अशोक मिश्र
हरियाणा के लिए यह काफी संतोष की बात है कि राज्य में संस्थागत प्रसव की दर लगभग 98 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। मातृ मृत्यु अनुपात 89 प्रति लाख जीवित जन्म के आसपास है। यह हरियाणा सरकार की व्यवस्था और संवेदनशीलता का जीता जागता प्रमाण है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षित प्रसूति के लिए कई व्यवस्थाएं की हैं। जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव पूरी तरह मुफ्त और नकदरहित है।इसमें सामान्य या सिजेरियन प्रसव, दवाएं, जांच, रक्त, आहार और परिवहन की सुविधा शामिल है। घर से अस्पताल, रेफरल और वापसी की मुफ्त एंबुलेंस सेवा भी उपलब्ध है। जननी सुरक्षा योजना गरीब और अनुसूचित जाति की महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए नकद प्रोत्साहन देती है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना पहली जीवित संतान के लिए गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को तीन किस्तों में पांच हजार रुपये देती है। मुख्यमंत्री मातृत्व सहायता योजना दूसरी संतान के लिए भी कुछ श्रेणियों की महिलाओं को सहायता प्रदान करती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत हर महीने नौ तारीख को विशेषज्ञ जांच और अल्ट्रासाउंड जैसी सेवाएं दी जाती हैं।
सुरक्षित मातृत्व आश्वासन पहल सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण देखभाल सुनिश्चित करने पर जोर देती है। इसके बावजूद अफसोस यह है कि राज्य में कई बार महिलाओं को अस्पताल पहुंचने के बाद भी खुले में या गेट पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा है। फरीदाबाद के धौज स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रविवार रात जो कुछ हुआ, वह किसी एक रात की घटना नहीं है। पूरे राज्य में अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।
रविवार रात साढ़े तीन बजे प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को लेकर परिजन पीएचसी पहुंचे तो गेट पर ताला लटका मिला। मजबूरी में खुले में महिला का प्रसव कराना पड़ा। सिविल सर्जन ने धौज पीएचसी के एसएमओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया है, लेकिन इससे क्या स्थिति सुधर जाएगी? यह अहम सवाल है। मीडिया रिपोर्टों में फरीदाबाद, झज्जर और करनाल जैसे जिलों में समय-समय पर गेट बंद होने, स्टाफ की कमी या देरी के कारण ऐसी घटनाएं सामने आई हैं।
इन घटनाओं से साफ है कि योजनाओं के बावजूद रात के समय आपात द्वार, स्टाफ की उपस्थिति और संचार व्यवस्था में खामियां बनी हुई हैं। गर्भवती महिलाओं को ऐसी स्थिति से बचाने के लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर रात भर आपात द्वार खुला रखना, स्पष्ट संकेत बोर्ड लगाना, स्टाफ की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करना और नियमित निगरानी जरूरी है। परिवारों को पहले से पता होना चाहिए कि रात में किस द्वार से प्रवेश करना है। गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण, उच्च जोखिम वाले मामलों की पहचान और समय पर रेफरल मजबूत किया जाना चाहिए।