Sunday, September 13, 2026

बुरा करने वाले के साथ होता है बुरा


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे। नित्य ही संध्या के समय जेतवन में बुद्ध का प्रवचन आयोजित किया जाता था। उन्हीं दिनों महापाल नाम का व्यापारी किसी काम से श्रावस्ती आया हुआ था। उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो वह बहुत अधिक प्रभावित हुआ। उसने सोचा कि मनुष्य योनि बहुत मुश्किल से मिलता है। व्यापार में अच्छे बुरे काम करते हुए जीवन को क्यों नष्ट किया जाए। वह अपने घर वापस गया और अपने भाई को व्यापार का सारा कार्यभार सौंपकर श्रावस्ती वापस आ गया। 

उसने महात्मा बुद्ध से शिष्य बनने की कामना की। बुद्ध ने उसकी इच्छा का सम्मान किया और शिष्य बना लिया। शिष्य बनने के बाद उसने आराधना शुरू की। उसने लेटकर सोना भी छोड़ दिया। बैठे बैठे साधना करता रहता था। कुछ दिनों के बाद आंखों में पीड़ा शुरू हुई। लोगों ने वैद्य को बुलाया। वैद्य ने कहा कि दवा के साथ नेत्र को विश्राम जरूरी है। लेकिन कुछ दिनों बाद महापाल की आंखें चली गईं। 

वह अंधा हो गया। अब वह महापाल की जगह चक्षुपाल कहा जाने लगा। जब वह आता जाता, तो उसके पैरों तले छोटे जीव दबकर मर जाते थे। अन्य शिष्यों ने महात्मा बुद्ध को यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि वह देख नहीं सकता है, इसलिए उसका यह पाप क्षम्य है। शिष्यों के पूछने तथागत ने कहा कि पूर्व जन्म में महापाल एक वैद्य था। एक महिला इसके पास आंखों का इलाज कराने आई थी। 

उसने कहा था कि यदि उसकी आंखें ठीक हो गईं, तो वह आजीवन उसकी दासी बनकर रहेगी। आंखें ठीक होने पर महिला अपनी बात मुकर गई थी। तब वैद्य ने उसे एक ऐसी दवा दी जिससे उसकी दोनों आंखें चली गई। इस जन्म में महापाल को उसके पूर्व जन्म के पाप का ही दंड मिला है। जो किसी के साथ बुरा करता है, उसके साथ बुरा ही होता है।

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