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Thursday, September 3, 2026

अपनी धुन के पक्के निकले बोधिसत्व

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जातक कथाओं में बुद्ध के संबंध में एक कथा कही गई है। कहते हैं कि पूर्ण बुद्ध के पैदा होने से पहले बोधिसत्व ने काशी नरेश ब्रह्मभद्र के यहां कनिष्ठ पुत्र के रूप में हुआ। जब वह बड़े हुए तो उन्हें राजा बनने की इच्छा हुई। काशी में वह बन नहीं सकते थे क्योंकि छोटे पुत्र थे। उन्होंने उस समय के बहुत बड़े तांत्रिक महासिद्ध प्रत्यंग से अपनी कामना पूर्ति का उपाय पूछा, तो महासिद्ध ने बताया कि अगले महीने तक्षशिला का राज सिंहासन खाली होने वाला है। वह जो भी व्यक्ति पूर्णिमा के दिन सुबह राज महल के फाटक पर खड़ा मिलेगा, वही राजा बनेगा। 
अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए वह उसी समय चल पड़े। जानकारी मिलने पर उनके पांच मित्र भी उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए। चलते समय महासिद्ध प्रत्यंग ने बताया कि रास्ते में यक्ष वन मिलता है। वहां की यक्षिणियां रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श से राहगीरों को फुसलाती हैं और उनको भोगती हैं और क्षीण होने पर मारकर खा जाती हैं। 
बोधिसत्व ने चल पड़े। यक्ष वन में एक यक्षिणी ने उनको फुसलाना चाहा, लेकिन वह अपने निश्चय से डिगे नहीं। वह उनके पीछे-पीछे चलती चली आई, लेकिन उनके पांचों मित्र रूपसी यक्षिणियों पर मोहित हो गए और बाद में काल के गाल में समा गए। वह यक्षिणी उनके पीछे-पीछे आती रही। वह मुहूर्त की प्रतीक्षा में एक कुंज में रुक गए। तब तक यक्षिणी की सुंदरता की खबर फैल चुकी थी। 
तक्षशिला के राजा ने यक्षिणी को पटरानी बनाने का आश्वासन देकर विवाह कर लिया। उसने राजमहल में अन्य यक्षिणियों को भी बुला लिया। सबने मिलकर सबका भक्षण कर लिया। नियत समय जब राज महल से बाहर रहने वालों ने फाटक तोड़ना चाहा, तो वहां सबसे पहले बोधिसत्व खड़े दिखे। सबने बोधिसत्व को ही वहां का राजा बना दिया और यक्षिणियों से राज्य को मुक्त कराया। एक दिन बोधिसत्व ने अपनी प्रजा से कहा कि रूप, शब्द, रस, स्पर्श और गंध ही पांच यक्षिणियां हैं। जो विनाश का कारण बनती हैं।