बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मदर टेरेसा को रोमन कैथोलिक चर्च ने कलकत्ता की संत मदर टेरेसा कहकर पुकारा था। 9 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि से विभूषित किया था। मदर टेरेसा को मानव सेवा के लिए नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।भारत सरकार ने भी उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा था। कहते हैं कि मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मेसीडोनिया में) में हुआ था। मदर टेरेसा ने 1948 को भारत की नागरिकता ग्रहण की थी। इसके दो साल बाद ही उन्होंने कलकत्ता में मिशनरीज आफ चैरिटी की स्थापना की थी।
एक बार की बात है। वह कलकत्ता की भीड़ भरी सड़कों पर जा रही थीं। उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला सड़क के किनारे कूड़े के ढेर के पास पड़ी है। उसके आसपास से लोग आ जा रहे हैं, लेकिन कोई उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा है। महिला के शरीर पर घाव थे और उसको उस समय बहुत तेज बुखार था। सफेद साड़ी पहने मदर टेरेसा ने उस महिला को हलके से स्पर्श किया।
बुजुर्ग महिला ने अपनी आंखें खोली और फिर बंद कर ली। मदर टेरेसा उस महिला को अपने निर्मल आश्रम ले आईं। उन्होंने उसे घावों पर मरहम लगाया। उसको खाने को दिया। ममता भरे स्पर्श से महिला की आंखों में आंसू निकल आए। टेरेसा ने उस महिला से पूछा कि क्या बहुत दर्द हो रहा है?
महिला ने कहा कि नहीं। मुझे दुख है कि मैंने जिस बेटे को पैदा किया, उसने भी मुझे छोड़ दिया। मदर टेरेसा ने कहा कि क्षमा ही सबसे बड़ा मरहम है। उसे क्षमा कर दो। महिला ने अपने बेटे को क्षमा कर दिया। भारत में मदर टेरेसा पर धर्मांतरण के भी आरोप लगाए गए। इन आरोपों में कितनी सच्चाई थी, पता नहीं।

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