Monday, January 12, 2026

किसानों का दर्द: फसल खरीद विवाद और किसान अधिकार


अशोक मिश्र

हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है, जहां किसानों की आजीविका का बड़ा आधार धान और गेहूं जैसी फसलों की सरकारी खरीद प्रणाली पर टिका है। ऐसे में धान खरीद से जुड़े कथित घोटालों और अनियमितताओं के आरोप न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि किसानों के भरोसे को गहरा आघात पहुंचाते हैं। किसान संगठनों ने धान खरीद में गड़बड़ी को लेकर सीबीआई जांच की मांग की थी। गड़बड़ी के आरोप ने मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। 

किसानों का आरोप है कि मंडियों में फसल खरीद के दौरान नियमों की अनदेखी की जाती है। कहीं नमी का बहाना बनाकर फसल लौटाई जा रही है, तो कहीं भुगतान में देरी हो रही है। कई मामलों में किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति उस न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत है, जिसे किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए लागू किया गया था। फसल खरीद में पारदर्शिता का अभाव किसानों की सबसे बड़ी चिंता बन गया है। 

यदि सरकारी एजेंसियां समय पर और ईमानदारी से खरीद सुनिश्चित नहीं कर पातीं, तो फिर एमएसपी की घोषणा केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है। किसान संगठनों की जांच की मांग इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर भरोसे की कमी लगातार बढ़ रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खेती पहले से ही बढ़ती लागत, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में यदि खरीद प्रक्रिया में भी बाधाएं खड़ी हों, तो किसान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है। 

कर्ज का बोझ बढ़ता है। आत्मनिर्भरता की जगह असुरक्षा का भाव हावी हो जाता है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह किसानों के हितों की रक्षा करे और खरीद प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाए। यदि फसल खरीद में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या लापरवाही हो, तो निष्पक्ष जांच जरूरी है। दोषियों पर सख्त कार्रवाई न केवल न्याय सुनिश्चित करेगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर भी अंकुश लगाएगी। साथ ही, मंडी व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत करना, आॅनलाइन निगरानी, त्वरित भुगतान और शिकायत निवारण तंत्र को प्रभावी बनाना समय की मांग है। 

किसान केवल समर्थन मूल्य नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसे की भी अपेक्षा करता है। अंतत: यह मुद्दा केवल फसल खरीद का नहीं, बल्कि किसान अधिकारों और सरकारी नीतियों की विश्वसनीयता का है। यदि किसानों का विश्वास टूटता है, तो इसका असर केवल खेती पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ता है। सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसान की मेहनत का उचित मूल्य उसे समय पर और बिना किसी बाधा के मिले। यही सच्चे अर्थों में किसान-हितैषी शासन की पहचान होगी।

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