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Tuesday, September 15, 2026

दानदाता का संतुष्ट होना जरूरी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कौशल नरेश प्रसेनजित का यह नियम था कि वह वर्ष भर में अपने राज कर्मचारियों और उनके परिवार को वस्त्र दान किया करते थे। कहते हैं कि उनके यहां पांच सौ राजकर्मचारी थे। समय आने पर उन्होंने राजकर्मियों को वस्त्र दिए। संयोग से उन्होंने दिनों महात्मा बुद्ध के प्रिय सेवक आनंद ने प्रवचन करते हुए कहा कि मनुष्य को अपरिग्रह का पालन करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना चाहिए। 

राज कर्मचारी संघ की शास्ता से परिचित थे। तो उन्होंने सोचा कि कहीं महाराज द्वारा दिए गए वस्त्र अपरिश्रम और लोभ से जुड़ा हुआ है। वह सब धर्मनिष्ठ थे, तो उन्होंने सारे वस्त्र लाकर आनंद को दान कर दिए। धीरे-धीरे यह बात महाराज प्रसेनजित तक पहुंची। यह बात जानकर प्रसेनजित को क्रोध आ गया कि दूसरों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले आनंद ने पांच सौ वस्त्र ग्रहण कर लिए। वह अगले दिन संघाराम पहुंच गए। 

आनंद ने उनका सादर अभिवादन किया। प्रसेनजित ने क्रोध में पूछा कि भंते! आप भिक्षु हैं। आपने पांच सौ वस्र कैसे ग्रहण कर लिए? आनंद उन्हें संघाराम की ओर ले गए और बताया कि यहां के भिक्षुओं के चीवर उपयोग लायक नहीं रह गए थे। इसलिए मैंने सारे वस्त्र उनमें वितरित कर दिए। 

प्रसेनजित ने रोष से पूछा, और उनके पुराने वस्त्र? उनका क्या हुआ? आनंद ने नम्रता से जवाब दिया, भिक्षुओं के पुराने वस्त्रों की कथरी बना दी गई है ताकि  बिछाने के काम आए। मेरा एक ही चीवर से काम चल जाता है, तो मैंने केवल एक ही वस्त्र लिया है। यह सुनकर प्रसेनजित को बहुत दुख हुआ। उन्होंने आनंद से क्षमा मांगी। आनंद ने कहा कि महाराज! दान पाने वाले से ज्यादा दान देने वाले का संतुष्ट होना जरूरी है।