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Saturday, October 31, 2026

नैरेटिव बदल पाएगी एक नवंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली?


अशोक मिश्र

इंडिया गठबंधन ने आज ‘सड़क पर संसद’ का आयोजन बरसात की वजह से टाल दिया है। सड़क पर संसद का आयोजन अब 31 अक्टूबर को होगा। एक नवंबर को रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली प्रस्तावित है। रैली में लगभग दस लाख लोगों के आने का दावा किया जा रहा है। एक नवंबर को प्रस्तावित रैली को लेकर जनमानस में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या प्रस्तावित रैली से देश में सत्ता परिवर्तन हो सकेगा? क्या रैलियां करके या सड़क पर संसद का आयोजन करके लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है? कुछ इसी तरह का सवाल भारतीय लोकतंत्र में हर बड़े आंदोलन के साथ उठता है। 

रैली समर्थकों का तर्क है कि जब संसद के भीतर विपक्ष की आवाज को पर्याप्त जगह नहीं मिलती, कार्यवाही बार-बार बाधित होती है या स्थगित कर दी जाती है, तो सड़क ही एकमात्र मंच बचता है जहां जनता से सीधा संवाद किया जा सके। रैली सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं है, वह नैरेटिव बनाने का औजार है। सड़क पर उतरने से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा आती है। मीडिया का ध्यान खिंचता है। सरकार पर नैतिक दबाव बनता है कि वह उठाए गए मुद्दों पर जवाब दे। इतिहास में भी कई बार देखा गया है कि संसद में अटके मुद्दों ने सड़क के दबाव से ही गति पकड़ी है, चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन रहा हो या किसान आंदोलन। इस लिहाज से विपक्ष का सड़क पर उतरना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही विस्तार है, उसका उल्लंघन नहीं। रैलियाँ जनसमर्थन जुटाने, मुद्दों को उजागर करने और राजनीतिक नैरेटिव बदलने का मजबूत माध्यम साबित होती हैं, लेकिन वे सीधे सत्ता नहीं बदलतीं। सत्ता का असली आधार चुनाव होते हैं जहाँ मतदाता फैसला करते हैं। 

रैलियाँ जनभावना को आकार दे सकती हैं, विपक्ष को एकजुट कर सकती हैं, लेकिन सरकार नहीं बदल सकती हैं। ऐतिहासिक उदाहरणों में जेपी आंदोलन ने आपातकाल के बाद राजनीतिक माहौल बदला, अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाया और किसान आंदोलन ने कृषि कानूनों को वापस लेने पर मजबूर किया। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता बढ़ती है और सत्ता पक्ष को जवाबदेही का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर रैलियों की सीमाएं साफ हैं। वे अस्थायी शोर मचा सकती हैं लेकिन बिना संगठित चुनावी रणनीति और जमीनी स्तर पर काम के असर नहीं डालतीं। भीड़ जुटाना महंगा और चुनौतीपूर्ण होता है। अगर भागीदारी कम रहे या हिंसा हो जाए तो उल्टा असर पड़ता है। सत्ता पक्ष इसे अराजकता बताकर अपनी स्थिति मजबूत कर लेता है। व्यापारियों की शिकायतें, ट्रैफिक जाम या पुलिस कार्रवाई नकारात्मक छवि बना सकती है। 

भारत में संवैधानिक संस्थाओं को हटाने या बदलने की एक तय प्रक्रिया है। एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हो या मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी मुद्दा, वह चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी को हटाने का प्रावधान भी बहुत स्पष्ट और कठिन रखा गया है। अनुच्छेद 324 और संबंधित कानूनों के तहत सीईसी को उसी तरह और उतनी ही कठिन प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, यानी संसद के दोनों सदनों में सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। सिर्फ रैलियां करके, नारेबाजी करके या सड़क पर सांकेतिक संसद लगाकर इस संवैधानिक सुरक्षा कवच को भेदना कानूनी रूप से संभव नहीं है। सरकारें भी इस बात को जानती हैं, इसलिए सड़क के दबाव को वे अक्सर राजनीतिक शोर मानकर अनदेखा कर देती हैं। अक्टूबर 2026 के अंत में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वोट चोरी और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के आरोपों पर अभियान चला रहे हैं। मांगें मुख्य रूप से सीईसी का इस्तीफा, एसआईआर पर रोक और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की हैं। 

कल की सड़क पर संसद या मॉक इम्पीचमेंट (नकली महाभियोग) का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर प्रतीकात्मक कार्यक्रम है जिसमें पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार की अध्यक्षता में प्रस्ताव पेश करने और भाषणों की योजना है।  राजनीति में असल बदलाव तब आता है जब रैलियाँ चुनावी नतीजों में तब्दील हों। ये कार्यक्रम विपक्ष के लिए ताकत दिखाने और मुद्दा जीवित रखने का माध्यम हैं। सत्ता परिवर्तन का फैसला अंतत: मतदाता चुनाव के दौरान अपने मतपत्रों से करेंगे। दोनों पक्षों के दावों को आलोचनात्मक नजर से देखना जरूरी है क्योंकि आरोप और जवाब दोनों की जांच होनी चाहिए। कुल मिलाकर रैलियाँ सत्ता परिवर्तन का सहायक औजार हैं न कि मुख्य। वे दबाव और जागरूकता पैदा करती हैं लेकिन स्थायी बदलाव के लिए चुनाव, संगठन और जनविश्वास जरूरी होता है। लंबी अवधि में अगर मुद्दा व्यापक जनसमर्थन पा गया तो चुनावी सुधारों पर दबाव बढ़ेगा लेकिन अगर सीमित रहा तो यह सिर्फ विपक्षी प्रदर्शनों की श्रृंखला का एक और अध्याय रह जाएगा।