वास्तविक नियंत्रण रेखा के छह-सात किलोमीटर अंदर चीनी सैनिकों द्वारा तंबू लगाने की खबरें आई थीं। इसके बाद भारतीय फौज ने अपनी तैनाती बढ़ाई। इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक ने दो दिन पहले आधिकारिक रूप से कई स्थानों पर फेस-आॅफ जारी रहने की पुष्टि की है। हालांकि हिंसक झड़प की कोई घटना सामने नहीं आई है। भारतीय फौज और चीनी सेना के बीच जारी टकराव को सिर्फ एक सैनिक झड़प के तौर पर नहीं देखा जा सकता है।
इसके पीछे इतिहास, भूगोल और भू-राजनीति के कई परतें हैं। इस क्षेत्र में भारत का प्रशासन, चुनाव, विकास कार्य और जनजीवन दशकों से निर्बाध चल रहा है। स्थानीय मोनपा और अन्य जनजातीय समुदाय खुद को भारतीय मानते हैं। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चीनी घुसपैठ या नाम बदलने की कोशिश को भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है। इसे किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता है। सामरिक दृष्टिकोण से भी भारत का तर्क है कि अरुणाचल प्रदेश, विशेषकर तवांग, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है और यदि यहाँ चीन दखलंदाजी करता है, तो पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
इसीलिए वहाँ बुनियादी ढांचे, सड़कों और सैनिक तैनाती को बढ़ाना उसकी रक्षात्मक मजबूरी है। दूसरी तरफ चीन इस पूरे क्षेत्र को जांगनान या दक्षिणी तिब्बत कहता है। मैकमोहन रेखा को ही सिरे से खारिज करता है। उसका तर्क है कि शिमला समझौते पर तत्कालीन तिब्बती प्रतिनिधि और ब्रिटिश भारत ने हस्ताक्षर किए थे। भारत सरकार ने इस बात को कभी स्वीकार ही नहीं किया। भारत और चीन दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और आपसी व्यापार तथा क्षेत्रीय स्थिरता उनके हित में है। ब्रिक्स जैसे मंचों पर सहयोग जारी रखने के बावजूद सीमा पर तनाव बढ़ाना दोनों के लिए नुकसानदेह है।
इसलिए वार्ता, विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठकें और कोर कमांडर स्तर के संवाद जारी रखने चाहिए। सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन आक्रामक रुख अपनाने से पहले सभी शांतिपूर्ण विकल्प आजमाने चाहिए। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर जारी यह टकराहट सिर्फ सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक धैर्य और क्षेत्रीय शांति की परीक्षा है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अपने हितों की रक्षा करते हुए संवाद का रास्ता खुला रख पाते हैं या नहीं।

