Tuesday, July 24, 2012

‘खटमल’ करेंगे रक्तदान


-अशोक मिश्र
मित्रो! मैं आपको अपना परिचय दे दूं। मैं खटमल हूं। मेरा जीवन ही रक्त चूसने से चलता है। मेरा दावा है कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति ने, चाहे वह किसी भी देश का राष्ट्रपति हो, प्रधानमंत्री हो या फिर झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले आम आदमी, उसने अपने जीवन में एक बार जरूर देखा होगा। मैं कुर्सियों, सोफों, बिस्तर और दीवारों के साथ-साथ कई अन्य जगहों पर भी पाया जाता हूं। आपको बहुत पहले का एक मजेदार किस्सा बताऊं। एक व्यक्ति के कंधे पर चढ़कर उत्तर प्रदेश के किसी गांव-देहात के बाजार में जाने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस मेले में एक खूबसूरत हीरोइन दिख गई। मेले के माहौल की वजह से मैं रोमांटिक हो चला था। मैं रेंगता हुआ, हीरोइन के जमीन पर लटक रहे दुपट्टे पर से होता हुआ चोली में पहुंच गया। चोली में पंहुचते ही पता नहीं क्यों और कैसे, मुझे शरारत सूझ गई। मैंने चुपके से काट लिया। हीरोइन तिलमिलाकर गा उठी, ‘बीच बजरिया खटमल काटे, कैसे निकालूं चोली से।’
तो अब आप इस किस्से से मेरे सब जगह मौजूद रहने की खासियत से परिचित हो ही गए होंगे। अगर मैं आपको अपने सर्वत्र मौजूदगी को इस तरह समझाऊं कि मैं ‘हिग्स फील्ड’ में अदृश्य रूप में  मौजूद रहने वाले हिग्स बोसॉन कणों की तरह हूं, जो मौजूद तो हर जगह रहता है, लेकिन वैज्ञानिकों को विशेष भौतिक वस्तु परिस्थितियों यानी प्रयोगशालाओं में ही दिखाई देता है, तो मेरा ख्याल है कि आप बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। एक बात मैं आपको और बता दूं। मेरी इस खास प्रवृत्ति पर अभी तक वैज्ञानिकों की दृष्टि नहीं पड़ी है। मैं जब चाहे, अपना रूपांतरण भी कर सकता हूं। आपको विश्वास नहीं हो रहा है, तो आपने आसपास के वातावरण को गौर से देखिए, आपको मेरी मौजूदगी का एहसास हो जाएगा।
अजी आपको मेरे रूपांतरित स्वरूप को तलाशना चाहें, तो राजनीति में सबसे ज्यादा मिलेंगे। कुछ लोग तो ‘खटमली’ प्रवृत्ति को इस तरह अख्तियार कर बैठे हैं, मानो वे पैदायशी खटमल हों। कुर्सी की चाह में पार्टी और आलाकमान से खटमल की तरह चिपके रहे, जोड़-जुगत करके किसी तरह अगर कुर्सी मिल गई, उससे चिपक गए। एक बार कुर्सी से चिपकने का मौका क्या मिला, लगे अपनी वंश वृद्धि करने। वंश वृद्धि हुई, तो पूरे कुनबे के साथ लगे आम आदमी का खून चूसने। दूसरे खटमल लाख चिल्लाते रहें कि तुम्हारा पेट भर गया हो, तो हमें भी मौका दो, लेकिन ये दूसरों को तब तक मौका नहीं देते, जब तक कुर्सी से ढकेल नहीं दिए जाते। नौकरशाही अर्थात् ब्यूरोक्रेसी का और भी बुरा हाल है। कई ब्यूरोक्रेट्स तो आम आदमी का इतनी बुरी तरह से रक्त शोषण करते हैं कि हम खटमलों को भी शर्मिंदा होना पड़ता है। तब हम वास्तविक खटमलों को लगने लगता है कि निरीह आदमियों के साथ कुछ ज्यादा ही ज्यादती हो रही है। सो, हमने पिछले दिनों ‘वास्तविक और कायांतरित खटमलों’ ने मिलकर एक मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि हम लोग जिनका रक्त शोषण करते हैं, उनमें से ज्यादातर एनीमिया (खून कम होने की बीमारी) से पीड़ित हैं। ऐसे रक्त शोषितों में खून बनने की प्रक्रिया फिर से शुरू हो, इसके लिए जरूरी है कि उनकी नशों में थोड़ा-बहुत रक्त हो, इसलिए हम सबने मिलकर रक्त शोषितों के हित में रक्तदान का फैसला लिया है। जिस व्यक्ति को रक्त चाहिए, वह निस्संकोच हमसे संपर्क कर सकता है।
मित्रो! आप जानते ही हैं कि हम खटमल निरपेक्ष भाव से जो भी मिल जाता है, उसका रक्त शोषण करते हैं। इस मामले में हम जाति-धर्म, भाषा-प्रांत, अमीर-गरीब या ब्लड ग्रुप का भेदभाव नहीं करते हैं। हर तरह का ब्लड ग्रुप हमारे लिए सुपाच्य है। हमारी नशों में बहने वाला रक्त पांचवें किस्म का ब्लड ग्रुप बन जाता है जिसमें सभी किस्म के एंटीबॉडी और एंटीजन समान मात्रा में मौजूद रहते हैं। हां, धार्मिक, सीधा-सादा और परोपकारी व्यक्ति अगर हमारा खून चढ़ाए जाने के बाद चोर, कपटी, विश्वासघाती, देशद्रोही या आपराधिक प्रवृत्ति का हो जाए, तो इसके लिए हम किसी भी तरह से दोषी नहीं होंगे। ये सारे गुण आप लोगों के रक्त से होकर ही हम खटमलों तक पहुंचे हैं। खुदा हाफिज!

Tuesday, July 10, 2012

सेकेंड हैंड जवानी


-अशोक मिश्र
मेरे पड़ोस में रहते हैं  चचा गबोधर। चचा गबोधर मेरे कोई सगे-संबंधी नहीं हैं। जब से इस मोहल्ले में आया हूं, उन्हें चचा कहता आ रहा हूं। मेरी पत्नी भी उन्हें चचा कहती है, मेरे बेटी-बेटा भी उन्हें चचा ही कहते हैं। खुदा न खास्ता, अगर आज मेरे मरहूम वालिद जन्नतनशीं न हुए होते, तो वे भी उन्हें चचा ही कहते। मेरे कहने का मतलब यह है कि वे मोहल्ले के ही नहीं, पूरे जिले के चचा हैं। कई बार तो मजा तब आता है, जब कब्र में पांव लटकाए पचहत्तर वर्षीया ‘युवा’ परदादी उन्हें चचा कहती हैं, तो वे बेचारे खिसिया जाते हैं। लेकिन यह खिसियाहट मात्र कुछ ही क्षण रहती है। वे पहले की तरह फिर सामान्य हो जाते हैं। चचा गबोधर हम युवाओं में काफी लोकप्रिय हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी खुशमिजाजी और रसिकपना है। वे ऐसी-ऐसी रसीली बातें करते हैं कि उनके पास से उठने का मन ही नहीं करता है।
रविवार की शाम को मैं उनके घर में बैठा चाय सुड़कते हुए पकौड़े भकोस रहा था। चचा की बातें ‘चटनी’ का काम कर रही थीं। अपनी पड़ोसिन छबीली और रसीली को लेकर चचा गबोधर बड़े तरन्नुम में आलाप भर रहे थे। तभी उनके बारह वर्षीय बेटे ‘डमडम’ ने प्रवेश किया। डमडम को देखते ही चचा अपनी बात कहते-कहते रुक गए। चचा ने बेटे डमडम को प्रश्नवाचक निगाहों से देखा, तो बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘पापा! जुम्मन अंकल से एक सवाल पूछना था।’ मैंने अपने मुंहबोले ‘भाई कम भतीजे’ की मदद करने की नीयत से तपाक से कहा, ‘हां...हां बेटे! पूछो क्या पूछना है?’
‘अंकल! आज सुबह चैनल पर फिल्म ‘कॉकटेल’ का एक गाना आ रहा था। उस गाने में सैफ अंकल से साथ दीपिका आंटी और एक दूसरी आंटी (जिनका नाम मुझे नहीं मालूम है।) बड़ी लिपट-चिपटकर गाती हैं ‘नहीं चाहिए मुझको तेरी सेकेंड हैंड जवानी। उसके साथ ही तुक भिड़ाने को ‘ऐंड जवानी’, ‘तेरी बैंड जवानी’ जैसे शब्द आते हैं, मैं लाख सिर खपाने के बावजूद अब तक ‘सेकेंड हैंड जवानी’ का अर्थ नहीं जान पाया हूं। अंकल, आप मुझे क्या उदाहरण सहित इस सेकेंड हैंड जवानी का अर्थ समझा देंगे।’ डमडम का सवाल सुनते ही मेरे ही नहीं, चचा गबोधर के हाथ के तोते उड़ गए। तमतमा उठे चचा। वे बेटे को डांटने वाले ही थे कि मैंने उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए कहा, ‘बेटे! तुम अभी छोटे हो। तुम्हें इन सब गानों के चक्कर में पड़कर अपनी पढ़ाई बरबाद मत करो।’
‘नहीं अंकल! स्कूल में मेरी गर्लफ्रेंड शोशो है न, उसको भी इसका मतलब बताना है। कल उसी ने तो मुझसे पूछा था इसका मतलब।’ डमडम ने मासूमियत से सफाई दी। पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि अगर अभी बच्चे की उत्सुकता शांत नहीं की गई, तो वह किसी और से पूछेगा। दूसरा उसको क्या बताएगा, इसकी क्या गारंटी है। मैंने समझाने वाले लहजे में कहा, ‘जब किसी व्यक्ति की शादी हो जाती है और बाद में वह किसी लड़की से इश्क या शादी करने की सोचता है, तो उस लड़की के लिए उस व्यक्ति की जवानी सेकेंड हैंड हो जाती है।’ मेरी बात सुनकर डमडम कुछ गंभीर हुआ। उसने अपनी नाक पर गिर आए चश्मे को दुरुस्त करते हुए कहा, ‘अंकल! मैं समझ गया। अब मैं शोशो को भी इसका अर्थ संदर्भ सहित बता सकता हूं।’
मैंने उत्सुकता जताई, ‘क्या समझ गए?’ उसने उत्साहपूर्वक कहा, ‘अब जैसे उस गाने में सैफ अंकल और दीपिका और दूसरी वाली आंटी का ही मामला लें। चूंकि सैफ अंकल की शादी अमृता आंटी से एक बार हो चुकी है, तो सैफ अंकल की जवानी दीपिका और दूसरी वाली आंटी के लिए फर्स्ट हैंड तो नहीं रही न। उन दोनों आंटियों के लिए सैफ अंकल तो सेकेंड हैंड ही हुए न। एक उदाहरण और बताऊं, अंकल! अभी थोड़ी देर पहले आप और पापा छबीली और रसीली आंटी के बारे में ‘गल्लां-बातां’ (बातचीत) कर रहे थे। छबीली और रसीली आंटी के लिए मैं तो फर्स्ट हैंड हूं और ये दोनों आंटियां मेरे लिए सेकेंड हैं, लेकिन आप दोनों वे दोनों और उन दोनों के लिए आप दोनों सेकेंड हैंड ही हैं।’ इतना कहकर डमडम मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर चला गया। उसके जाते ही चचा गबोधर फट पड़े, ‘मियां जुम्मन! यह नई पीढ़ी तो समझो, निकम्मी निकल गई। इस पीढ़ी से अब मुझे तो कोई उम्मीद रही नहीं, एकदम बेकार है यह नई पीढ़ी। इसके अभी से पर निकल आए हैं।’ चचा गबोधर लगभग आधे घंटे तक नई पीढ़ी को उपदेश देते रहे और मैं चुपचाप सुनता रहा।

Sunday, July 1, 2012

तीन करोड़ का चूहा


-अशोक मिश्र
जांच अधिकारी मिस्टर मुसद्दी लाल ने चौकीदार कल्लन मियां से पूछा, ‘तीन करोड़ का गेहूं गायब हो गया और तुम्हें पता नहीं चला?’ कल्लन मियां ने पान की पीक गेहूं की बोरियों पर थूकते हुए कहा, ‘साहब! इस देश से बहुत कुछ गायब हो जाता है, किसी को कुछ पता चलता है क्या? फिर तीन करोड़ रुपये के गेहूं की क्या बिसात है!’
‘क्या मतलब?’ मुसद्दी लाल चौंक पड़े, ‘तुम्हारे कहने का मतलब क्या है?’ कल्लन मियां दांतों के बीच फंसी मोटी सुपाड़ी को चबाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘सर, आप अधिकारी हैं। मेरी नौकरी आपकी कलम की मोहताज है। आप चाहें, तो मेरी नौकरी ले सकते हैं और चाहें, तो बचा सकते हैं। लेकिन सर! एक बात पूछूं? इस देश के नेताओं की नैतिकता, सेवा और लोककल्याण की भावना कब गायब हो गई, आपको पता चला? अधिकारियों की कर्तव्य परायणता नामक चिड़िया कब फुर्र हो गई, किसी को पता चला? भ्रष्टाचार रूपी बाज ने देखते ही देखते सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, अधिकारियों से लेकर हम चपरासियों की ईमानदारी को निगल लिया, आपको या देश के किसी नागरिक को पता चला? दूर क्यों जाते हैं? मेरे पड़ोसी जुम्मन मियां की बेटी को कल भरे चौराहे से कोई उठा ले गया, जिन पर हम सबकी सुरक्षा का भार था, उसे पता चला? नहीं न! ठीक उसी तरह इस गोदाम से कब तीन करोड़ रुपये के गेहूं गायब हो गए, हमें पता नहीं चला।’
इस पूछताछ के दौरान गोदाम के अफसर और अन्य कर्मचारी हाथ बांधे जांच अधिकारी मुसद्दी लाल के आगे पीछे डोल रहे थे। ये गोदाम के अधिकारी और कर्मचारी चाहते थे कि मुसद्दी लाल कुछ ले-देकर मामले को रफा-दफा कर दें, लेकिन मुसद्दी लाल थे कि पूरे मामले को बेपर्दा करने पर ही उतारू थे। उन्होंने कल्लन को घूरते हुए कहा, ‘मियां! कुछ भी हो, तुम्हें तो यह बताना ही पड़ेगा कि तीन करोड़ के गेहूं आखिरकार गए कहां? यह गेहूं तुम लोगों ने या तो किसी ब्लैकमार्केटिए या बिस्कुट कंपनी को बेच दिया है या फिर खुद खा गए हो। चलो, मान लिया कि तुम लोगों की लापरवाही से यह गेहूं सड़ गया है, तो तुम लोग यह सड़ा हुआ गेहंू ही क्यों नहीं दिखा देते। मैं अपनी रिपोर्ट में लिख दूंगा। तुम लोग भी बच जाओगे और मेरी जांच भी पूरी हो जाएगी।’
कल्लन मियां को ऐसी जांचों का अच्छा खासा तजुर्बा था। वहीं, बगल में खड़े बड़े बाबू घबराहट में बार-बार जीभ फिराकर होठों को तर कर रहे थे क्योंकि चौकीदार के बाद पूछताछ उनसे ही होने वाली थी। कल्लन के मुंह की सुपारी शायद अब तक छोटे-छोटे टुकड़ों में तब्दील हो चुकी थी। उन्होंने ‘पिच्च’ से एक बार फिर बोरियों पर थूकते हुए कहा, ‘साहब! सच बताऊं। जितना भी गेहूं गायब है, वह सारा गेहूं चूहे खा गए हैं। अगर बाकी बचे गेहूं की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं होती, इसे भी चूहे खा जाएंगे और हम आप बस हाथ मलते रह जाएंगे।’
मुसद्दी लाल यह सुनकर उछल पड़े, ‘क्या चूहे खा गए? यह कैसे हो सकता है। कोई दो-चार किलो गेहूं तो था नहीं कि उसे चूहे खा जाएं और किसी को पता भी नहीं चले। यह पूरे तीन-चार सौ मीट्रिक टन गेहूं का मामला है। इतना गेहूं चूहे कैसे खा सकते हैं। कितने चूहों ने खाया होगा इतना सारा गेहूं?’ मुसद्दी लाल की बात सुनकर कल्लन मियां हंस पड़े, ‘साहब! इस देश में जिधर निगाह दौड़ाइए, मुझे तो चूहे ही चूहे नजर आते हैं। अरे! पूरे देश को चूहों ने कुतर कर रख दिया है और आप चूहों की संख्या पूछते हैं। आप किसी भी महकमे की कार्यप्रणाली देख लें। ऊपर से नीचे तक चूहे ही चूहे भरे हुए हैं। कोई कागज कुतर रहा है, तो कोई देश की पूरी अर्थव्यस्था को कुतरने में लगा हुआ है। कोई सरकारी योजनाओं को कुतर रहा है, तो कोई जनता की जेब। छत्तीसगढ़ में तो डॉक्टरों को कुछ नहीं मिला, तो वे औरतों की बच्चेदानी ही कुतर गए। अब आप कहां-कहां तक चूहेदानी लगाकर इन चूहों को पकड़ते फिरेंगे।’ इतना कहकर कल्लन मियां बगलवाले स्टोर में गए और एक चूहादानी लेकर लौटे। उसमें एक भारी भरकम चूहा कैद था। उन्होंने जांच अधिकारी मुसद्दी लाल को थमाते हुए कहा, ‘साहब! इस चूहे को ले जाइए और सरकारी खजाने में इसे जमाकर दीजिए। अपनी जांच रिपोर्ट में लिख दीजिए कि यही वह चूहा है जो तीन करोड़ रुपये के गेहूं खा गया है।’ इतना कहकर कल्लन मियां एक तरफ खड़े होकर पान चबाने लगे और मुसद्दी लाल कभी कल्लन को, तो कभी चूहे को निहारते रहे।

Wednesday, June 20, 2012

एक खत प्रधानमंत्री के नाम


 -अशोक मिश्र

आदरणीय प्रधानमंत्री जी, नमस्कार। सत्श्री अकाल! गुडमार्निंग। आपको अपना परिचय दे दूं। मैं एक मामूली-सा जेबतराश यानी पॉकेटमार हूं। मैं कबीरदास की तरह ‘मसि कागद छुयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ’ वाली कटेगरी का थंब ग्रेजुएट (अंगूठा छाप) हूं, लेकिन अपने काम में इतना माहिर हूं कि लोग मुझे उस्ताद मुजरिम कहते हैं। मेरा दावा है कि अगर मेरी अंगुलियों के नाखून में फंसा ब्लेड सुरक्षित रहे, तो मैं आपके पर्स को भी अपना बना सकता हूं। सर जी, आप जैसे बुजुर्गों और खैरख्वाहों की दुआओं के चलते अपनी ‘क्राइम यूनिवर्सिटी’ काफी अच्छी तरह से चल रही है। एक से बढ़कर एक प्रतिभावान विद्यार्थी हर साल निकल रहे हैं। प्रधानमंत्री जी, आपको यह बात बताते हुए मुझे फख्र महसूस हो रहा है कि हमारी यूनिवर्सिटी से शिक्षित-प्रशिक्षित विद्यार्थी चोर हो सकते हैं, पॉकेटमार हो सकते हैं, गुंडे-बदमाश हो सकते हैं, लेकिन वे न तो विश्वासघाती होंगे और न ही महिलाओं से जुड़ा कोई जुर्म करते हुए पाए जाएंगे। ‘उस्ताद मुजरिम क्राइम यूनिवर्सिटी’ के कई स्टूडेंट्स तो दाऊद भाई की कंपनी में अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। डी कंपनी के कई उम्दा शूटर्स अपने ही सिखाए हुए बच्चे हैं। प्रधानमंत्री जी, अगर मैं यह कहूं कि बड़े, छोटे और मंझोले डॉन अपनी ही यूनिवर्सिटी की छात्र रह चुके हैं, तो यह छोटा मुंह बड़ी बात होगी। यही नहीं, अपने कई चेले-चपाटे तो राजनीति में घुसे हुए हैं और आपके आशीर्वाद से अच्छा कमा-खा रहे हैं। इन चेले-चपाटों के सामने एक ही दिक्कत है, जो आपके सामने इस आशा से रखना चाहता हूं कि आप उनकी कुछ मदद करेंगे।

आदरणीय प्रधानमंत्री जी, आपको शायद जानकारी न हो कि पूरे देश में कट्टा-बंदूक, बम, चाकू-छुरी बनाने का व्यवसाय कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है। आपसे निवेदन है कि यदि इस बार संसद सत्र के दौरान विधेयक लाकर इस कथित अवैध उद्योग को कुटीर उद्योग का दर्जा दिलवा दें, तो इस देश के करोड़ों छुटभैये नेता, गली-कूंचे के गुंडे और चोर और उनके परिवार आपके ऋणी रहेंगे। आप तो अर्थशास्त्री हैं, आपको तो पता ही होगा कि सरकारी स्तर पर इसे कुटीर उद्योग का दर्जा मिलते ही सांसद, विधायक, मंत्री और नौकरशाहों के साथ-साथ कुछ बड़े घराने भी इसमें पूंजी निवेश करेंगे। इससे इस दम तोड़ते उद्योग को संजीवनी मिल जाएगी। जो नेता, अधिकारी और मंत्री अपनी काली कमाई को स्वीटजरलैंड के बैंकों में जमा कराते आ रहे हैं, कुटीर उद्योग का दर्जा मिलते ही इसमें पैसा लगाना सेफ समझने लगेंगे। आपके देश की खुफिया एजेंसियां लाख प्रयत्न करने के बाद भी इंडियन मुजाहिद्दीन, सिमी जैसे देशी और कुछ विदेशी आतंकवादी संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पकड़ नहीं पातीं, लेकिन खुफिया एजेंसियों की सक्रियता के चलते हथियार और विस्फोटक वे चीन, पाकिस्तान और अमेरिका से मंगाते हैं। अगर गोला-बारूद, बम-पिस्तौल से लेकर राकेट लांचर और एलएमजी, एमएमजी जैसी चीजें देश में ही सस्ती और रियायती दरों पर उपलब्ध हो जाएं, तो आप सोचिए कि भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार काफी बढ़ जाएगा। विदेशी आतंकी सिर्फ अपनी जेब में विदेशी करंसी और दिमाग में सीरियल बम धमाकों का प्लान लेकर आएंगे और यहां से विस्फोटक आदि खरीदकर अपनी योजना को अंजाम दे देंगे। इस उद्योग को कानूनी दर्जा न मिलने और खुफिया एजेंसियों की सक्रियता के चलते बेचारों को विस्फोटक और अन्य चीजों को पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान आदि देशों से ढोकर लाना पड़ता है।

सर जी, आपसे निवेदन यह है कि जिस तरह तेल कंपनियों को घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलिंडरों, मिट्टी के तेल आदि की बिक्री पर सरकार सब्सिडी प्रदान करती है, उसी तरह कट्टा-बम उद्योग को भी रियायत दी जाए। हथियारों के उत्पादन और बिक्री पर भले ही मैन्यूफैक्चरिंग और सेल्स टैक्स वसूला जाए, लेकिन इन हथियारों को रखना और उपयोग में लाना कानूनी बना दिया जाए। मेरा तो दावा है कि हर घर में कुछ न कुछ हथियार होने का नतीजा यह होगा कि महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में निश्चित रूप से कमी आएगी। अब आदमी महिलाओं को अबला समझकर छेड़छाड़ नहीं कर पाएगा। सड़क पर चलने वाली सीधी-सादी सी दिखने वाली लड़की कब पेट में चाकू हूल दे, यही सोचकर कोई भी शोहदा उसके किनारे नहीं जाएगा। आशा है कि आप मेरी बात पर विचार करेंगे और संसद में विधेयक पेश कर बम-कट्टा उद्योग को कुटीर उद्योग का दर्जा दिलवाएंगे।


आपका ही-मुजरिम।

Friday, June 15, 2012

अक्ल और बादाम का रिश्ता

-अशोक मिश्र
किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने कहा है कि तंदुरुस्ती हजार नियामत है। इसी नियामत को बरकरार रखने के लिए प्रत्येक रविवार को हम बाप-बेटे अपने मोहल्ले के पार्क में सुबह उठकर दौड़ लगाते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि जब मैं आलस्य के चलते दौड़ने जाने में आनाकानी करता हूं, तो मेरा आठ वर्षीय बेटा ‘का चुप साधि रहा बलवाना’ की तर्ज पर मुझे मेरा बल याद दिलाता है। बेटे के उत्साह को देखते हुए मैं भी उठकर उसके साथ हो लेता हूं। अब आपको आज का ही वाकया सुनाऊं। सुबह मैं अपने बेटे के साथ पार्क की साफ-सुथरी जगह छोड़कर गड्ढों वाली जगह पर दौड़ लगा रहा था। मैं आगे था और मेरा बेटा पीछे। तभी गड्ढे में पैर पड़ने से मेरा बेटा लड़खड़ाया और मुंह के बल गिर पड़ा। उसकी कोहनी और घुटने छिल गए थे। वह रुआंसा हो उठा। तभी पीछे से मेरी पड़ोसन छबीली दौड़ती हुई आई और बेटे को उठाती हुई बोली, ‘बेटे! बादाम-शादाम खाया करो, इससे अक्ल बढ़ती है।’
छबीली की बात सुनकर मैंने पीछे देखा और दौड़कर अपने बेटे के पास आ गया। बेटे के कपड़ों में लगी धूल को झाड़ते हुए कहा, ‘बादाम खाने से नहीं, ठोकर खाने से अक्ल बढ़ती है।’ मेरी बात सुनकर छबीली ने दोनों हाथ कमर पर रखकर अ्रखाड़ में उतरने वाले पहलवान की तरह कहा, ‘अगर ठोकर खाने से अक्ल बढ़ती, तो यूपीए सरकार को बहुत पहले अक्ल आ गई होती। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे एक ही मंच पर लोकपाल बिल और कालेधन को लेकर अनशन पर न बैठते।’
मैंने छबीली को घूरते हुए कहा, ‘क्या मतलब? अन्ना और बाबा रामदेव का मामले को बादाम से क्या लेना देना है।’ छबीली मेरी बात सुनकर पहले तो मुस्कुराई और फिर बोली, ‘इन दोनों की एकता का बादाम से नहीं, लेकिन अक्ल से तो लेना-देना है। दरअसल, मेरी समझ में बाबा और अन्ना की दोस्ती रहीमदास के दोहे ‘कहि रहीम कैसे निभे, केर-बेर के संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग’ को पूरी तरह से चरितार्थ कर रही है। अभी कुछ ही दिन पहले का उदाहरण लें। बाबा और अन्ना ने दिल्ली में एक साथ अनशन किया। बाबा रामदेव ने कहा कि किसी की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जाएगी। लेकिन अन्ना हजारे के चेले-चपाटों ने सारा गुड़ गोबर कर दिया। वे लगे एक-एक मंत्रियों का नाम गिनाने। फलां मंत्री ने इतने का घोटाला किया, अमुक ने इतने की कमाई की। जबकि सच बताऊं। बाबा रामदेव सुबह उठकर सबसे पहले सात-आठ बादाम की गिरी खाते हैं, एक लोटा पानी पीते हैं। उनका दिमाग कितना तेज चलता है। उन्हें मालूम है कि सियासत और व्यापार को एक साथ कैसे साधा जाता है। यह बादाम खाने का ही नतीजा है कि उन्होंने अपनी एक टांग सियासत की चौखट में फंसा रखा है, तो दूसरी टांग के सहारे खड़े होकर योग का व्यापार कर रहे हैं, स्वदेशी के नाम पर कई तरह के उत्पाद बाजार में धड़ल्ले से बेच रहे हैं।’
इतना कहकर छबीली सांस लेने के लिए रुकी। फिर उसने मेरे बेटे के सिर को सहलाते हुए कहना शुरू किया, ‘बादाम सेवन के चलते ही रामलीला ग्राउंड पर पिछले साल हुए ‘सलवार-सूट’ कांड के बाद बाबा रामदेव सतर्क हो चुके थे। उन्हें एहसास हो चुका था कि यदि सरकार अपनी पर उतर आए, तो वह किसी की भी भट्ठी बुझा सकती है। यदि वजह थी कि इस बार उन्होंने किसी भी मंत्री के खिलाफ एक भी शब्द नहीं कहा। उन्होंने तो यहां तक कहा कि पूज्य मैडम के पास जाऊंगा कालेधन के खिलाफ अलख जगाने। फलां आदरणीय नेताजी के पास जाऊंगा उनकी मदद मांगने। उधर अन्ना हजारे की टीम को ले लीजिए। मुंबई अनशन फ्लाप होने यानी समर्थकों के ठुकराने के बाद भी नहीं संभले। उनके चेले-चपाटे हर महीने को अगस्त जैसा मानकर दंभ में फूले जा रहे हैं। कभी सांसदों को चोर-लुटेरा, डाकू और बलात्कारी बता रहे हैं, तो कभी उन्हें भ्रष्टाचारी। इस आपसी सिर फुटौव्वल का नतीजा क्या हुआ? लोगों के सामने आ गया कि इन दोनों की दोस्ती ‘केर-बेर’ की दोस्ती जैसी है।’ इतना कहकर छबीली ने मेरे बेटे को ‘बॉय-बॉय’ किया। मुझे ठेंगा दिखाया और पार्क में टहल रहे लोगों पर मुस्कान की बिजलियां गिराती आगे बढ़ गई।

Tuesday, June 5, 2012

जिंदगी में ‘कंट्रोल जेड’ मतलब पंगा

अशोक मिश्र 
मेरे एक पड़ोसी हैं। उनका नाम है गुदुन कुमार, लेकिन लोग उन्हें प्यार से मियां झान झरोखे प्रसाद कहते हैं। उनका यह नाम कब और क्यों पड़ा, कोई नहीं जानता। पूछने पर वे मुस्कुराकर बात को टाल जाते हैं। वैसे उनसे कोई तभी बात करता है, जब फुरसत में हो। वे दिमाग का दही कर देते हैं। एक दिन रविवार को वे सुबह-सुबह मेरे घर पधारे। मैंने उनका स्वागत करते हुए कहा, ‘आइए, मियां झान झरोखे। बहुत दिनों बाद दर्शन दिए। सब खैरियत तो है?’ वे बोले, ‘सब खैरियत तो है, लेकिन एक सवाल काफी दिनों से परेशान कर रहा है। मैंने सोचा कि आपसे पूछा जाए, शायद आपके पास कोई हल हो।’ मैंने कुछ कहने की बजाय उनकी ओर सवालिया निगाहों से देखा। वे मेरा मंतव्य समझ गए और बोले, ‘बात यह है कि कंप्यूटर में एक कीबोर्ड होता है ‘कंट्रोल’ और दूसरा होता है ‘जेड’। इन दोनों का एक साथ उपयोग करके वर्तमान से पुराने फंक्शन पर लौटा जा सकता है। मैं सोचता हूं कि यदि हम सबकी जिंदगी में भी ‘कंट्रोल जेड’ की व्यवस्था होती, तो क्या होता? मेरे कहने का मतलब समझ रहे हैं न आप!’
झान झरोखे की बात सुनकर मैं आश्चर्य से उछल पड़ा, ‘क्या गजब का आइडिया है मियां! वाकई अगर ऐसा हो जाए, मजा आए। चलो मियां, ललित कुकरेजा से पूछते हैं कि अगर उनकी जिंदगी में ‘कंट्रोल जेड’ होता, तो...?’ हम दोनों ललित के घर पहुंचे। उन्हें ‘कंट्रोल जेड’ के बारे में बताने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि वे कंप्यूटर के माहिर हैं। मैंने झान झरोखे वाला सवाल उनके सामने रख दिया। मेरी बात सुनकर पहले तो उन्होंने चोर निगाहों से चारों तरफ देखा और बोले, ‘होता क्या? सारी पोल खुल जाती। सारे लोग एक दूसरे के सामने नंगे हो जाते। कोई भी, किसी की भी जिंदगी का ‘कंट्रोल जेड’ बटन दबाकर अतीत जान लेता।’
इतना कहकर वे हम दोनों लोगों को देखने लगे। मियां झान झरोखे ने कहा, ‘मैं मतलब नहीं समझा?’ हालांकि ललित कुकरेजा की बात मेरी समझ में पूरी तरह आ गई थी, लेकिन मैंने नादान बनना ही उचित समझा। इस पर वे बोले, ‘आपको अपनी बात समझाने के लिए मैं किसी और का उदाहरण क्यों दूं? अब जैसे मुझे ही लो। मेरी प्यारी-सी बीवी और दोनों बच्चे मुझे शराफत की पुतली समझते हैं। अगर कोई मेरी पत्नी और बच्चों से मेरी लाख बुराई करे, लेकिन उन्हें विश्वास नहीं होगा।
यही हाल मोहल्ले की औरतों और पुरुषों का है। जहां तक मैं जानता हूं, मोहल्ले के लोगों की नजर में मैं करेक्टर और ईमानदारी के मामले में चौबीस कैरेट का खरा सोना हूं। गाहे-बगाहे मेरी शराफत की चर्चा भी करते हैं। अब अगर तुम्हारी कल्पना के मुताबिक जिंदगी में ‘कंट्रोल जेड’ की व्यवस्था होती, तो मेरी बीवी को पता चल जाता कि मैंने पिछले पंद्रह साल से छबीली से टांका भिड़ा रखा है। हम लोग बचपन से ही एक दूसरे के साथ चोंच मिलाते चले आ रहे हैं। इतना ही नहीं, मेरे बॉस को पता चल जाएगा कि मैंने कब-कब बीमारी का बहाना बनाकर, झूठ बोलकर दोस्तों और परिवार के साथ मूवी देखने या शापिंग करने गया। मैंने कब और किससे आफिस के बाहर और भीतर फाइल पर चिड़िया बिठाने के बदले रोकड़ा वसूला।’
ललित अपनी बात कह ही रहे थे कि पीछे से सिंह गर्जना हुई। हम सबने पीछे घूमकर देखा। भाभी जी, यानी मिसेज ललित कुकरेजा सिंहनी की तरह गरजती और ताल ठोंकती हुई बढ़ती चली आ रही हैं। मैंने ‘कंट्रोल जेड’ के जिस साइड इफेक्ट की कल्पना की थी, वह अब साकार होने जा रही थी। मैंने सबसे पहले वहां से खिसक लेना ही उचित समझा।
मिसेज ललित को आता देख मैं चिल्लाया, ‘भागो।’ ललित जी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उनकी पीठ पर एक दोहत्थड़ पड़ा और वे दर्द से दोहरे हो गए। दुबले-पतले झान झरोखे तो एकदम गन्ने की तरह लहराते हुए कब रफूचक्कर हो गए, हम दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला। ललित जी बीवी के भय से आज भी फरार हैं। किसी को कोई सुराग लगे, तो उनके बारे में जानकारी देकर भाभी जी की मदद करें, प्लीज।

Thursday, May 31, 2012

गधों की रेव पार्टी

-अशोक मिश्र
जियामऊ गांव में एक गधा चरने के साथ-साथ ‘ढेंचू-ढेंचू’ करके गर्दभ राग में गाता जा रहा था, ‘तू कहे तो मैं बता दूं, मेरे दिल में आज क्या है?’ वह काफी देर से चर रहा था, इसलिए उसका पेट लगभग भर गया था। पेट भर जाने की वजह से उसे भी इंसानों की तरह मस्ती सूझने लगी थी। यही वजह से वह पहले एक गफ्फा घास का मुंह में भरता और पेट में घास ढकेलने के बाद गाने लगता। तभी कालिदास मार्ग की तरफ से दूसरा गधा लंगड़ाता हुआ आया और पहले वाले गधे के पास ही जल्दी-जल्दी चरने लगा। उसके चरने की स्टाइल बता रही थी कि उसने हरी घास काफी दिनों बाद देखी है।
पहले से चर रहा गधा उसके पास गया और बोला, ‘काफी दिनों बाद हरी घास चरने का मौका मिला है क्या?’ कालिदास मार्ग की तरफ से आए गधे ने एक हल्की-सी दुलत्ती झाड़ते हुए अभिवादन किया और बोला, ‘ऐसी बात नहीं है, लेकिन यह घास कुछ ज्यादा मुलायम है, इसलिए अच्छी लग रही है।’ पहले वाले ने पूछा, ‘तुम लंगड़ा क्यों रहे हो? तुम्हारे मालिक ने पीटा है क्या?’ दूसरे ने जवाब दिया, ‘नहीं, रेव पार्टी में गया था? वहीं चोट लग गई।’
‘यह रेव पार्टी क्या होती है?’ पहले वाले गधे चरना बंद कर दिया था। ‘रेव पार्टी...इसका आनंद तो शब्दों से बता पाना काफी मुश्किल है।’ दूसरा गधा पिछली रात में हुई रेव पार्टी के आनंद में खो गया। उसने कहा, ‘रेव पार्टी में सभी जवान गधे-गधी इकट्ठे होकर नाचते-गाते हैं, खाते-पीते हैं। खूब मौज-मस्ती करते हैं और अपने-अपने बाड़े में जाकर सो जाते हैं।’
‘लेकिन तुम्हें चोट कैसे लग गई?’ पहले वाले ने पूछा। दूसरे ने एक बार तो पहले वाले गधे को घूरा और फिर बोला, ‘सुरैया के बाड़े में कल रात हम लोग इकट्ठे हुए थे। सुरैया का बाड़ा काफी बड़ा है। उसके मालिक ने एक जमीन को चारों ओर से लकड़ी और बांस से घेर कर बाड़े का रूप दे दिया है। उस रेव पार्टी में मैं था, रामधनी की गधी सुरैया थी, बाचू का गधा पतिंगा था। अब तुम यह बात इस तरह समझो कि मैं यानी धनधूसर, सुरैया, पतिंगा, रमरतिया, गॉटर, रेखा, श्यामा, हलकट जैसे लगभग बीस-पच्चीस गधे-गधी इस रेव पार्टी में थे। कोई अपने घर से हरी घास लाया था, तो कोई चूनी, कोई भूसी। रमरतिया अपने मालिक के घर से कच्ची दारू की बोतल ही मुंह में दबाकर ले आई थी। पहले तो रामधनी के घर में बज रहे फिल्मी गीतों पर हम सब डांस करते रहे। रात बारह बजे के बाद हम लोगों ने घरों से कुछ चोरी, कुछ मांग कर लाई गई घास, भूसी-चूनी को भर पेट खाया। खाने के बाद हमने रमरतिया द्वारा लाई गई शराब का सेवन किया। कसम गर्दभ राग की, क्या मस्त वाइन थी! मजा आ गया।’
इतना कहकर धनधूसर पार्टी की रंगीनियों में खो-सा गया। काफी देर तक जब वह नहीं बोला, तो पहले वाले ने पूछा, ‘धनधूसर भाई! फिर क्या हुआ? बताओ न, काफी अच्छा लग रहा है तुम्हारी बात। अब तो मुझे भी किसी रेव पार्टी में शामिल होने की इच्छा हो रही है। सुना है कि इंसान भी रेव पार्टी आयोजित करते हैं।’
धनधूसर ने बताना शुरू किया, ‘वाइन चढ़ते ही हम गधों पर मस्ती छा गई। हमने रमरतिया से थोड़ी दारू और लाने को कहा। वह चुपके से अपने मालिक की दूसरी बोतल उठा लाई। दूसरी बोतल की दारू पीने के बाद हमने फिर नाचना शूरू किया। इसी बीच पतिंगा ने गॉटर की प्रेमिका सुरैया को छेड़ दिया। बस फिर क्या था। ‘बातन-बातन बत बढ़ होइ गई औ बातन में बढ़ गई रार’ वाली स्टाइल में पतिंगा और गॉटर एक दूसरे से भिड़ गए। दोनों एक दूसरे पर दुलत्तियां झाड़ने लगे। पहले तो हम सबने एक दूसरे को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन बाद में हम सभी किसी न किसी की तरफ से लड़ने लगे। हम सभी लड़ ही रहे थे कि छापा पड़ गया।’
‘छापा पड़ गया? मतलब?’ पहले वाले ने उत्सुकता से पूछा। धनधूसर ने कहा, ‘छापा पड़ गया मतलब...छापा पड़ गया। हम लोगों के दुलत्तियां झाड़ने और लड़ने-भिड़ने के चलते बाड़े के टूटने से पैदा हुई आवाज सुनकर सुरैया का मालिक रामधनी एक मोटा डंडा लेकर निकला और लगा हम लोगों पर बरसाने। सारे लोग तो भागने में सफल हो गए। सबसे पहले मैं मिला, सो सबसे ज्यादा उसकी कृपा मुझ पर ही बरसी। इसके बाद कृपा पाने वालों में सुरैया का नंबर दूसरा था। वह बेचारी भाग कर कहां जाती! उसे तो वहीं रहना था।’ इतना कहकर धनधूसर चरने लगा।

Tuesday, May 22, 2012

लल्लन टॉप चैनल

अशोक मिश्र
शाम को थका-मांदा घर पहुंचकर टीवी आॅन किया। चैनल ‘लल्लन टॉप’ पर खबरें प्रसारित हो रही थीं। न्यूज एंकर भानुमती की सुरीली आवाज गूंज रही थी, ‘लल्लन टॉप न्यूज चैनल की खास पेशकश...अभी हम आपको दिखाएंगे थोड़े से ब्रेक के बाद।’ इसके बाद सिरदर्द से लेकर गोरे होने की क्रीम तक के विज्ञापनों को देखते-देखते माथा और भन्ना गया। चैनल बदलने की सोच ही रहा था कि न्यूज एंकर भानुमती अपने लटके-झटके के साथ एक बार फिर नमूदार हुई, ‘हम आपको बता दें कि इस समय आप देख रहे हैं ‘लल्लन टॉप’ चैनल।
अब हम आपको ले चलते हैं, दौलतपुर जिले के एक गांव नथईपुरवा में। इस गांव की धरती पर पैदा हुए हैं तीन बछड़े एक साथ। हम आपको बता दें कि दौलतपुर जिले के नथईपुरवा गांव में पैदा हुए तीन जुड़वा बछड़ों की एक्सक्लूसिव स्टोरी सबसे पहले आप तक लाया है लल्लन टॉप चैनल। तो दोस्तो! हम आपको बता दें कि दौलतपुर की धरती ने आज उस समय इतिहास रच दिया, जब दौलतपुर जिले के नथईपुरवा गांव में एक गाय ने तीन बछड़ों को एक साथ जन्म दिया। तीनों बछड़े स्वस्थ हैं। इन बछड़ों की देखभाल जिला मुख्यालय से आई एक टीम कर रही है। कैमरामैन प्रदीप के साथ हमारे संवाददाता चंद्रबख्श जी इस समय नथईपुरवा गांव में हैं। आइए, हम अपने संवाददाता चंद्रबख्श जी से पूछते हैं कि वहां का क्या माहौल है?
स्क्रीन पर माइक संभाले चंद्रबख्श नजर आते हैं। न्यूज एंकर पूछती है, ‘चंद्रबख्श जी, आप हमारी बात सुन पा रहे हैं? आप हमारे दर्शकों को बताइए कि वहां का माहौल कैसा है? लोग इस संबंध में क्या बातें कर रहे हैं। तीन बछड़ों को जन्म देने के बाद गाय कैसा महसूस कर रही है?’ चंद्रबख्श की आवाज आती है, ‘हां, भानुमती, मैं आपकी बात अच्छी तरह से सुन रहा हूं। जहां तक माहौल की बात है, नथईपुरवा के लोग सुबह से ही पटाखे फोड़ रहे हैं। गाय भी काफी खुश है। आप देख सकती हैं कि गाय इस समय हरा-चारा खा रही है। उसके चेहरे पर गर्व और प्रसन्नता की झलक साफ देखी जा सकती है। उसने दौलतपुर के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है, इसकी सबसे ज्यादा खुशी गाय को है। आइए, हम बात करते हैं गाय के मालिक बलिराम जी से।’ स्क्रीन पर झक्कास कुर्ता-पायजामा पहने बलिराम जी के साथ चंद्रबख्श प्रकट होते हैं। चंद्रबख्श पूछते हैं, ‘बलिराम जी! क्या आपको पहले से उम्मीद थी कि आपकी गाय तीन बछड़ों को जन्म देगी? क्या आपने पहले कोई जांच कराई थी? मेरा मतलब कोई अल्ट्रा साउंड वगैरह...?’  बलिराम मूंछों पर ताव देते हुए बताते हैं, ‘नहीं कोई जांच तो नहीं कराई थी, लेकिन हमें पूरा विश्वास था कि हमारी गाय कबरी कोई न कोई कारनामा जरूर करेगी। तीस साल पहले कबरी की दादी ने भी एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया था। इसकी मां भूरी ने भी चार साल पहले दो बछड़ों को एक साथ जन्म दिया था।’इसके बाद कैमरा बलिराम के चेहरे से पैन होता हुआ कबरी तक जाता है। कुछ देर तक चारा खाती कबरी और गांव में नाचती-गाती  और पटाखे फोड़ती भीड़ को दिखाते हैं, फिर नाचती हुई एक महिला से पूछते हैं, ‘आपको इस उपलब्धि पर कैसा महसूस हो रहा है?’ महिला के पीछे कुछ लड़के और लड़कियां अपना चेहरा दिखाने की नीयत से धक्का-मुक्की करते हैं, इसी बीच वह महिला कहती है, ‘हमका खुसी है कि कबरी माता हमरे गांव की लाज रख लिहिन। देश मा इतना नाम हुआ, यहके लिए हम सभी बहुत खुस हैं।’ इसके बाद चंद्रबख्श विदा हो जाते हैं। स्क्रीन पर एंकर का चेहरा नमूदार होता है। वह कहती है, ‘अब हम अपने दर्शकों को ले चलते हैं दिल्ली स्टूडियो, जहां हमारे साथ मौजूद हैं देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एमएनए सुब्रह्मण्यम राधास्वामी जी। चलिए, उनसे पूछते हैं कि इससे देश और प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?’ राधा स्वामी जी पहले गला खंखारकर साफ करते हैं, फिर बोलते हैं, ‘मैं समझता हूं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। हां, बलिराम की विकास दर देश या प्रदेश की विकास दर से थोड़ा ज्यादा रहेगी।’
 इसके बाद एंकर की आवाज आती है, ‘अब समय हो चला है एक छोटे से ब्रेक का। दर्शकों, ब्रेक के बाद हम अपने दर्शकों के सामने फिर हाजिर होंगे। हमारे साथ होंगे सत्ताधारी दल के एक नेता, एक वरिष्ठ पत्रकार और नेता प्रतिपक्ष धमकैया सिंह, जिनके साथ हम चर्चा करेंगे कबरी के अर्थव्यवस्था में योगदान की। तब तक के लिए हम आपसे विदा लेते हैं।’ इसके बाद न्यूज एंकर गायब हो जाती है। मैं चादर ओढ़कर सो जाता हूं।

Sunday, May 20, 2012

कार्टूनिस्टों को फांसी दो

-अशोक मिश्र
जब मैं कॉफी हाउस में घुसा, तो कुछ चोंचवादी निठल्ले चिंतन कर रहे थे। एक व्यक्ति कह रहा था,‘कुछ भी हो। कार्टून मुद्दे को संसद में नहीं उठाना चाहिए। भला यह भी कोई तुक हुई कि जिस व्यक्ति को लेकर कार्टून बनाया गया, उसने जीते-जी कभी विरोध नहीं किया। अब उनकी औलादें खामख्वाह कटाजुज्झ मचा रही हैं।’
दूसरे निठलले चिंतक ने कॉफी का घूंट भरते हुए कहा, ‘नहीं, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। मैं तो कहता हूं कि इस देश के व्यंग्यकारों, कलाकारों, कार्टूनिस्टों, कवियों और लेखकों के साथ वही होना चाहिए, जो मुगलिया सल्तनत के शंहशाह शाहजहां ने किया था। ताजमहल बनाने वाले वास्तुविदों के हाथ काटकर उन्होंने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की थी। देखो, व्यवस्था और युग भले ही बदल जाए, लेकिन शासकों का चरित्र कभी नहीं बदलता है। कलाकार, चित्रकार और भी जितने ‘कार’ इस दुनिया में पाए जाते हैं, वे सिर्फ और सिर्फ देश और समाज पर बोझ होते हैं। उनकी समाज में कोई उपयोगिता नहीं है। इनके ‘होने या न होने’ पर समाज पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।’ पहले चोंचवादी ने कहा, ‘भइए! इस देश में लोकतंत्र नाम की कोई चिड़िया बसती भी है कि नहीं। सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। जिसकी जो मर्जी होगी, वह लिखेगा, पढ़ेगा। जरूरत पड़ी, तो कार्टून भी बनाएगा। तुम कौन होते हो, उन्हें रोकने या उनके हाथ काटने वाले।’
दूसरे व्यक्ति ने पहले गहरी सांस भरी और फिर बाकी बची कॉफी हलक में उतारने के बाद गुर्राया, ‘इसका क्या मतलब हुआ? आप जो चाहेंगे, वही लिख देंगे। जिस किसी का चाहेंगे, कार्टून बना देंगे। गांधी, नेहरू, अंबेडकर, जिन्ना, गुरु गोलवकर, लोहिया, कांशीराम के विचारों का विरोध करने लग जाएंगे। यह तो नाफरमानी है। हुकुम उदूली है। व्यवस्था का विरोध है। मेरी समझ में एक बात नहीं आती है कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी लोग इस व्यवस्था के विरोध में सोचने की हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं। कैसे ये कल्पना की उड़ान भर लेते हैं? उन्हें ममतावादियों, अंबेडकरवादियों, कांग्रेसियों, भाजपाइयों, बसपाइयों, सपाइयों, वामपंथियों सहित इस देश के गली-कूंचे के छुटभये नेताओं का जरा भी भय नहीं लगता?’
पहला व्यक्ति व्यंग्यात्मक लहजे में हंसा, ‘अगर इन्हें डर ही लगता, तो ये चिंतन ही क्यों करते? व्यवस्था के खिलाफ कोई रचना कैसे करते?’ दूसरे व्यक्ति ने समझाने की कोशिश की, ‘बंधु! सच पूछो, तो इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी कोई चीज ही नहीं है। बस, ‘दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है’ जैसी हालत है इसकी। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि कार्टून, व्यंग्य, लेख या कविता लिखने या बनाने से पहले रचनाकार अपनी थीम को लिखकर शहर के किसी चर्चित चौराहे पर टांग दें। अगर उस थीम में अंबेडकरवादियों, ममतावादियों, मनुवादियों, भाववादियों जैसे तमाम वादियों को आपत्तिजनक नहीं लगता है, तो वे उसका सृजन करें और सृजन के बाद भी यही प्रक्रिया अपनाएं। जो व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट, कवि या लेखक को ऐसा नहीं करता है, उसे इस देश में रहने का अधिकार जब्त कर लेना चाहिए। उसे किसी निर्जन कुछ भी रचने का अधिकार नहीं होना चाहिए।’
यह कहकर वह व्यक्ति थोड़ी देर सांस लेने के लिए रुका। फिर बोला, ‘मेरी तो राय है कि इस देश में जितने भी कार्टूनिस्ट, व्यंग्यकार, लेखक और कवि अपने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहरुआ मानते हों, उन्हें या तो फांसी पर लटका देना चाहिए या फिर उन्हें कालेपानी की सजा देकर किसी निर्जन द्वीप पर यह कहते हुए छोड़ देना चाहिए कि अब इस निर्जन द्वीप पर तुम मन चाहे जितने कार्टून बनाओ, व्यंग्य लिखो, या कल्पना उड़ान भरो। तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है। लेकिन खबरदार! तुम्हारी कल्पना की उड़ान सभ्य समाज की ओर से होकर नहीं गुजरनी चाहिए। वरना कोई ममता, कोई माया, कोई सिब्बल तुम्हारा सिर कलम करने को स्वतंत्र होगा। फिर लोकतंत्र की दुहाई देते हुए मत घूमना।’ इतना कहकर दोनों निठल्ले उठे और कॉफी का बिल पेमेंट कर चलते बने। मैं कॉफी देर तक उनके निठल्ले चिंतन पर बेतुका चिंतन करता रहा और अपने दरबे में आकर सो गया।

Wednesday, May 9, 2012

...नौ दिन चले अढ़ाई कोस

अशोक मिश्र
अभी कुछ दिन पहले मैं घर के खर्च का हिसाब-किताब जोड़ता-घटाता चला जा रहा था कि कूड़े के ढेर पर मुझे कागज के कुछ टुकड़े दिखाई पड़े। वे पीले पड़ गए थे। मुझे लगा कि कहीं कोई पुरानी पुस्तक की पांडुलिपि न हो? एक अजीब-सा कश्मकश मन में चलने लगा। यदि कहीं सिर्फ रद्दी हुई, तो लोग मुझे कूड़े के ढेर से रद्दी चुनते देखकर मजाक उड़ाएंगे। और खुदा न खास्ता, अगर कहीं किसी पुराने ग्रंथ की पांडुलिपि हुई, तो मैं उसे खोज निकालने की वाहवाही लूटने से वंचित हो जाऊंगा। कुछ मिनट की ऊहापोह के बाद दिल ने चंदबरदाई की तरह कहा, 'कूड़ा-करकट की सोच मत, न कर जगहंसाई का ध्यान, कूड़े पर पांडुलिपि है, मत चूको चौहान।Ó मैं उस पांडुलिपि पर एेसा झपटा, जैसे चील मांस के टुकड़े पर झपटती है।
उस पांडुलिपि को सीने से लगाकर घर लाया और सीधा अपने कमरे में गया। खिड़की-दरवाजा बंद करने के बाद उत्तेजित हृदय और कंपकंपाते हाथ के साथ मैंने उस पांडुलिपि का अवलोकन करना शुरू किया। मित्रो! एक पैराग्राफ पढऩे के बाद मुझे अपने पर कोफ्त हुई कि मैंने उस रद्दी के टुकड़े को किसी ग्रंथ की पांडुलिपि समझने की भूल कैसे की? जानते हैं, वह क्या था? वह आज से दस-बारह साल पहले दसवीं कक्षा के छात्र की हिंदी विषय के तृतीय प्रश्नपत्र की उत्तर पुस्तिका थी। बीच में एक पन्ना पता नहीं कैसे खराब होने से बच गया था। उसमें प्रश्न लिखा था कि 'पोस्ती ने ली पोस्त, नौ दिन चले अढ़ाई कोसÓ कहावत का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। उस छात्र ने भी जो जवाब लिखा था, वह भी कम रोचक नहीं था। पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए छात्र का उत्तर ज्यों का त्यों प्रकाशित किया जा रहा है।
छात्र ने लिखा था, इस कहावत में रचियता कवि का पोस्ती से तात्पर्य अफीमची नहीं, सत्ता लोलुपों और पोस्त का अफीम से नहीं, सत्ता से है। यानी सत्ता के लोलुप जब तक सत्ता से बाहर रहते हैं, तो वे पोस्त और पोस्तियों (सत्ता और सत्ताधीशों यानी सरकार) की कमियां गिनाते रहते हैं। सरकार अगर आम जनता की ओर मुंह करके छींक दे, तो गैर पोस्ती (अर्थात विपक्षी) सरकार की नाक में दम कर देते हैं। उन्हें अपनी पार्टी के अध्यक्ष, महामंत्री, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं के पहाड़ जैसे भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, जनविरोधी कार्य नहीं दिखते हैं, लेकिन सरकार की राई जैसी गलतियां पहाड़ जैसी दिखती हैं। वे आवाम को जनसभाओं, मीडिया और सोशल साइट्स पर विश्वास दिलाने लगते हैं कि हे भाग्य विधाता रूपी मतदाताओं! अगर इस बार आपने मेरी पार्टी की सरकार बनवा दी, तो आज लूट-खसोटकर अपना घर भरने वाले मंत्रियों, सांसदों या विधायकों के आलीशान बंगलों और कोठियों को खोदकर खलिहान बनवा दूंगा। लेकिन जब यही गैरपोस्ती पोस्ती हो जाते हैं, यानी विपक्ष से सत्तापक्ष में बैठने लगते हैं, तो ये भी पूर्ववर्तियों की तरह सत्ता की पोस्त चाट लेते हैं, यानी इन पर भी सत्ता का नशा चढ़ जाता है। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा किए गए घोटालों और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार बनने के दूसरे दिन गठित होने वाले इन्क्वायरी कमीशन हवा हो जाते हैं। जिस तरह खूब खाया पिया और मोटा हो गया अजगर बहुत जरूरी होने पर ही रेंगता है, काफी जोर लगाने और आत्मबल बटोरने के बाद नौ दिन में सिर्फ अढ़ाई कोस चल पाता है। वैसे ही सरकार भी रेंगने लगती है। अपने देश में रेंगने का दायित्व आजादी के बाद सबसे पहले और सबसे ज्यादा कांग्रेस पार्टी ने निभाया। इसके बाद कुछ राजनीतिक पार्टियां मिल-जुलकर रेंगी, लेकिन वे इस बात पर लड़ पड़ीं कि तुम ज्यादा रेंगे कि मैं। फिर कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय स्तर के सरीसृप, बसपा, सपा, जनता दल, राष्ट्रीय जनता, तृणमूल कांग्रेस, द्रुमुक और अन्ना द्रुमुक जैसे छोटे या मंझोले सरीसृपों को साथ लेकर रेंगे। तब से कभी ये, तो कभी वे पारी अदल-बदलकर रेंग रहे हैं। ऐसी संभावना है कि ये भविष्य में भी इसी तरह रेंगते रहेंगे, लेकिन आम आवाम के हित में बनने वाली योजनाएं और परियोजनाएं भी इनके साथ रेंगती रहेंगी।
विशेष : इससे एक बात और जाहिर होती है कि कवि न केवल सभी तरह के नशीले पदार्थों का विशेषज्ञ है, बल्कि उसे जीव विज्ञान के बारे में महारत हासिल है।