Sunday, November 16, 2014

बज्जर पड़े 'किस ऑफ लवÓ पर

अशोक मिश्र
मेरे काफी पुराने मित्र हैं मुसद्दीलाल। मेरे लंगोटिया यार की तरह। हालांकि वे उम्र में मुझसे लगभग पंद्रह साल से ज्यादा बड़े हैं। मेरी दाढ़ी अभी खिचड़ी होनी शुरू हुई है और उनके गिने-चुने काले बाल विदाई मांग रहे हैं। (बात चलने पर बालों पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि बाल तो बचपन में ही धूप में सफेद हो गए थे, उन दिनों जेठ की भरी दुपहरिया में पतंग जो उड़ा करता था।) हम दोनों में काफी पटती है। जब भी मुसद्दी लाल को लगता है कि आज पत्नी से पिट जाएंगे, तो वे भागकर हमारे घर आ जाते हैं। मैं भी ऐसी स्थिति से बचने के लिए उनके घर की शरण लेता हूं। जब भी किसी पार्टी या महफिल में उन्हें जोश चढ़ता है, तो वे बड़े गर्व के साथ यह कहने में संकोच नहीं करते हैं कि मैं रसिक हूं, लेकिन अय्यास नहीं। रसिक होना, न तो बुरा है, न कानून जुर्म। रसिकता तो मुझे विरासत में मिली है। मेरे बाबा ने तो बाकायदा अपना नाम ही रख लिया था, ढकेलूराम 'रसिकÓ। पिता जी संस्कृतनिष्ठ थे, तो उनका तख्लुस रसज्ञ था।
कल चौराहे पर मुझे मुसद्दीलाल मिल गए। उनका मुंह काफी सूजा हुआ था। मुझे देखकर पहले तो उन्होंने इस तरह कन्नी काटने की कोशिश की, मानो उन्होंने मुझे देखा ही नहीं है। मैं जब उनके ठीक सामने जाकर अड़ गया, तो मुझे देखते ही कराह उठे। अपनी दायीं हथेली को बायें गाल पर ले जाकर धीरे से गाल को सहलाया। मैंने बहुत गंभीर होने का अभिनय करते हुए पूछा, 'क्या हुआ भाई साहब! कहीं चोट-वोट लग गई है क्या?Ó मेरी बात को नजरअंदाज करते हुए बोले, 'यार! मोदी जी ने वायदा किया था कि उनकी सरकार आई, तो तीन महीने के अंदर अच्छे दिन आ जाएंगे? क्या अच्छे दिन आ गए, जब टमाटर अभी तक चालीस रुपये किलो पर ही अटका हुआ है।Ó मैंने जवाब देते हुए दोबारा पूछने का दुस्साहस किया, 'अच्छे-वच्छे दिन तो भूल ही जाइए। यह बताइए, आपको हुआ क्या है? आपका मुंह क्यों सूजा हुआ है? कहीं गिर-विर पड़े थे क्या?Ó मुसद्दी लाल ने अपने बायें हाथ में पकड़ा थैला दायें हाथ में लेते हुए कहा, 'यह बताओ, आज आफिस गए थे। सुना है कि फल मंडी के पास बहुत बड़ा जाम लगा था। कोई हीरोइन शहर में आई थी, जो उसी तरफ से गुजरने वाली थी। सो, सुबह से ही जाम लगा था।Ó मैंने खीझते हुए कहा, 'आज मैं फल मंडी की ओर से आफिस नहीं गया था। इसलिए मुझे पता नहीं कि हीरोइन के आने से फल मंडी में जाम लगा था या नहीं। लेकिन मेरी बात को टालिए नहीं। साफ-साफ बताइए, आपको क्या हुआ है? कहीं चोट लगी है? किसी से झगड़ा हुआ है? किसी ने मारा-पीटा है? आप जब तक मुझे अपने चेहरे पर लगी चोटों का हिसाब नहीं दे देंगे, मैं आपके सामने से नहीं हटूंगा। यह मेरी नई किस्म की गांधीगीरी समझ सकते हैं।Ó
मेरी धमकी शायद असर कर गई थी। वे एक बार फिर अपने हाथ को गाल तक ले गए और उसको सहलाते हुए कराह उठे। फिर चारों तरफ देखते हुए बोले, 'यार! क्या बताऊं। 'किस आफ लवÓ के चक्कर में चेहरे का भूगोल बदल गया। यह सब उस नालायक हरीशवा के चलते हुआ है। अगर कहीं मिल गया, तो लोढ़े से उसका मुंह कूंच दूंगा। साला गद्दार..।Ó मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, 'अमां यार! तुम लंतरानी ही हांकोगे या कुछ बकोगे भी। हुआ क्या, मामला पूरा बताओ।Ó मुसद्दीलाल ने गहरी सांस ली और बोले, 'परसों आफिस में हरीश आया और बोला कि हमारे मोहल्ले में रुढि़वादियों का विरोध करने के लिए किस ऑफ लव का आयोजन किया गया है। आपको (यानी मुझे) भाग लेना है।Ó मैंने लाख हीलाहवाली की। कई तरह की बातें रखीं। लेकिन वह नहीं माना। मुझे आफिस टाइम के बाद घसीटकर अपने मोहल्ले में ले गया। और फिर वहीं वह हो गया जिसकी कल्पना भी नहीं की थी।Ó अब मेरी समझ में कुछ-कुछ आने लगा था। मैंने पूछा, 'तो जिसको किस करने वाले थे या किया था, उसका कोई भाई, पति या पिता आ गया था क्या?Ó मेरे सवाल पर मुसद्दी लाल एक बार फिर कराह उठे, 'नहीं..साले हरीशवा ने मेरी पत्नी को इसके बारे में बता दिया था।Ó मुसद्दीलाल की बात सुनते ही मैं ठहाका लगाकर हंस पड़ा, 'बज्जर (वज्र) पड़े ऐसे किस ऑफ लव पर।Ó इसके बाद हम दोनों चुपचाप घर लौट आए।

Monday, November 10, 2014

फिर गए घूरे के भी दिन

-अशोक मिश्र
बचपन में मैं हिंदी की कक्षा में अक्सर पिट जाया करता था। हिंदी के मास्टर साहब का अगर मूड ठीक नहीं होता, तो वे बस मुझसे मुहावरा पूछ बैठते। मैं गड़बड़ा जाता और नतीजा यह होता कि उन्हें मुझे जी भरकर पीटने का बहाना मिल जाता। यह बात तो मैं आज समझ सकता हूं कि गुरु जी घर में दब्बू किस्म के रहे होंगे। वे अपनी पत्नी से ज्यादा तू-तड़ाक नहीं कर पाते रहे होंगे। स्कूल आने से पहले हो सकता है कि घर के बरतन खडक़ जाते रहे होंगे। (एक कहावत है कि जहां चार बरतन यानी आदमी होंगे, खडक़ेंगे ही यानी मार-पिटाई होगी ही।) जैसा कि आम घरों में होता है। अपने दब्बूपने की कुंठा और घर में बरतन खडक़ने की पीड़ा वे मुझे ठोंक-पीटकर निकालते रहे होंगे। पता नहीं, यह मेरा दुर्भाज्य था या हिंदी के मास्टरों की साजिश। यह क्रम पांचवीं कक्षा से शुरू हुआ और बारहवीं कक्षा तक चला। जब भी पास होकर अगली कक्षा में जाता, हिंदी वाले मास्टर साहब किसी न किसी बहाने मुझसे एक ही मुहावरे का अर्थ पूछते थे। वह मुहावरा होता था, बारह साल बाद घूरे के भी दिन फिर जाते हैं। इसको सोदाहरण समझाओ। बस यहीं गड़बड़ हो जाती थी। मैं समझ नहीं पाता था कि भला घूरे के दिन कैसे फिरते हैं? 
ऐसा नहीं था कि मैं घूरा नहीं जानता था। बचपन में जब भी गांव जाता था, तो मेरे बाबा टोकरी भर गोबर मेरे सिर पर रख देते और कहते, जाओ घूरे पर फेंक आओ। मन ही मन भुनभुनाता टोकरी भर गोबर घूरे पर फेंकने चला जाता। मजाल है कि बाबा के आदेश के खिलाफ कोई चूं भी करे। यह घूरा मुझे आज तक तंग करता रहा। मास्टर साहब, मेरे बड़े भइया और बाबू जी ने मिलकर मुझे बचपन में लाख समझाया कि घूरे के दिन कैसे फिरते हैं? कई तरह के उदाहरण पेश किए, लेकिन मेरी मोटी बुद्धि में नहीं घुसा, तो नहीं घुसा।
धीरे-धीरे बचपन गया, जवानी आई। जवानी विदाई मांग रही है, अधेड़ावस्था दरवाजे पर खड़ा दस्तक दे रहा है, लेकिन फिर भी यह समझ में नहीं आया कि घूरे के दिन आखिर फिरते कैसे हैं? बचपन में रटा-पढ़ा तो जब बचपन में ही याद नहीं रह पाता था, तो जवानी में याद रह पाने का सवाल ही नहीं उठता है। हां, वह तो भला हो, दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और शाजिया इल्मी का जिन्होंने वह काम कर दिखाया, जो आज तक मेरे बड़े नहीं कर पाए। दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर पर हुए ड्रामे की तस्वीरें अखबारों में देखी, तो एकाएक मेरे दिमाग की बत्ती जल उठी। इस (यानी कि मैं) घूरे के दिन भी फिर गए। मैं समझ गया कि बारह साल बाद घूरे के दिन फिरने का क्या मतलब होता है। अब मैं न केवल इस मुहावरे का अर्थ जान गया हूं, बल्कि किसी को भी समझा सकता हूं। बाकायदा उदाहरण देकर। अगर किसी को इस मुहावरे का अर्थ जानना-समझना हो, तो वह मेरे पास आकर समझ सकता है।

Sunday, November 9, 2014

ऐसे तो साफ नहीं होगा भारत

अशोक मिश्र
इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाए जा रहे 'स्वच्छ भारतÓ अभियान की बड़ी चर्चा है। २ अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी शुरुआत खुद झाड़ू लगाकर की थी। वाराणसी के अस्सी घाट में भी उन्होंने कुदाल चलाकर लोगों को स्वच्छ भारत अभियान से जोडऩे की कोशिश की है। उन्होंने ऐसा करके इस देश के करोड़ों लोगों को सफाई अभियान से जोडऩे की कोशिश की। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर कार्यक्रम शुरू करने के पीछे मंशा यही थी कि भारत को स्वच्छ रखकर ही महात्मा गांधी को सच्ची शृद्धांजलि दी जा सकती है। यह सर्वविदित है कि आजादी से पूर्व महात्मा गांधी ने भी हरिजनों की सामाजिक दशा से व्यथित होकर देशवासियों से अपना शौचालय खुद साफ करने को प्रेरित किया था ताकि देश के करोड़ों हरिजन शौचालय साफ करने जैसे अमानवीय पेशे से मुक्त हो सकें और दूसरी जाति के लोगों को भी उनकी पीड़ा का आभास हो सके। गांधी जी खुद अपना शौचालय साफ करते थे। यह सही है कि जब तक आसपास का वातावरण स्वच्छ न हो, स्वस्थ भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है। स्वच्छ भारत अभियान से देश में साफ-सफाई के प्रति कितनी जागरूकता पैदा हुई, इसकी समीक्षा का वक्त अभी नहीं आया है। हां, एक बात जरूर देखने में आ रही है कि लोग इस मुहिम से जुड़ रहे हैं। क्रिकेट, फुटबॉल, सिनेमा जगत, उद्योग जगत से लेकर राजनीतिक हलके के लोग इस अभियान को हाथों हाथ ले रहे हैं। स्कूल-कालेजों से लेकर गली-मोहल्ले के लोग भी स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेकर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कराने में जुटे हुए हैं। रेलवे स्टेशन से लेकर हवाई अड्डे तक झाड़े-बुहारे जा रहे हैं। गली-कूचों में बिखरा रहने वाला कूड़ा-कचरा उठाया जा रहा है। लेकिन यह सब हो सिर्फ एक दिन रहा है। आम तौर पर देखने में आ रहा है कि जिस जगह पर स्वच्छता अभियान एक दिन पहले चलाया गया था, मीडिया को बुलाकर फोटो शूट करवाया गया था, अगले दिन उस जगह की हालत वैसी ही नजर आ रही थी, जैसी स्वच्छता अभियान चलाने से पहले थी।
ऐसे अभियानों की परिणति ऐसी ही होती है। दरअसल, मीडिया में प्रचार के चलते 'स्वच्छ भारत अभियानÓ को भी एक मनोरंजन की ²ष्टि से लिया जा रहा है। कुछ लोग तो सिर्फ मनोविनोद और प्रचार पाने के लिए सफाई अभियान चलाने का ढोंग कर रहे हैं। मीडिया में अपना चेहरा दिखाने के लिए जायज-नाजायज तरीके अपनाए जा रहे हैं। कुछ ऐसा ही हुआ पिछले दिनों दिल्ली में। इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के सामने की सड़क पर दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और कभी 'आपÓ की नेत्री रही शाजिया इल्मी ने बाकायदा मीडिया के सामने स्वच्छ भारत अभियान के तहत झाड़ू लगाया, फोटो खिंचवाया और चले गए। बाद में एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के फोटोग्राफर ने खुलासा किया कि यह सब कुछ वैसा नहीं था, जैसा दुनिया को दिखाया गया। पहले कूड़ा लाकर बिखेरा गया और फिर इन नेताओं से साफ करवाकर वाहवाही लूटी गई। अब भाजपा इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर की घटना से अपना संबंध मानने से इनकार कर रही है। हो सकता है कि जिन भाजपा नेताओं ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया है, उनकी ऐसी मंशा न रही हो, लेकिन जो कुछ हुआ, वह हास्यास्पद ही है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामान्य बात को भी विशेष बना देने की कला जानते हैं। वे अपनी छवि बनाने के लिए मीडिया का उपयोग करना भी जानते हैं। स्वच्छ भारत अभियान चलाने के पीछे भले ही उनकी मंशा प्रचार पाने की न रही हो, लेकिन जिस तरह लोग मनोरंजन की ²ष्टि से इससे जुड़ रहे हैं, वह अच्छा नहीं है। जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक स्वच्छ भारत अभियान का ही नहीं, किसी भी अभियान का ऐसा ही हाल होगा। जब तक व्यक्ति के अंत:करण में यह भावना पैदा नहीं होगी कि हमें अपने आसपास का वातावरण साफ-सुथरा रखना चाहिए, गली-मोहल्ला चमकना चाहिए, तब तक ऐसे अभियानों से कुछ होने वाला नहीं है। 

Saturday, November 8, 2014

ऊल्लू की दुम होता है पत्रकार

-अशोक मिश्र 
नथईपुरवा गांव में कुछ ठेलुए किस्म के लोग कुएं की जगत पर बैठे टाइम पास कर रहे थे। बहुत दिनों बाद मैं भी गांव गया था, तो मैं भी उस जमात में शामिल हो गया। छबीले काका ने अचानक मुझसे लिया, 'ये पत्रकार क्या होता है, बेटा! कोई तोप-वोप होता है क्या? बड़ा बखान सुनते हैं पत्रकारों का।Ó उनका सवाल सुनकर मैं सकपका गया। मैंने इस बेतुके सवाल का तल्ख लहजे में जवाब दिया, 'ऊल्लू की दुम  होता है पत्रकार। डाकू गब्बर सिंह होता है। बहुत बड़ी तोप होता है। आपको कोई तकलीफ?Ó मेरे तल्ख स्वर को सुनकर अब सकपकाने की बारी छबीले काका की थी। उन्होंने शर्मिंदगी भरे लहजे में कहा, 'बेटा..आज रतिभान के घर में टीवी पर प्रधानमंत्री मोदी जी को पत्रकारों के साथ खूब गलबहियां डालकर हंसते-बतियाते देखा, तो मुझे भी पत्रकारों के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। वैसे तुम न बताना चाहो, तो कोई बात नहीं। अब उम्र के आखिरी दौर में पत्रकारों के बारे में जान भी लूंगा, तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? अब तो बस चला-चली की बेला है, जब टिकट कट जाए, तो 'लाद चलेगा बंजाराÓ की तरह सारा ज्ञान-ध्यान यहीं छोड़कर चल दूंगा। तब न किसी का मोह रहेगा, न ज्ञान की गठरी का बोझ।Ó मेरे तल्ख स्वर से छबीले काका आहत हुए थे या कोई और बात थी? उनके इस तरह अचानक आध्यात्मिक हो जाने से मैं भीतर ही भीतर पसीज उठा।
अब शर्माने की बारी मेरी थी। मैंने कोमल लहजे में कहा, 'काका! अब आपको क्या बताएं कि पत्रकार क्या होता है? कहने को तो उसकी भूमिका जनता के अधिकारों की रक्षा करने वाले सजग प्रहरी की होती है। लेकिन अब यह बात सिर्फ किताबों तक ही सिमट गई है। अब वह मंत्री, विधायक, सांसद, नेता और उद्योगपतियों के हितों की रक्षा पहले करता है, अपने बारे में बाद में सोचता है। दरअसल, पत्रकार या तो नेताओं, अफसरों, पूंजीपतियों और अपने अखबार के मालिक की चंपी करता है या फिर वसूली। वसूलने की कला में प्रवीण पत्रकार तो कई सौ करोड़ रुपये की गाडिय़ों पर चलते हैं, तो कई अपनी बीवी की फटी साड़ी में पैबंद लगाने के फेर में ही जीवन गुजार देते हैं। काका! पत्रकारों की कई केटेगरियां होती हैं। चलताऊ पत्रकार, बिकाऊ पत्रकार, सेल्फी पत्रकार, डग्गाबाज पत्रकार, दबंग पत्रकार, हड़बंग पत्रकार, कुंठित पत्रकार, अकुंठित पत्रकार। हां, आपका पाला किस तरह के पत्रकार से पड़ा है, यह अलग बात है।Ó
 'गरीबन कै मददगार भी तो होत हैं पत्रकार..एक बार बप्पा का थानेदार बहुत तंग कर रहा था, तो वहां मौजूद एक पत्रकार ने बप्पा की तरफ से कुछ बोल दिया। फिर क्या था, थानेदार ने न केवल बप्पा की लल्लो-चप्पो की, बल्कि बिना कुछ छीने-झपटे घर भी जाने दिया।Ó कंधई मौर्य ने बीच में अपनी टांग अड़ाई। मैंने एक बार घूमकर कंधई को देखा और कहा, 'बाद में तुम्हारे बप्पा ने तीन दिन तक बिना कुछ लिए-दिए उसके घर की रंगाई-पुताई की थी। घर से तीन किलो सत्तू, पांच किलो अरहर की दाल लेकर गए थे, वह अलग। बात करते हैं गरीबों के हिमायती होने के। पत्रकार भी इस समाज का हिस्सा है। दया, ममता, क्रोध, हिंसा, लालच, भ्रष्टाचार जैसी प्रवृत्तियां उसमें भी पाई जाती हैं। वह जब अपनी पर उतर आता है, तो बड़े-बड़े पानी मांगते हैं। चापलूसी में भी वह अव्वल ही रहता है।  जितनी ज्यादा चापलूसी, जिंदगी में उतनी ही ज्यादा तरक्की। रुपया-पैसा, गाड़ी-घोड़ा से लेकर देश-विदेश की यात्रा तक कर आते हैं पत्रकार, इसी चरणवंदना के सहारे। पत्रकारिता का अब सीधा से फंडा है, अखबारों, चैनलों पर भले ही तुर्रम खां बनो, लेकिन मंत्री, अधिकारी और नेता को साधे रहो। वह सामने हो, तो चरणों में लोट जाओ। पीठ पीछे जितना गरिया सकते हो, गरियाओ। आलोचना करो, उसकी कमियों को अपने फायदे के लिए जिनता खोज सकते हो, खोजो। उसे भुनाओ।Ó मेरी बात सुनकर छबीले काका धीरे से उठे और चलते बने।                                                                                                                                                                                                                                                                                                 नोट : मेरे इस व्यंग्य  में चारण-भाट शब्द के  उपयोग पर राजस्थान के कुछ साथियों ने आपत्ति व्यक्त किया है, मैंने इस शब्द का उपयोग पत्रकारों की चाटुकारिता की प्रवृत्ति को दर्शाने के लिए किया गया था। मेरा उद्देश्य किसी जाति, धर्म या संप्रदाय अथवा व्यक्ति को ठेस पहुंचाने का नहीं था। आज दिनांक ११  दिसंबर २०१४ को शाम लगभग ५ से ६ बजे के बीच मेरे पास राजस्थान के कई व्यक्तियों (डॉ. नरेंद्र सिंह देवल, धर्मेंद्र सिंह चारण, हरेंद्र सिंह, जोगी दान गडवी) के फोन आए जिन्होंने चारण-भाट शब्द के उपयोग पर आपत्ति जताई है। इस शब्द के उपयोग से यदि किसी को ठेस पहुंची हो, तो मैं खेद व्यक्त करता हूं। मैं फिर कहता हूं कि मेरा उद्देश्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था।

Wednesday, November 5, 2014

नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने का पर्व देव दीपावली

-अशोक मिश्र
कार्तिक पूर्णिमा की रात नदियों, खासकर गंगा में लाखों की संख्या में तैरते दीप, गूंजते आरती के स्वर, विभिन्न वाद्य यंत्र, जो मनोहारी दृश्य उपस्थित करते हैं, उसे शब्दों में बयां कर पाना शायद किसी के वश की बात नहीं है। देव दीपावली की रात नदियों के किनारे अदृश्य रूप से उपस्थित होने वाले देवता भी आनंदित हो उठते हैं। नदियों में दीपदान का अर्थ भी यही है कि हम अपने अंतरमन में कहीं छिपे बैठे तम को दूर करते हुए अपने भीतर और बाहर प्रकाश फैलाने और प्रकृति के अभिन्न अंग नदियों, पहाड़ों, पोखरों, वन, खेतों और पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा का संकल्प लें। वैसे तो मनुष्य और प्रकृति का संबंध अटूट है। प्रकृति को देव मानने की हमारी सनातन परंपरा प्रकृति के संरक्षण की ओर ले जाती है। हमारे यहां नदियों, पेड़ों, पत्थरों, नक्षत्रों, चांद-सूरज को देव मानने की परंपरा और पूजा पद्धति दुनिया के अन्य देशों में हो भले ही, लेकिन ऐसा जुड़ाव शायद ही कहीं देखने को मिलता हो। कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देव दीपावली वस्तुत: प्रकृति के संरक्षण का ही पर्व है।
 http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/05-nov-2014-edition-Delhi-City-page_13-3964-3551-4.html 
कहा जाता है कि देव दीपावली के मूल में भगवान शंकर हैं। उन्होंने ही देवताओं और मनुष्यों के साथ-साथ प्रकृति के विनाश को आतुर राक्षस त्रिपुरासुर का वध कार्तिका पूर्णिमा के ही दिन किया था। इसी उत्साह में देवताओं ने दीपावली मनाई थी जिसे हम आज देव दीपावली के नाम से जानते हैं। आज भी देवलोक से गंधर्व, किन्नर, देव और अन्य लोग गंगा और अन्य नदियों के किनारे उपस्थित होकर दीपदान करके दीपावली मनाते हैं। एक दूसरी कथा भी है। कहते हैं कि राजा त्रिशंकु को जब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से स्वर्ग पहुंचा दिया, तो देवताओं ने उन्हें स्वर्ग से नीचे ढकेल दिया। अधर में लटकते त्रिशंकु की पीड़ा विश्वामित्र से देखी नहीं गई। यह उनका भी अपमान था। इससे क्षुब्ध होकर एक नए संसार की रचना करनी शुरू कर दी। माना जाता है कि कुश, मिट्टी, ऊंट, बकरी-भेड़, नारियल, कद्दू, सिंघाड़ा जैसी चीजें उन्होंने ने ही बनाई थी। यहां तक कि उन्होंने त्रिदेवों की प्रतिमाएं बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए थे। नतीजा यह हुआ कि प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया। सारा चराचर जगत अकुला उठा। बाद में जब देवताओं ने इस प्राकृतिक असंतुलन की ओर विश्वामित्र का ध्यान आकृष्ट कराया, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। इन दोनों कथाओं, ऐतिहासिक आख्यानों का निहितार्थ अगर खोजें, तो सिर्फ और सिर्फ यही है कि हमें प्रकृति को असंतुलित होने से बचाना होगा। गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी जैसी नदियों में सिर्फ दीपदान करके अपने को आध्यात्मिक रूप से संतुष्ट बैठ जाने वाले लोगों के लिए देव दीपावली एक अवसर के समान है कि वे कभी करोड़ों लोगों की जीवनदायिनी रही नदियां आज खुद मर रही हैं। आज हरिद्वार में ही गंगा का पानी आचमन के लायक नहीं रहा है, तो वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर आदि शहरों में गंगा की स्थिति का अंदाज लगाया जा सकता है।
पतित पावनी कही जाने वाली गंगा और यमुना का ही जब यह हाल है, तो बाकी नदियों के विषय में कुछ कहना ही व्यर्थ है। गंगा नदी के किनारे बसने वाले शहरों की अनुमानित संख्या 116 से भी कहीं ज्यादा है, कस्बों और गांवों की बात करें, तो यह संख्या हजारों में पहुंचती है। इन गांवों, कस्बों, शहरों में बसने वाले लोग किसी न किसी रूप में पतित पावनी गंगा को दूषित करने के अपराधी हैं। हालत इतनी बदतर है कि घाघरा, राप्ती, बेतवा,  बेतवा, केन, शहजाद, सजनाम, जामुनी, बढ़ार, बंडई, मंदाकिनी एवं नारायन जैसी अनेक छोटी-बड़ी नदियां खुद पानी मांग रही हैं। प्रदूषित नदियों का पानी मानव क्या, पशुओं और जीवों के उपयोग के लायक नहीं रह गया है। प्रदूषण और जल में घुले आक्सीजन की मात्रा दिनोंदिन कम होते जाने की वजह से कई सौ किस्म की मछलियां, जलीय जीव-जंतु आज या तो विलुप्त होने के कगार हैं, या विलुप्त हो गए हैं। ऐसे में देव दीपावली जैसा पावन पर्व यह संदेश लेकर आया है कि हमें नदियों में दीपदान करने से ज्यादा उन्हें सुरक्षित, संरक्षित और जीवनदायिनी बनाने में योगदान देना चाहिए। शायद यही वह अवसर है, जब हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प लेकर देवताओं और देव जातियों के साथ देव दीपावली मना सकते हैं, उसकी सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।

Tuesday, November 4, 2014

आयो घोष बड़ो व्यापारी

अशोक मिश्र
सपने देखना और उसे पूरा करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। सपना देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सपना देखने के बाद उस सपने को पूरा करने का प्रयास न करना, बुरा है। पंद्रह अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक सपना देखा और देशवासियों को भी दिखाया। वह सपना है सांसद आदर्श ग्राम योजना का। पहले आप अपने देश के गांवों की मन ही मन कल्पना कीजिए। क्या तस्वीर उभरती है? गंदगी से पटी पड़ी नालियां, जगह-जगह लगे गोबर और कूड़े के ढेर, कच्ची और पानी भरी सडक़ें, किसी गांव में बिजली के खंभे तो हैं, लेकिन बिजली नदारद (लगभग पचास फीसदी गांवों में तो बिजली है ही नहीं), नंगे-अधनंगे बच्चे, दूषित वातावरण में रहने को मजबूर लोग। कुछ कमी-बेसी के साथ पूरे देश के अधिकतर गांवों की यही तस्वीर है। अब आप सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत विकसित किए जाने वाले गांवों की भी लगे हाथ कल्पना कर लीजिए। चमचमाती सडक़ें, दूधिया रोशनी से नहाई गलियां, शहरों जैसी बिजली-पानी, स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक केंद्रों से युक्त गांव। हर हाथ को रोजगार, मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते युवा। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों का आदर्श ग्राम कुछ ऐसा ही है। मोदी की आदर्श ग्राम योजना इतनी लुभावनी है कि कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरुर और असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई जैसे लोगों को भी उसकी प्रशंसा में कसीदे काढऩे पड़ रहे हैं। मोदी की कुछ योजनाओं की प्रशंसा करना, तो शशि थरुर पर भारी भी पड़ चुका है। इसके बावजूद खुद भाजपा सांसदों ने उतनी रुचि नहीं दिखाई, जितनी कि उनसे अपेक्षा की जाती थी।
सांसद आदर्श ग्राम योजना के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के जिस गांव पुंसरी का उल्लेख किया, वह भी कुछ साल पहले देश के आम गांवों जैसा ही था। वह तो भला हो कि पुंसरी गांव के युवा सरपंच हिमांशु पटेल का जिन्होंने गांव की कायापलट कर दी। कहते हैं कि पुंसरी गांव अब शहरों से भी होड़ लेने लगा है सुविधाओं के मामले में। पुंसरी गांव सुविधाओं के लिहाज से काफी आगे है। गुजरात की राजधानी गांधीनगर से मात्र 35 किमी दूर बसे साबरकांठा जिले में बसे गांव पुंसरी में स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए ही बसें नहीं हैं, बल्कि गांव के पशुपालकों के लिए भी पंचायत बस सेवा है। गांव में सीसी रोड, चार रुपये में 20 लीटर मिनरल वाटर प्राप्त करने की सुविधा के साथ-साथ कम्युनिटी रेडियो स्टेशन भी है जिस पर ग्रामीणों को जागरूक करने वाले प्रोग्राम प्रसारित किए जाते हैं। इको फ्रेंडली इलेक्ट्रिसिटी की व्यवस्था की जा रही है। 1200 घरों वाले गांव में 250 घरों को बिजली देने की योजना पर काम हो रहा है। हर घर में शौचालय की व्यवस्था है। सवाल यह है कि जिन गांवों का चुनाव करके सांसद देंगे, क्या उन गांवों को हिमांशु पटेल जैसा सरपंच हासिल है या हो सकेगा? पिछले कई दशकों से सांसदों को सांसद निधि के नाम पर अरबों रुपये दिए गए, इन रुपयों में से कितने प्रतिशत का उपयोग गांवों के विकास में किया गया? क्या सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चुने गए गांवों की तस्वीर बदलेगी? क्या हर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में 2016 तक एक गांव और 2019 तक तीन गांवों को चुनने और उसका विकास कराने में उतनी दिलचस्पी लेगा, जितने की उम्मीद की जा रही है। ऐसे ही बहुत सारे प्रश्र हैं जिनका जवाब मिलना अभी शेष है।
प्रधानमंत्री अकसर यह बात कहते हैं, व्यापार मेरे खून में है। दरअसल, सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत आगामी कुछ वर्षों तक 2500 गांवों का विकास हो या न हो, लेकिन अब देश के गांवों तक देशी-विदेशी बनियों की पहुंच जरूर हो जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के जरिये कुछ कंपनियों को गांव तक पहुंचने और वहां बाजार तलाशने का इशारा जरूर कर दिया है। कारपोरेट सेक्टर ने प्रधानमंत्री मोदी की सांसद आदर्श ग्राम योजना को जरूर लपक लिया है। देश के सात लाख गांवों में अब हीरो, सुजुकी, होंडा, आईटीसी, हिंदुस्तान लीवर, कोलगेट, पामोलिव, पेप्सी, कोका, डाबर, एलजी, सैमसंग जैसी कंपनियों को बाजार दिखाई देने लगा है। वे अपनी योजनाओं का विस्तार गांव में करने की योजना पर अमल करने को उत्सुक दिखाई देने लगी हैं। अब गांवों में मोटरसाइकिलों, कारों, टीवी सेट्स और सौंदर्य प्रसाधन से जुड़ी वस्तुओं की भरमार होने वाली है। साबुन, टूथपेस्ट, शैंपू जैसे उत्पादों की पहुंच पहले से ही गांवों में हो चुकी थी। गांव के लोग अब नीम, बबूल या गिलोय की दातून नहीं, बल्कि टूथपेस्ट से अपने दांत साफ करने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा भूमिका है, उन युवाओं की जो या तो शहर में रह आए हैं या शहरों में जाकर पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खून सचमुच व्यापार है। उन्होंने अभी हाल ही में कहा है कि सरकार व्यापार नहीं कर सकती है, लेकिन व्यापार में सहायता जरूर कर सकती है। गांवों में बाजार की संभावनाओं की ओर इशारा मोदी ने कर दिया है। अब देखना है कि .ये व्यापारी गांवों की तस्वीर कितनी बदल पाते हैं? या फिर गांवों के लोग इन व्यापारियों को वैसे ही विदा कर देते हैं कि जैसे श्रीकृष्ण का संदेश लेकर गोकुल गए उद्धव को वापस भेजते समय गोपियों ने कहा था कि 'आयो घोष बड़ो व्यापारी। लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।Ó इसकी संभावना इसलिए है क्योंकि गांवों में बाजार तो है, लेकिन गांववालों की क्रयशक्ति कैसे बढ़ेगी, वे इन उत्पादों को खरीदने का पैसा कहां से लाएंगे, इसकी कोई व्यवस्था भी तो सरकार करे।

Wednesday, October 29, 2014

काले धन की चाह

-अशोक मिश्र
घर में घुसते ही घरैतिन को पंचम सुर में गाता देखकर मैं समझ गया कि उनकी यह खुशी मेरी जेब पर भारी पडऩे वाली है। मैंने बनावटी उत्साह प्रकट करते हुए पूछा, ‘अरे साढू भाई का फोन-वोन आया था क्या? जो तुम सूरजमुखी की तरह चमक रही हो?’ अपने जीजा के बारे में पूछे जाने पर घरैतिन लहराकर बोलीं, ‘अरे नहीं..बात दरअसल यह है कि हम सभी बहुत जल्दी करोड़पति बनने वाले हैं। आह..कितने हजार के नोट मिलकर दो करोड़ रुपये बनते हैं। मैं तो सोच-सोचकर खुशी से मरी जा रही हूं। अभी जब यह हाल है, तो जब दो करोड़ रुपये का ढेर मेरे सामने होगा, तो कहीं खुशी के मारे गश खाकर न गिर पड़ूं। अगर ऐसा हो, तो तुम मुझे संभाल लोगे न!’ घरैतिन की बात सुनकर मैं चौंक उठा, ‘क्या..कहीं कोई लॉटरी-वॉटरी लग गई है क्या? करोड़पति कैसे हो जाओगी?’
मेरी बात सुनकर घरैतिन के चेहरे पर एक रंग आकर चला गया। बोलीं, ‘इसीलिए कहती हूं कि खबरिया चैनल देखा करो..अखबार-शखबार पढ़ा करो। सिर्फ कागज काला करने से जिंदगी नहीं चलती। आपको याद है..चुनाव से पहले बाबा रामदेव ने कहा था कि मोदी सरकार बनी, तो छह महीने के भीतर सरकार विदेश में जमा सारा काला धन देश में लाकर अपने देश की गरीब जनता में बांट देगी। मोदी साहब भी तो उन दिनों पानी पी-पीकर सरदार जी को काला धन वापस न लाने के लिए कोसते रहते थे। तो किस्सा कोताह यह कि मोदी साहब की सरकार बन गई। कुछ ही दिन में मोदी सरकार के छह महीने भी पूरे होने वाले हैं। बस..कुछ ही दिनों में हम सभी गरीब करोड़पति हो जाएंगे। हो जाएंगे न..!’ पत्नी की बात पर मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा, ‘नहीं होंगे करोड़पति। वह सब बाबा रामदेव और मोदी जी का चुनावी रसगुल्ला था। काला धन नहीं आने वाला देश में। सरकार कह रही है कि अगर विदेश में जमा काला धन यहां आया, तो वहां के लोग भूखों मर जाएंगे। अपने यहां तो लोगों को दो रोटी खाने के बाद पेट भर पानी पीकर सोने की आदत है। जैसे अब तक रहते आए हैं, वैसे आगे भी रह लेंगे।’ इतना कहकर मैं घर से बाहर हो गया।
(आज दिनांक 28 अक्टूबर 2014 को अमर उजाला में प्रकाशित एक व्यंग्य)

Friday, October 17, 2014

चल निकाल हाथ की मैल

-अशोक मिश्र
16 oct 2014 ko jansandesh times mein prakashit
जब मैंने सुना कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान की धमक हमारे मोहल्ले तक पहुंच चुकी है, तो मेरी छाती छप्पन इंच की हो गई। लेकिन मैं 'सबसे भले विमूढ जिन्हें न व्यापे जगत गतिÓ की तरह घर से नहीं निकला, तो नहीं निकला। हालांकि घरैतिन ने कई बार ताने मारे, लोगों की सक्रियता का विशद वर्णन किया। शाम को सौ रुपये का नोट पकड़ाते हुए सब्जी लाने का आदेश जारी हुआ, तो घर से निकला ही पड़ा। चौराहे पर पहुंचा, तो देखा कि मोहल्ले भर के छोरे एक जगह टेंट गाड़े हुए मैल इक_ा कर रहे हैं। किसी के हाथ में हाकी थी,तो किसी के हाथ में डंडा। कुछ की जेब में देशी कट्टा (बंदूक) होने का भी मुझे आभास हुआ। सडक़ परआने-जाने वालों को ये छोरे रोकते, उन्हें कुछ समझाते, जो उनकी बात मानकर टेंट के भीतर चला जाता, तो वे प्रसन्न हो जाते। यदि कोई हुज्जत करता, तो गाल पर दो-चार कंटाप, पीठ पर एकाध ल_ जमा देते। वह आदमी अपनी औकात में आ जाता। यदि इन छोरों की जमात का कोई निकल आता, तो वे हाथ उठाकर उसी तरह नमस्कार करते हैं, जैसे दाहिना हाथ उठाकर कामरेड लोग क्रांतिकारी अभिवादन करते हैं। टेंट के आसपास बड़े-बड़े पोस्टरों पर लिखा हुआ था, 'हाथ की मैल यहां दें।Ó 
मैंने सोचा, इन छोरों का तरीका भले ही गलत हो, लेकिन इनका उद्देश्य कितना पवित्र है। मेरा मन गदगद हो गया। तभी टेंट से उस्ताद मुजरिम बाहर निकले और मुझे देखते ही बोले, 'आओ..आओ..इस पुनीत कार्य में तुम्हारी भी कुछ भागीदारी होनी चाहिए।Ó बड़े प्रेम से मेरी बांह पकडक़र वे मुझे टेंट में ले गए। मैंने देखा, लोग आते और मेज पर रखे बक्से में नोट डालकर चले जाते। मैंने उस्ताद मुजरिम से पूछा, 'उस्ताद यह क्या? बाहर तो लिखा है, हाथ की मैल यहां दें और भीतर आप लोग वसूली कर रहे हैं।Ó मेरी बात सुनकर मुजरिम हंसे और बोले, 'तुम नादान हो। भारत के बड़े-बड़े ऋषि-मुनि यही कहते आए हैं कि रुपया-पैसा इंसान के हाथ की मैल है। मोदी जी ने जब स्वच्छता अभियान की शुरुआत की, तो मैंने सोचा, लोगों के हाथ की मैल सबसे पहले छुड़ानी चाहिए। जब तक व्यक्ति पाक-साफ नहीं होगा, तब तक भारत स्वच्छ हो ही नहीं सकता।Óइतना कहकर मुजरिम ने मेरी ओर देखा और बोले, 'तू भी हाथ की मैल निकाल दे।Ó और फिर मैं सब्जी लिए बिना घर लौट आया।

Tuesday, October 14, 2014

राजनीतिक दलों का बेनकाब होता चेहरा

-अशोक मिश्र
धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश में लव जेहाद का असली चेहरा सामने आता जा रहा है। हालांकि, बहुत सारे ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मिलना अभी शेष है। कुछ राजनीतिक दलों ने लव जेहाद को चुनावी हथियार बनाकर उत्तर प्रदेश के साथ-साथ हिंदी पट्टी के दूसरे प्रदेशों की राजनीति को गरमाने की कोशिश की। किसी हद तक वे इसमें सफल भी हुए। एक महीने पहले देश में हुए उपचुनावों के दौरान लव जेहाद और गरबा नृत्य में मुसलमानों के आने-जाने को लेकर कई तरह की बातें कही गईं। मध्य प्रदेश में भाजपा के कुछ विधायकों ने अपनी सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से लोगों को सचेत किया कि वे अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों में न आने दें। वोट बैंक के ध्रुवीकरण की आशा में हिंदुत्ववादियों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ ऐसे-ऐसे तीर छोड़े कि जैसे उनका नामोनिशान मिटाकर ही दम लेंगे। गुजरात के इमाम मेहदी हुसैन जैसे लोगों ने भी माहौल को खराब करने का प्रयास किया। इसके पीछे किन लोगों का हाथ था, यह कहने की जरूरत नहीं है। गरबा में राक्षस आते हैं यह कहने वाला इमाम मेहदी हुसैन मुसलमानों के उन तत्वों का प्रतिनिधि है, जो थोड़े से लाभ के लिए सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं करते हैं, ठीक हिंदुत्ववादियों की तरह। ऐसे हिंदुत्ववादियों और इस्लामवादियों का इंसानियत, धर्म, राष्टÑ और संप्रदाय से कोई नाता नहीं होता है। बस, ये एक चेहरे होते हैं, सियासी गणित के। इस बात को साबित करती है मेरठ के खरखौदा गांव में हुए कथित धर्मांतरण और लव जेहाद की खुलती कलई।
दो महीने पहले खरखौदा गांव की 22 वर्षीय एक युवती ने अल्पसंख्य समुदाय के एक युवक पर सामूहिक बलात्कार और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी। दो महीने बाद आज वही युवती कह रही है कि उसने अपने मां-बाप के दबाव में आकर यह बयान दिया था। मेरे मां-बाप को नेताओं ने ऐसा कहने और करने के लिए पैसे दिए थे। दो महीने पहले जब जबरन धर्मांतरण की बात सामने आई थी, तो हिंदुत्ववादी संगठनों और भाजपा ने इसको लेकर खूब बवाल किया था। प्रदेश की सपा सरकार भी संदेह के घेरे में थी। हालांकि, युवती की इस बात पर विश्वास कम है कि वह पहले गलत कह रही थी, अब सही कह रही है। इस कथित लव जेहाद और धर्मांतरण की सगााई क्या है? यह निष्पक्ष जांच का विषय है। यहां सवाल लड़की की गलत बयानी का तो है, देश की सियासी पार्टियों की मामले को अपने हित के लिए तूल देने की है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, अलीगढ़ आदि जिलों में जिस तरह से बाकायदा एक नीयत और नीति के तहत माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की गई, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए काफी शर्मनाक है। ऐसी स्थिति के लिए किसी एक राजनीतिक दल, व्यक्ति या संप्रदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति में सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस से लेकर अन्य दूसरी छोटी-बड़ी पार्टियां शामिल हैं। कोई दूध का धुला नहीं है। इसके लिए सबसे बड़ा दोषी और जिम्मेदार समाज का वह तबका भी है, जो वास्तविकता को जाने-परखे बिना धार्मिक, सांप्रदायिक उन्माद का शिकार हो जाता है। सबसे ज्यादा अहम रोल तो इसी तबके का होता है। हालांकि इस तबके में शामिल लोगों की संख्या बहुत कम होती है, लेकिन कई बार ये लोग पूरे समाज और देश-प्रदेश पर भारी पड़ते हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यही है। राजनीतिक दल ऐसे लोगों की इस दुखती रग से वाकिफ होने के चलते हर बार फायदा उठाने में सफल रहते हैं।

Monday, October 13, 2014

पहले पूंजी निवेश का माहौल तो बने

- अशोक मिश्र 
सौ अरब डॉलर का पूंजी निवेश भारत का दरवाजा खटखटा रहा है। अब यह राज्यों पर निर्भर है कि  वे इसमें से कितना हिस्सा अपने यहां ले जाने में सफल होते हैं। ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहते हुए राज्यों के सामने एक चुनौती पेश की  कि वे आगे बढ़ें और अपने राज्य को समृद्ध करने की दिशा में सक्रिय हो जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों अपनी विदेश यात्राओं को लेकर काफी उत्साहित हैं। वे बार-बार यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने विदेशी-देशी पूंजी निवेश की रुकी  हुई प्रक्रिया को गति प्रदान कर दी है, उसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को खत्म करने में लगभग सफल हो गए हैं। यह सही है कि उन्होंने उद्यमियों के हित में कई तरह की रियायत देने की घोषणा की है, लेकिन सिर्फ घोषणा से ही सब कुछ  नहीं हो जाता है। इन घोषणाओं को अमलीजामा पहनाना भी उतना ही जरूरी है, जितना कि घोषणा करना। मोदी ने ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में कहा कि चीन, जापान और अमेरिका से सौ अरब डॉलर पूंजी निवेश आना है। इस अवसर का राज्यों को फायदा उठाना चाहिए और राज्य और केंद्र सरकार को एक दूसरे का पूरक रहकर काम करना चाहिए। सिद्धांत रूप में इस बात से शायद ही किसी की असहमति हो। सभी इस बात से सहमत होंगे कि राज्य और कें द्र सरकार को जनपक्षीय योजनाओं और परियोजनाओं को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। लेकिन भारतीय राजनीति में क्या ऐसा होता है या हो सकता है? अमूमन तो अब तक यही देखने में आया है कि केंद्र में जिस पार्टी की सरकार होती है, उसी पार्टी के शासन वाले राज्यों को केंद्र सरकार से मिलने वाली सुविधाएं बड़ी आसानी से मिल जाती हैं, परियोजनाओं में  केंद्र का अंश सुगमता से मिल जाता है, लेकिन विरोधी पार्टी द्वारा शासित राज्यों को अंशदान देने में अनावश्यक विलंब किया जाता है।
इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि पिछले कुछ महीनों में मोदी की विदेश यात्राओं का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। कई देशों से अरबों डॉलर के समझौते हुए हैं, कुछ परियोजनाओं पर सकारात्मक चर्चा भी हुई है, निकट भविष्य में उनके अमलीजामा पहनने की उम्मीद भी बलवती हुई है। लेकिन क्या सिर्फ इतना ही कर देने से पूंजी निवेश आने लगेगा? क्या दुनिया भर के उद्योगपति सिर्फ प्रधानमंत्री पर भरोसा करके पूंजी निवेश के लिए भारत चले आएंगे? जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। जब तक भारत में पूंजी निवेश के  लायक माहौल, संगठनात्मक ढांचा नहीं खड़ा होता, तब तक बड़ी पूंजी निवेश की  उम्मीद करना बेमानी होगा। पूंजी निवेश करने वाले सबसे पहले बिजली, पानी की उपलब्धता, सड़को की  दशा, कानून व्यवस्था और अन्य बातों की ओर भी ध्यान देंगे। प्रधानमंत्री और राज्य सरकारों को सबसे पहले इस ओर ध्यान देना होगा कि पूंजी निवेश के बाद उत्पादित माल को ग्राहक तक पहुंचाने की व्यवस्था कैसे की  जाए? सड़को का  सघन जाल बिछाए बिना अंतिम आदमी तक उत्पादित माल को पहुंचा पाना, असंभव है। जिन क्षेत्रों में मोदी पूंजी निवेश की बात कर रहे हैं, वहां ये सब बातें काफी महत्व रखती हैं।
इसके बावजूद उम्मीद की जानी चाहिए कि देश की तस्वीर बदलेगी। राज्य और केंद्र सरकारें देश में शांति और सौहार्दपूर्ण वातावरण के निर्माण सक्रिय भूमिका निभाएंगी। कुछ मुद्दों पर केंद्र को सहयोगात्मक रवैया अख्तियार करना होगा, तो कुछ मामलों में राज्यों को भी हठधर्मिता त्यागनी होगी। देश के आर्थिक विकास के  लिए पूंजी निवेश के साथ-साथ इन्फ्रास्टक्चर खड़ा होना बहुत जरूरी है। इससे न केवल लोगों को रोजगार, सुविधाएं प्राप्त होंगी, बल्कि प्रति व्यक्ति आय में भी इजाफा होगा। लोगों के रहन-सहन में बदलाव आएगा। उनकी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकेंगी। और ऐसा तब होगा, जब राज्य में शांति हो, उद्योग लगाने के लिए आवश्यक वातावरण हो। शासन-प्रशासन का  आवश्यक  सहयोग भी मिलता रहे।