगी, जैसा अन्ना हजारे और देश की आम जनता चाहती है, इसकी क्या गारंटी है। और संसद इस विधेयक को पास भी कर देगी, इसको लेकर आश्वासन देने की स्थिति में शायद कोई नहीं है। थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि ड्राफ्ट कमेटी के सदस्य अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक की मूल अवधारणा से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। लेकिन इस भ्रष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे पास कराना सबसे टेढ़ी खीर होगी।...कहीं इस विधेयक का हश्र महिला आरक्षण विधेयक जैसा ही तो नहीं होगा। जिस तरह दबाव में आकर सरकार ने अन्ना समर्थकों की सभी मांगों को स्वीकार किया है, उससे तो यही लगता है कि वह फिलहाल मसले को कुछ दिनों के लिए टालकर अपने लिए राहत की जुगाड़ में थी। उसने ड्राफ्ट कमेटी में सरकारी और गैर सरकारी सदस्यों की बराबर संख्या की बात भी मान ली है। लेकिन जिस तरह अन्ना हजारे समर्थकों ने आनन-फानन सरकार की बात मान ली है, उससे यह शक पैदा होता है कि कहीं वाहवाही लूटने के लिए तो नहीं जनता के उन्माद और जोश का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि अन्ना हजारे ने सरकार के झुकने और लोकसभा में विधेयक पेश करने के आश्वासन को आम जनता की जीत बताते हुए कहा कि अब हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई है। बिल का मसौदा तैयार करना और उसे मंत्रिमंडल में पास कराना अभी बाकी है। बिल को लोकसभा में पास करवाना भी एक बड़ा काम है। जब तक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होता, भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।
इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात पर कुछ ही लोगों ने ध्यान दिया होगा और वह था अन्ना हजारे के समर्थन में देहरादून में प्रदर्शन करने वाले विख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा और उनके साथियों द्वारा लिया गया एक पोस्टर जिसमें लिखा था कि पूंजीवादी व्यवस्था में भ्रष्टाचार को खत्म करना असंभव है। इस पोस्टर का निहितार्थ यह हुआ कि जब तक मुनाफे पर आधारित बिकाऊ माल की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। जो व्यवस्था मुनाफा कमाने की इजाजत देती हो, उस व्यवस्था से रिश्वतखोरी, लूट, शोषण-दोहन खत्म हो जाएगा, इसकी कल्पना करना बुद्धिमानी नहीं होगी। शायद सुंदरलाल बहुगुणा और उनके साथियों को इस बात का पूरा विश्वास है कि पंूजीवादी संसदीय जनतंत्र भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। और इस गंगोत्री के रहते किसी भी दल या राजनेता के पाक-साफ रहने की गुंजाइश बहुत ही कम है। इस पूरी व्यवस्था का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करें, तो पता लगता है कि किसी वस्तु के उत्पादन प्रक्रिया में मुनाफा तभी पैदा होता है, जब उत्पादन कार्य में लगे श्रमिकों को उनकी वाजिब मजदूरी से कम दी जाए या उनसे दी गई मजदूरी के बदले ज्यादा समय तक काम लिया जाए।
अब जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जागरूकता लोगों में पैदा हो ही गई है, तो ऐसे में उचित तो यह होगा कि जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का विधेयक पारित कराने का दबाव भी सरकार पर बनाया जाए। वैसे तो इस व्यवस्था में जब तक किसी मंत्री, सांसद या नौकरशाह पर आरोप नहीं लगता या उसके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का खुलासा नहीं होता, तब तक तो वह ईमानदार ही माना जाता है। लेकिन यदि किसी कारणवश उसके घपलों और घोटालों का पर्दाफाश हो भी जाए, तो वह बड़ी बेशर्मी से इसे विरोधियों द्वारा बदनाम करने की बात कहकर पहले तो अपने कुकृत्य को नकारने का प्रयास करता है। इस पर भी यदि बात नहीं बनी, तो सरकार या पार्टी उस व्यक्ति को सरकार या पार्टी से निकालकर मामले की लीपापोती में लग जाती है। कामनवेल्थ गेम्स घोटाले का खुलासा होने से पहले सुरेश कलमाडी ईमानदार नहीं माने जाते थे क्या? 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले का पर्दाफाश होने से पहले तो ए. राजा भी सीना ठोंककर अपने को ईमानदारों की श्रेणी में रखते थे। यह बात किसी व्यक्ति या राजनीतिक पार्टी विशेष पर लागू नहीं होती। यह बात इस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था पर लागू होती है जो शोषण पर आधारित है।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ड्राफ्ट कमेटी के सदस्यों में शामिल सरकारी और गैर सरकारी सदस्य किसी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं रहे हैं, इसकी गारंटी कौन लेगा। चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए, जनलोकपाल विधेयक पारित भी हो जाएगा और तब? इस व्यवस्था को देखने के लिए जो लोग जिम्मेदार होंगे, वे दूध के धुले होंगे, इसकी भी गारंटी शायद ही कोई लेने को तैयार हो। जब तक शोषण पर आधारित व्यवस्था का खात्मा नहीं होता, तब तक के लिए सिर्फ इतना ही किया जा सकता है कि जन लोकपाल विधेयक के साथ ही जनता अपने जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार भी मांगे। जब तक जनप्रतिनिधियों पर यह तलवार नहीं लटकती रहेगी कि यदि उन्होंने कोई घपला-घोटाला किया, तो जनता न केवल उनसे पद छीन लेगी, वरन उन्हें लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा से वापस बुला लेगी। उन पर जनता की अदालत में मुकदमा चलेगा, वह अलग से। यही बात नौकरशाही के संबंध में भी लागू होनी चाहिए। एक बार अपनी पढ़ाई और योग्यता के बल पर चुने गये नौकरशाह को तभी हटाया जा सकता है, जब उसके खिलाफ पूरी तरह साबित हो जाए कि वह भ्रष्ट है या किसी गैरकानूनी कार्यों में लिप्त रहा है। लेकिन ऐसा होने का उदाहरण शायद ही कोई हो, जब किसी नौकरशाह को भ्रष्टाचार के आरोप में नौकरी से हाथ धोना पड़ा हो।
Wednesday, April 6, 2011
रिश्वत बिना सब सून
-अशोक मिश्र
‘भाई साहब! यह अन्ना हजारे क्या बला है?’ कल पीडब्ल्यूडी का एक जूनियर इंजीनियर खन्ना मुझसे पूछ रहा था। ‘भल बताइए, यह भी कोई बात हुई। भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठ गए।’ मैंने उसकी बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा, ‘अन्ना हजारे एक बहुत बड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी हनक इतनी है कि मुंबई का बड़े से बड़ा दादा और भाई रोज सुबह शाम पांव छूने आते हैं। केंद्र सरकार तक उनकी ईमानदारी और साफगोई की कसमें खाती है।’ ‘तो इसका मतलब अन्ना हजारे सामाजिक क्षेत्र के दादा हैं, ठीक वैसे ही जैसे आपराधिक क्षेत्र के दादा अपने दाऊद भाई हैं।’ जूनियर इंजीनियर ने अपना ज्ञान बघारा। मैं कुछ बोलता, इससे पहले खन्ना बोल उठा, ‘ यह बताओ, उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने की क्या जरूरत थी। अगर दाल या सब्जी में से नमक गायब कर दिया जाए, तो दाल या सब्जी कैसी लगेगी। बिल्कुल फीकी, स्वादहीन। इसे खाने में मजा आएगा? अब अगर कोई कहे कि इस दुनिया से सभी रंगों को गायब कर दो, तो दुनिया कैसी लगेगी। रंगहीन दुनिया की कल्पना करके देखो, पसीने छूट जाएंगे। ठीक ऐसे ही कल्पना करो कि इस देश-दुनिया से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है, तो फिर क्या इस दुनिया में जीना पसंद करेगा। भ्रष्टाचार खत्म होते ही हम सबके जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा।’ मैंने प्रतिवाद किया, ‘अन्ना दादा जो कुछ कर रहे हैं, वह राष्ट्रहित में है। भ्रष्टाचार खत्म होते ही देश के विकास की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगेगी। सब तरफ खुशहाली और अमीरी छा जाएगी। यह तुम क्यों नहीं सोचते।’ ‘अरे, विकास की गाड़ी दौड़ाने के लिए और भी तो कई रास्ते हैं। उस पर तुम्हारे ये अन्ना दादा चाहे रेलगाड़ी चलाएं, चाहे ट्रक। किसी ने रोका है उन्हें। लेकिन वे हम लोगों के पेट पर लात क्यों मारते हैं। अगर भ्रष्टाचार खत्म हो गया, तो क्या हम-आप जैसे लोग अपने बच्चों को महंगे-महंगे स्कूलों में पढ़ा सकेंगे। उन्हें ऐश करने के लिए ढेर सारे पैसे और मोटर बाइक आदि कहां से लेकर दे पाएंगे। सूखी तनख्वाह से तो दाल-रोटी चल जाए, यही बहुत है। यह बताओ, अन्ना हजारे अपने को गांधीवादी कहते हैं, लेकिन गांधी जी ने तो कभी भ्रष्टाचार का विरोध नहीं किया। अरे, गांधी बाबा तो अपनी बकरी को भी मेवे खिलाते थे, ताकि वह उन्हें बदले में पौष्टिक दूध दे। वे कभी भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी के खिलाफ अनशन पर नहीं बैठे। यदि वे रिश्वतखोरी को बुरा समझते, तो विरोध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने कभी इसका विरोध किया हो, ऐसा कहीं लिखा नहीं है।’ मैं कुछ कहता, इससे पहले खन्ना ने अपनी बाइक उठायी और चलता बना। मैं वहीं खड़ा उसकी बातो पर गौर करता रहा।
Monday, April 4, 2011
सारा गुड़ गोबर कर दिया
अशोक मिश्र
‘पता नहीं किस का शेर है कि ‘बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, चीरा तो कतरा-ए-खूं निकला।’ पिछले कई महीनों से वर्ल्ड कप भारत जीतेगा, शाबाश धोनी के धुरंधरों, देश की आन, बान-शान...और पता नहीं क्या-क्या तुम्हीं हो, तुम्हें अट्ठाइस साल पुराना इतिहास दोहराना है। जैसे-जैसे नारे सुनते-सुनते कान पक गए थे। अखबार से लेकर टीवी चैनल तक चीख-चीख कर चिल्ला रहे थे। इस बार विश्व कप हमारा है, हम जीत कर रहेंगे। कोई चैनल वाला इसे महामुकाबला बता रहा था, तो कोई महायुद्ध। और अब, जब यह महामुकाबला जीत लिया, तो आईसीसी वालों की नालायकी देखिए, नकली ट्राफी थमा दी। हद हो गयी यार...सारा गुड़ गोबर कर दिया।’ यह कहते मुसद्दी लाल का चेहरा क्रोध से काला पड़ गया।
मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, ‘ट्रॉफी ट्रॉफी होती है, असली या नकली से कोई फर्क नहीं पड़ता। अब आपको बताऊं। मेरा बेटा है टुन्नू। जब वह हवाई जहाज लेने की जिद करता है तो क्या उसे मैं असली हवाई जहाज खरीद कर देता हूं। प्लास्टिक का एक खिलौना हवाई जहाज खरीदता हूं और पकड़ा देता हूं। आपने अपने बच्चे को इसी तरह बहलाया होगा, तो आपको मालूम ही होगा कि वह कितना खुश हो जाता है। वह नाचने लगता है। कभी वह दौड़कर अपने खिलौना हवाई जहाज अपनी मम्मी को दिखाता है, तो कभी अपने पड़ोस में रहने वाले दोस्त राजू को। खिलौना दिखाते समय वह उन्हें बरजता भी है, हां...पेंच मत घुमाना...टूट जाएगा। उसके उमंग और उत्साह की तुलना आज के एक अरब इक्कीस करोड़ भारतीयों से कीजिए। लगभग मेरे बेटे टुन्नू जैसी स्थिति पूरे देश की है। कहीं सोनिया गांधी नाच रही हैं, तो कहीं अमिताभ बच्चन। कहीं खुशी से युवराज फफक रहे हैं, तो कहीं सचिन की आंखें गीली हैं। कैप्टन कूल इस खुशी में मुंडन संस्कार करवा रहे हैं। आप सोच नहीं सकते कि हम भारतीयों का खुशी के मारे क्या हाल है। हम विश्व कप विजेता बन गए...यह पूरी दुनिया ने देखा, आंखें फाड़कर देखा। अब आप इसका मजा किरकिरा मत कीजिए।’
‘लेकिन अगर असली ट्रॉफी दे देते, तो आईसीसी वालों का क्या बिगड़ जाता?’ मुसद्दी लाल अब भी बरस रहे थे। उनके क्रोध का पारा नीचे आने को जैसे तैयार ही नहीं था।
मैंने समझाने वाले लहजे में कहा, ‘भइया बात यह है कि बच्चे जिद कर रहे थे। इस बार हम ही वर्ल्डकप ट्रॉफी लेंगे। आईसीसी के मुखिया शरद पवार ने एक अरब इक्कीस करोड़ बच्चों को बहलाने के लिए एक झुनझुना थमा दिया। अब आप अगर किसी चीज की जिद कर बैठेंगे, तो कोई क्या करेगा। इसीलिए हमारे पूर्वज कहते थे कि अच्छे बच्चों को जिद नहीं करनी चाहिए। अब अगर जिद की है, तो भुगतो।’
मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल थोड़ा नरम पड़े। बोले, ‘यार...मुझे तो अब समझ में आ रहा है कि पाकिस्तान वालों ने सचिन के सात कैच क्यों छोड़ दिये या श्रीलंका वालों ने मैच में ज्यादा रन क्यों नहीं बनाए। जबकि वे इससे पहले के मैचों में अपने विरोधियों के छक्के छुड़ा चुके थे।’
मुसद्दी लाल की बातें अब कुछ रस देने लगी थी। मुझे भी उत्सुकता हुई कि आखिर कौन सी ऐसी बात है जिसे मुसद्दी लाल समझ गए और मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मैंने पुचकारने वाले अंदाज में कहा, ‘भाई साहब! बात क्या है! लगता है कि आपने कोई रहस्य पा लिया है। वैसे भी हमारे देश में जो रहस्य पा लेता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है। इस असार संसार के आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है। लगता है कि आप भी बुद्धत्व को प्राप्त हो गए हैं।’
मुसद्दी लाल ने मुझे घूरते हुए कहा, ‘मेरी बात को हल्के में मत लो। अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि पाकिस्तान और श्रीलंका की क्रिकेट टीम को यह बात पहले से ही पता थी कि ट्रॉफी नकली है। अब जब वे इस बात को जान चुके थे, तो नकली ट्रॉफी के लिए क्यों अपनी जान लड़ाते। उन्होंने मैच इसी तरह खेला जैसे कोई बुजुर्ग खिलाड़ी किसी बच्चे से कोई खेल खेले और झूठ-मूठ में हार जाए। अपनी इस जीत पर बच्चा खुश हो जाता है। वह इसे अपनी प्रतिभा और खेलने की कला की विजय मानकर इतराता घूमता है। अब आप जरा पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाड़ियों के चेहरे को याद कीजिए। वे हारने के बाद भी दुखी नहीं थे। उनके चेहरे पर शायद इस बात का संतोष था कि वे नकली ट्रॉफी के बेकार में ढोकर अपने देश ले जाने की जहमत से बच गए।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल ने एक गिलास पानी पिया और बैठकर आईसीसी वालो को कोसने के पुनीत कर्म में लग गए। मैं उन्हें कोसता छोड़कर अपने घर लौट आया।
‘पता नहीं किस का शेर है कि ‘बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, चीरा तो कतरा-ए-खूं निकला।’ पिछले कई महीनों से वर्ल्ड कप भारत जीतेगा, शाबाश धोनी के धुरंधरों, देश की आन, बान-शान...और पता नहीं क्या-क्या तुम्हीं हो, तुम्हें अट्ठाइस साल पुराना इतिहास दोहराना है। जैसे-जैसे नारे सुनते-सुनते कान पक गए थे। अखबार से लेकर टीवी चैनल तक चीख-चीख कर चिल्ला रहे थे। इस बार विश्व कप हमारा है, हम जीत कर रहेंगे। कोई चैनल वाला इसे महामुकाबला बता रहा था, तो कोई महायुद्ध। और अब, जब यह महामुकाबला जीत लिया, तो आईसीसी वालों की नालायकी देखिए, नकली ट्राफी थमा दी। हद हो गयी यार...सारा गुड़ गोबर कर दिया।’ यह कहते मुसद्दी लाल का चेहरा क्रोध से काला पड़ गया।
मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, ‘ट्रॉफी ट्रॉफी होती है, असली या नकली से कोई फर्क नहीं पड़ता। अब आपको बताऊं। मेरा बेटा है टुन्नू। जब वह हवाई जहाज लेने की जिद करता है तो क्या उसे मैं असली हवाई जहाज खरीद कर देता हूं। प्लास्टिक का एक खिलौना हवाई जहाज खरीदता हूं और पकड़ा देता हूं। आपने अपने बच्चे को इसी तरह बहलाया होगा, तो आपको मालूम ही होगा कि वह कितना खुश हो जाता है। वह नाचने लगता है। कभी वह दौड़कर अपने खिलौना हवाई जहाज अपनी मम्मी को दिखाता है, तो कभी अपने पड़ोस में रहने वाले दोस्त राजू को। खिलौना दिखाते समय वह उन्हें बरजता भी है, हां...पेंच मत घुमाना...टूट जाएगा। उसके उमंग और उत्साह की तुलना आज के एक अरब इक्कीस करोड़ भारतीयों से कीजिए। लगभग मेरे बेटे टुन्नू जैसी स्थिति पूरे देश की है। कहीं सोनिया गांधी नाच रही हैं, तो कहीं अमिताभ बच्चन। कहीं खुशी से युवराज फफक रहे हैं, तो कहीं सचिन की आंखें गीली हैं। कैप्टन कूल इस खुशी में मुंडन संस्कार करवा रहे हैं। आप सोच नहीं सकते कि हम भारतीयों का खुशी के मारे क्या हाल है। हम विश्व कप विजेता बन गए...यह पूरी दुनिया ने देखा, आंखें फाड़कर देखा। अब आप इसका मजा किरकिरा मत कीजिए।’
‘लेकिन अगर असली ट्रॉफी दे देते, तो आईसीसी वालों का क्या बिगड़ जाता?’ मुसद्दी लाल अब भी बरस रहे थे। उनके क्रोध का पारा नीचे आने को जैसे तैयार ही नहीं था।
मैंने समझाने वाले लहजे में कहा, ‘भइया बात यह है कि बच्चे जिद कर रहे थे। इस बार हम ही वर्ल्डकप ट्रॉफी लेंगे। आईसीसी के मुखिया शरद पवार ने एक अरब इक्कीस करोड़ बच्चों को बहलाने के लिए एक झुनझुना थमा दिया। अब आप अगर किसी चीज की जिद कर बैठेंगे, तो कोई क्या करेगा। इसीलिए हमारे पूर्वज कहते थे कि अच्छे बच्चों को जिद नहीं करनी चाहिए। अब अगर जिद की है, तो भुगतो।’
मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल थोड़ा नरम पड़े। बोले, ‘यार...मुझे तो अब समझ में आ रहा है कि पाकिस्तान वालों ने सचिन के सात कैच क्यों छोड़ दिये या श्रीलंका वालों ने मैच में ज्यादा रन क्यों नहीं बनाए। जबकि वे इससे पहले के मैचों में अपने विरोधियों के छक्के छुड़ा चुके थे।’
मुसद्दी लाल की बातें अब कुछ रस देने लगी थी। मुझे भी उत्सुकता हुई कि आखिर कौन सी ऐसी बात है जिसे मुसद्दी लाल समझ गए और मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मैंने पुचकारने वाले अंदाज में कहा, ‘भाई साहब! बात क्या है! लगता है कि आपने कोई रहस्य पा लिया है। वैसे भी हमारे देश में जो रहस्य पा लेता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है। इस असार संसार के आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है। लगता है कि आप भी बुद्धत्व को प्राप्त हो गए हैं।’
मुसद्दी लाल ने मुझे घूरते हुए कहा, ‘मेरी बात को हल्के में मत लो। अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि पाकिस्तान और श्रीलंका की क्रिकेट टीम को यह बात पहले से ही पता थी कि ट्रॉफी नकली है। अब जब वे इस बात को जान चुके थे, तो नकली ट्रॉफी के लिए क्यों अपनी जान लड़ाते। उन्होंने मैच इसी तरह खेला जैसे कोई बुजुर्ग खिलाड़ी किसी बच्चे से कोई खेल खेले और झूठ-मूठ में हार जाए। अपनी इस जीत पर बच्चा खुश हो जाता है। वह इसे अपनी प्रतिभा और खेलने की कला की विजय मानकर इतराता घूमता है। अब आप जरा पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाड़ियों के चेहरे को याद कीजिए। वे हारने के बाद भी दुखी नहीं थे। उनके चेहरे पर शायद इस बात का संतोष था कि वे नकली ट्रॉफी के बेकार में ढोकर अपने देश ले जाने की जहमत से बच गए।’ इतना कहकर मुसद्दी लाल ने एक गिलास पानी पिया और बैठकर आईसीसी वालो को कोसने के पुनीत कर्म में लग गए। मैं उन्हें कोसता छोड़कर अपने घर लौट आया।
Thursday, March 24, 2011
कुत्तों की खरीद पर आयकर
-अशोक मिश्रआज श्यामलाल का चेहरा उतरा हुआ था। सब्जी लेते समय मिले, तो उन्होंने बिना चीनी की गुझिया की तरह फीके अंदाज में अभिवादन किया। मैंने पूछा, ‘भाई श्याम लाल, घर में सब सुख-सांद तो है न! काफी उदास से लग रहे हैं। बात क्या है?’
श्याम लाल ने फुफकार की तरह गहरी सांस छोड़ी, ‘अच्छा, भाई साहब! एक बात बताइए। सरकारी महकमे के अधिकारियों के पास कोई काम नहीं है क्या? बैठे-ठाले बस फिजूल की बातें सोचते और खुरपेंच करते रहते हैं।’
मैं हंस पड़ा। पूछा, ‘हुअ क्या? कुछ तो बताइए। आप बात तो बताते नहीं है और बस अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाए जा रहे हैं। मामले की पूंछ कुछ पकड़ में आए, तो कुछ सलाह-वलाह दे सकूंगा।’
मेरी इस बात पर श्यामलाल जी कुछ खुले। उन्होंने कहा, ‘बात यह है कि मेरी मुनिया ने चार बच्चे दिए थे। बड़े प्यारे-प्यारे, सुंदर-सुडौल बच्चे। उन बच्चों में से एक को मेरे पड़ोसी के पड़ोसी मेहता जी मांग कर ले गए। दूसरे को मेरे आफिस के सुपरवाइजर कालरा साहब उठा ले गए, बोले कि इसे मैं पालूंगा। बाकी बचे दो बच्चों में से एक को कोई रात में चुरा ले गया। एक मेरे पास है जिस पर मेरे बच्चे के क्लास टीचर की निगाह है। वह रोज शाम को मेरे बेटे को ट्यूशन पढ़ाने आता है और जाते समय उसे बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखता है।’
‘तो इसमें ऐसी कौन सी बात हो गई कि आप अधिकारियों के खिलाफ लट्ठ लिए घूम रहे हैं। और फिर एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि यह मुनिया कौन है? बकरी है, कुतिया है या फिर कोई महिला है? कौन है यह मुनिया?’ मैंने झल्लाते हुए पूछा।
मेरी बात सुनकर श्यामलाल जी के चेहरे पर नागवारी के भाव उभरे। उन्होंने कठोर लहजे में कहा, ‘आप इतना भी नहीं समझते! मुनिया मेरे घर की पालतू कुतिया है। उसने चार बच्चे दिए हैं। अब असली समस्या यह है बरखुरदार कि कल ही आयकर विभाग, दिल्ली से एक सरकुलर जारी हुआ है कि कुत्तों की खरीद-फरोख्त बाकायदा रसीद लेकर की जाए। यदि कुत्ते किसी को दान में भी दिए जाएं, तो इसकी भी लिखत-पढ़त जरूरी है। अब भला बताओ, यह भी कोई बात हुई, कुत्ते न हो गए सोने-चांदी के जेवर हो गए कि लिखत-पढ़त करा लो, ताकि भविष्य में कोई जेवर खराब निकले, तो मामला सुलटाया जा सके।’
मुझे श्यामलाल की बात सुनकर काफी गुस्सा आया। श्यामलाल जी की यही एक आदत मुझे खराब लगती है। वे किसी बात को आधा सुनते हैं, बाकी ले उड़ते हैं। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘भाई साहब, यह सरकुलर गली-कूचे में हर आते-जाते लोगों को देखकर भौं-भौं करने वाले कुत्तों के लिए नहीं है। कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। यह आदेश उन कुत्तों के लिए है, जो कारों में घूमते हैं, शैंपू से जिनके बाल धोए जाते हैं। जिन्हें उनकी मालकिन या मालकिन की बिटिया गोद में लिए घूमती-फिरती है। ऐसे कुत्तों की खरीद-फरोख्त पर अब रसीद जरूरी होगी। आपकी मुनिया के लिए नहीं, जिसे दिन भर में पूरी एक रोटी भी नसीब नहीं होती है। कार में घूमने और महलनुमा कोठियों में रहने वाले कुत्तों का कारोबार कई सौ करोड़ रुपये सालाना है। अब अगर आयकर विभाग वाले इन कुत्तों की खरीद-फरोख्त पर आयकर वसूलने की फिराक में है, तो आपको क्या तकलीफ है।’ मेरी बात सुनकर श्यामलाल जी सिर्फ इतना ही बोले, ‘अच्छा तो यह बात है। मैं तो बेकार में ही कल से दुबला होता जा रहा था।’ इतना कहकर श्यामलाल खुशी-खुशी सब्जियां खरीदने लगे।
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