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Saturday, September 5, 2026

जागरूक नागरिक रोक सकते हैं हरियाणा में फैला ड्रग्स कारोबार

अशोक मिश्र

हरियाणा की पहचान दूध-दही युक्त पौष्टिक भोजन और भारतीय सेना में अधिक से अधिक जवानों को भेजने वाले प्रांत के रूप में रही है। हरियाणा को सदियों पुरानी अपनी सभ्यता और संस्कृति पर हमेशा गर्व रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता से जुड़ाव का सौभाग्य देश के कम राज्यों को मिला है। हरियाणा को अपनी इस उपलब्धि पर हमेशा गर्व रहा है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से हरियाणा में नशीले पदार्थों का चलन बढ़ता जा रहा है। प्रदेश खामोश नशे की चपेट में है और इस चपेट का सबसे तीखा सिरा दिल्ली से सटा फरीदाबाद बन चुका है। फरीदाबाद का हॉटस्पॉट बनना कोई संयोग नहीं है। 

यह भूगोल और अर्थशास्त्र दोनों का परिणाम है। 135 किमी लंबा कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे अपने दस इंटरचेंज के साथ तस्करों के लिए खुला कॉरिडोर बन गया है, जहाँ से माल आसानी से गुरुग्राम, पलवल और दिल्ली में उतर जाता है। हरियाणा स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के आंकड़ों से साफ है कि प्रदेश में एक ही तरह का नशा नहीं है बल्कि एक पूरा बाजार है। एक तरफ पंजाब से सटा बार्डर और दिल्ली का नाइटलाइफ कल्चर सस्ती आपूर्ति बनाता है, दूसरी तरफ मांग के पीछे गहरी सामाजिक दरार है। 

हरियाणा में खेती का संकट, जमीन बंटती जा रही है, सरकारी नौकरी की दौड़ में लाखों युवा सालों तक कोचिंग में अटके हैं, और फरीदाबाद-गुरुग्राम के फैक्ट्री-मजदूरों और डिलीवरी ब्वॉय की अनिश्चित जिंदगी में थकान और अकेलेपन को सुन्न करने का सबसे सस्ता तरीका एक पुड़िया लगती है। आर्थिक रूप से यह कारोबार आसान मुनाफे का स्रोत बन गया है क्योंकि बेरोजगार युवा तस्करी या फुटकर बिक्री में लग जाते हैं। सामाजिक रूप से जातिगत प्रभाव, परिवारों का टूटना और खप पंचायतों की सीमित पहुंच ने समस्या को और गहरा दिया है। 

पुलिस और प्रशासन ने हरियाणा स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के माध्यम से कड़ी कार्रवाई शुरू की है। एनडीपीएस एक्ट के तहत बड़े पैमाने पर मामले दर्ज किए जा रहे हैं, व्यावसायिक मात्रा की जब्ती पर जोर दिया जा रहा है, अंतर्राज्यीय नेटवर्क तोड़े जा रहे हैं और पीआईटी-एनडीपीएस के तहत आदतन अपराधियों को हिरासत में लिया जा रहा है। संपत्तियों की कुर्की और ध्वस्तीकरण के साथ-साथ जागरूकता अभियान, खेल आयोजन और नशा मुक्त गांव घोषित करने के प्रयास चल रहे हैं। 

हरियाणवी संस्कृति जो कभी सामूहिक श्रम और फौजी अनुशासन पर टिकी थी, वह अब तात्कालिक नशे के आराम और दिखावटी हाई-प्रोफाइल लाइफस्टाइल की नकल में उलझ गई है। बेरोजगारी, कृषि संकट, युवाओं में निराशा और विदेश जाने की असफल कोशिशें नशे की ओर धकेल रही हैं। यह समस्या केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं सुलझेगी। रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार, परिवारों की भागीदारी और दीर्घकालिक पुनर्वास बिना यह संकट गहराता रहेगा।