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Thursday, September 10, 2026

व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महानगरी तक्षशिला को दुल्हन की भांति सजाया गया था। नगर का हर निवासी महात्मा बुद्ध के दर्शन का अभिलाषी था। उससे भी ज्यादा चर्चा दस्यु अंगुलिमाल की थी जिसने तथागत के संपर्क में आने के बाद प्रव्रज्या धारण कर ली थी। लोग यह जानना चाहते थे कि अहिंसक के रूप में तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करने वाला युवक दस्यु से भिक्षुक बनने के बाद कैसा दिखता है। श्रावस्ती के घने वन में पहली मुलाकात के बाद ही अंगुलिमाल ने दस्यु वृत्ति त्याग दी थी।

 तक्षशिला में अपने नवदीक्षित शिष्य अंगुलिमाल के साथ तथागत ने प्रवेश किया, तो जनों ने पुष्प वर्षा से उनका स्वागत किया। शाम को जब धर्म सभा शुरू हुई तो महात्मा बुद्ध  ने अंगुलिमाल की कथा बताते हुए कहा कि अंगुलिमाल का पूर्व कर्म उन लोगों से श्रेष्ठ था जो अव्रती हैं। उसने एक हजार अंगुलियों के संग्रह का व्रत धारण किया था। यद्यपि उसका व्रत और तरीका दोनों ही गलत थे क्योंकि इस कर्म में हिंसा थी। 

लेकिन जो लोग बिना किसी व्रत या उद्देश्य के अपना जीवन बिताते चले आ रहे हैं, उनसे अपने जीवन में कोई न कोई उद्देश्य रखने वाला श्रेष्ठ है। जो लोग व्रतहीन जीवन व्यतीत करते हैं, वह अपना जीवन अकारण बिताते हैं। दस्यु वृत्ति वाले जीवन को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अमानवीय था। व्रतहीन व्यक्ति को आत्म तुष्टि से वंचित होना पड़ता है, आत्म तृप्ति से भी। 

अंगुलिमाल की व्रत निष्ठा से ही सद् और असद् के बीच के अंतरद्वंद्व में सद् की विजय हुई है। प्रेरणाहीन मन भूमि वाला व्यक्ति अंगुलिमाल के पूर्व कर्म से भी ज्यादा पतित है। इसलिए व्रतधारी बनो, संकल्प लो और आगे बढ़ो।