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Monday, September 7, 2026

पापों के प्रायश्चित में जुट जाओ


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पता नहीं यह कथा कितनी सही है, लेकिन कहते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इसका जिक्र है। राजगृह में एक चरवाहे की पत्नी बहुत सुंदर और नृत्य-संगीत कला में काफी निपुण थी। उसकी विद्या से राजगृह की अमीर घरों की महिलाएं और कन्याएं ईर्ष्या करती थीं। राजगृह में होने वाले आयोजनों में उस चरवाहे की पत्नी को नृत्य आदि के लिए आमंत्रित किया जाता था। एक बार उत्सव में उसे आमंत्रित किया गया, लेकिन उसने गर्भवती होने की वजह से नृत्य के लिए मना कर दिया। 

उसे सभा में अपमानित करके नृत्य के लिए मजबूर कर दिया गया। इस अपमान से उसके मन में क्रोध पनप उठा। वह जीवन भर इस घटना को मन में दबाए रही। कहते हैं कि अगले जन्म में वह हारीति नाम की यक्षिणी के रूप में पैदा हुई। उसके मन में पूर्व जन्म का प्रतिशोध इस जन्म में भी बना रहा। लेकिन संगीत और नृत्य की प्रतिभा भी बनी रही। प्रतिशोधवश वह राजगृह के अबोध बच्चों को चुराकर उनका खाने लगी। 


बहुत बाद में लोगों को यह पता चला, तो राजगृह नरेश ने उसे बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। जब यह बात महात्मा बुद्ध ने सुनी तो वह चौंक उठे। उन्होंने ध्यान लगाकर उसके पूर्व जन्म के बारे में जाना। उन्होंने राजगृह नरेश से कहकर हारीति को कारागार से मुक्त करवा लिया और उसके बच्चों को चुरा लिया। बच्चे चोरी हो जाने पर वह व्याकुल हो गई। 

अब उसकी समझ में आयाकि उसने जिनके बच्चों का वध किया था। वह कैसे जी रहे होंगे। शोक और व्याकुल अवस्था में वह बुद्ध के पास पहुंची। बुद्ध ने कहा कि तुमने अब तक बच्चों का वध किया है। पाप के प्रायश्चित के लिए बच्चों की रक्षा और विकास में जुट जाओ। इसी से तुम्हें शांति मिलेगी। अपने पाप का प्रायश्चित करने में वह आजीवन लगी रही। जब उसकी मृत्यु हुई तो उसके मन में काफी शांति थी।