Sunday, August 30, 2015

स्मार्ट सिटी में बगलोल चंद

अशोक मिश्र
अपने एक मित्र हैं बगलोल चंद। मेरे गांव नथईपुरवा में रहते हैं। वे न केवल नाम से बगलोल हैं, काम और बुद्धि से भी बगलोल हैं। कहो आम, तो समझते इमली हैं। एक दिन फोन आया और बात घूम-फिर कर देसी घी तक पहुंच गई। मैंने उन्हें बताया कि शहर में देसी घी खाने क्या आंख में लगाने को नहीं मिलता है। उन्होंने आश्वस्त किया कि वे मेरी इस समस्या को जल्दी हल कर देंगे। मैंने समझा, वे हर महीने किलो-दो किलो देसी घी भिजवा दिया करेंगे। एक दिन सुबह पत्नी ने उठाया, 'उठिए...बगलोल भाई साहब आए हैं।' मैंने झल्लाते हुए कहा, 'तो कौन सी आफत आ गई। उन्हें  चाय-पानी पिला, मैं थोड़ी देर बाद उनसे मिलता हूं।'
पत्नी ने परेशान स्वर में कहा, 'आफत भी उनके साथ आई है। देखिए तो सही। बगलोल भाई साहब दरवाजे पर खड़े हैं।' मैं बाहर निकला, तो देखा कि वे एक भैंस के साथ खड़े हैं। मैंने पूछा, 'यह क्या तमाशा है? भैंस यहां क्यों ले आए हो?' बगलोल चंद ने मासूमियत से जवाब दिया, 'भइया! आप ने ही तो कहा था, शहर में दूध-दही की किल्लत है, तो हम 'राम प्यारी' को आपकी खातिर यहां ले आए। अब देसी घी आंख में  लगाइए और जीभर कर खाइए।' उनका जवाब सुनकर मैंने माथा पीट लिया। तो ऐसे हैं अपने बगलोल चंद।
बगलोल चंद पिछले कुछ दिनों से एक ही बात की रट लगाए हुए हैं, 'भइया! बस एक बार किसी स्मार्ट सिटी में घुमवा दो। जीवन सफल हो जाए। बड़ी तमन्ना है स्मार्ट सिटी घूमने की।' 
बार-बार के निवेदन से आजिज आकर मैंने एक रविवार को उन्हें बुला ही लिया।  शाम को सबसे नजदीक वाले स्मार्ट सिटी में लेकर जा पहुंचा। स्मार्ट सिटी में बने एक पार्क के किनारे हम दोनों खड़े होकर आसपास का नजारा देखने लगे। पार्क की दशा देखकर बगलोल चंद वैसे ही विह्वल हो गए, जैसे किसी अभिनेता-अभिनेत्री को सामने पाकर उसके प्रशंसक भाव विभोर हो जाते हैं। वे चारों तरफ देखते हुए बोले, 'भइया...हमारे वेद-पुराण में स्वर्ग के बारे में जैसा लिखा गया है, ठीक वैसा ही यहां सब कुछ दिखाई दे रहा है। वेद-पुराण में लिखा है कि स्वर्ग में लाखों-करोड़ों सूर्य की रश्मियां हर ओर जगमग-जगमग करती रहती हैं। वहां न किसी को प्यास लगती है, न भूख। बस, मन हमेशा मनोरंजन में ही लगा रहता है। तभी तो वहां मेनका, उर्वशी, रंभा जैसी लाखों-करोड़ों अप्सराओं की व्यवस्था है। तभी तो हर कोई स्वर्ग जाना चाहता है।' 
पार्क में हर आयु वर्ग के जोड़े मिलकर सचमुच स्वर्ग का एक सुंदर और अलौकिक कोलाज रच रहे थे। एक जोड़े की ओर इशारा करते हुए बगलोल चंद ने कहा, 'भइया..वो जो लोग मनोरंजन में लगे हुए हैं। उसमें पुरुष जरूर कोई पुण्यात्मा होगी। और वह लड़की कोई अप्सरा।'
मैंने हंसते हुए कहा, 'ये कोई अप्सरा-वप्सरा नहीं है। यह स्मार्ट सिटी है। यहां सब कोई स्मार्ट है। पहनावे में, आचरण में, विचार में, लूट-खसोट में, ठगी-बेईमानी में। सब में लोग स्मार्ट हैं। यहां जरा सी निगाह चूकी नहीं कि आंख से काजल क्या पूरी आंख ही गायब हो जाती है।' जब मैं यह कह रहा था, तभी बगलोल चंद ने अपनी जेब से चूना-तंबाकू निकाला और हथेली पर दोनों को मिलाकर दस-बारह बार रगडऩे के बाद ठोंका-पीटा, फिर हथेली से उठाकर होंठों के नीचे दबा लिया। होंठों के बीच तंबाकू दबाने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, 'तुम यहीं खड़े रहो, मैं थोड़ा निबटकर आता हूं।'
मैं कुछ कहता कि वे तत्काल आगे बढ़ गए। काफी देर बीतने के बाद जब बगलोल चंद नहीं लौटे, तो मैंने उन्हें खोजना शुरू किया। काफी खोजने पर भी वे नहीं मिले। मैं घबरा रहा था। चार-पांच घंटे बाद मैंने उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने का फैसला कर पूछते-पाछते पुलिस थाने पहुंचा, तो देखा, एक कोने में बगलोल चंद बैठे बिसूर रहे हैं। मैंने उनको डपटते हुए कहा, 'तुम कहां गायब हो गए? यहां क्यों बैठे हो, घर नहीं चलना है?' तभी एक सब इंस्पेक्टर ने गुर्राते हुए कहा, 'दस हजार जुर्माना अदा कर दो, इस बगलोल को ले जाओ।' मैंने पूछा, 'क्या मतलब? किस बात के दस हजार रुपये? कैसा जुर्माना?' इंस्पेक्टर ने कहा, 'पब्लिक प्लेस में लघुशंका करने का।' बहुत हाय-हाय, खींच-तान के बावजूद इंस्पेक्टर एक भी रुपया कम करने को तैयार नहीं हुआ। तो मजबूरन एटीएम से पैसा निकालकर जमा करना पड़ा। मैंने निकलते समय इंस्पेक्टर से पूछा, यहां कोई टॉयलेट-वायलेट है कि नहीं? इंस्पेक्टर ने बताया कि स्मार्ट सिटीज में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती है। मैं बगलोल चंद के साथ जल्दी से थाने से यह सोचते हुए बाहर आ गया कि स्मार्ट सिटी के लोगों को शायद लघु या दीर्घ शंका की जरूरत नहीं पड़ती होगी, तभी न इसकी व्यवस्था नहीं की  गई है।

Monday, August 24, 2015

अंकल ...चंदा दो

अशोक मिश्र
मैं सोकर ही उठा था कि दस-बारह लड़कों ने मेरा घर घेर लिया। मैंने सवालिया निगाहों से उनकी ओर देखा, तो उनका गुंडा नुमा नेता अपने झुंड से बाहर आया। उसने साफ सुथरे फर्श पर पान की पीक थूकते हुए कहा, 'अंकल..चंदा दो।Ó सुबह-सुबह चंदा मांगने की बात से मैं उखड़ गया, 'तुमने मेरे घर को किसी कंपनी का दफ्तर समझ रखा है क्या कि मुंह उठाया और चले आए चंदा मांगने। मैं किसी पार्टी-शार्टी को चंदा-वंदा नहीं देता। भाग जाओ।Ó नेता नुमा गुंडा गुर्राया, 'चंदा तो आपके पुरखे भी देंगे, आप क्या चीज हैं।Ó
बात आगे बढ़ती कि तभी घरैतिन बाहर निकल आईं। पत्नी को देखते ही गुंडा नुमा नेता ने झुककर उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, 'आंटी..देखिए न! हजार-पांच सौ रुपये के होली के चंदे के लिए अंकल किस तरह हुज्जत कर रहे हैं। आप समझाइए न इनको।Ó घरैतिन ने पांच सौ रुपये का नोट आगे बढ़ाते हुए कहा, 'अरे बेटा! जाने दो। सठियाया आदमी ऐसा ही होता है।Ó और फिर मुझे घूर कर देखा।
चंदा मांगने आए लड़कों के चेहरे पर पांच सौ का नोट देखते ही एक चमक आ गई। लड़के ने नोट को उलट-पलट कर देखने लगा। मुझसे रहा नहीं गया, 'अबे! नोट को ऐसे क्या देख रहा है?Ó 'कुछ नहीं अंकल! देख रहा था कि कहीं कालाधन तो नहीं है। लोग आजकल काले धन को ही चंदे में देते हैं। अच्छा यह बताइए, आप इनकम टैक्स तो देते हैं न। पैन कार्ड तो होगा ही।Ó मैं गुस्से से उबल पड़ा, 'हां..हां..यह काला धन ही है। वापस कर दे मेरा पैसा। हवाला के जरिये अभी थोड़ी देर पहले स्विटजरलैंड से मंगाया है।Ó मेरी बात सुनते ही लड़के हंस पड़े। उनमें से एक ने कहा, 'अंकल! आप एक बात बताइए। आपने जो यह पांच सौ का नोट होली के चंदे में दिया है, वह किस दिन की कमाई का है? मेरा मतलब है कि इस महीने की सैलरी का है या पिछले महीने का। या फिर उससे भी पिछले महीने का? आप अपनी बचत में से दे रहे हैं या फिर आंटी की बचत का? इनकम टैक्स पेयर तो आप हैं कि नहीं? आपने पैनकार्ड बनवा रखा है कि अभी बनवाना है? आधार कार्ड तो होगा न आपके पास?Ó
'अबे! तुम लोग चंदा मांगने आए हो या चंदे के बहाने डकैती डालने की खातिर रैकी करने।Ó मैं उबल पड़ा। 'वो क्या है न, अंकल! आजकल बड़ा ध्यान रखना पड़ता है। पहले सब कुछ कितना आसान था होली का चंदा मांगना। जिसके घर चंदा मांगने गए, थोड़ी बहुत हुज्जत के साथ चंदा दे देता था। मान लीजिए नहीं दिया चंदा, तो उसकी कुर्सी-मेज, पलंग रात में उठाकर होली में डाल दिया। थोड़ी दारू ज्यादा हो गई, तो मार-पीटकर ली। होली बीती, तो माफी मंगा ली। लेकिन अब चंदा न मिलने से ज्यादा लफड़े वाला काम चंदा मिलना हो गया है। सब कुछ ध्यान रखना पड़ा है। आप तो सब कुछ समझते ही हैं अंकल। आपको क्या बताना।Ó इतना कहकर चंदा मांगने वाला का हुजूम आगे बढ़ गया।

Wednesday, August 12, 2015

दिल्ली में तो रामराज्य है

 अशोक मिश्र
हाई स्कूल के एक छात्र ने 'केंद्र और दिल्ली सरकार के शांतिपूर्ण सहअस्तित्वÓ पर निबंध लिखा, 'दिल्ली में जब से लोकपाल बिल पास हुआ है, एकदम रामराज्य कायम हो गया है। राज्य सरकार के मंत्री, विधायक और नेता ही नहीं, विपक्ष में बैठे विधायक तक पहली तारीख को जनता के सामने अपनी कमाई का ब्यौरा पेश कर देते हैं। केंद्र और राज्य सरकार के बीच तो ऐसे संबंध हैं, जो कि बड़े भाई की सरकार केंद्र में हो और छोटे भाई की सरकार राज्य में। प्रधानमंत्री जी को जब भी किसी मामले में विचार-विमर्श करना होता है, तो वे अपनी पार्टी के सदस्यों के साथ-साथ दिल्ली सरकार के मुखिया को भी बिठा लेते हैं। उनकी बातों को गौर से सुनते हैं और अगर लगा कि छोटे भाई यानी कि दिल्ली सरकार के मुखिया की बात में दम है, तो वे तुरंत उसे लागू भी कर देते हैं। अगर प्रधानमंत्री जी किसी काम से मुख्यमंत्री जी के घर के आसपास से गुजर रहे हों, तो वे उनके यहां जाकर कुछ देर बैठते हैं। मुख्यमंत्री जी भी प्रधानमंत्री जी को बिना कुछ खिलाए-पिलाए वापस नहीं जाने देते हैं।Ó दोनों भाई जब भी मीडिया के सामने आपसी संबंधों की चर्चा करते हैं, तो एक दूसरे की तारीफ के पुल बांधते ही रहते हैं। गले मिलते हुए फोटो खिंचवाते हैं।Ó
उस छात्र ने आगे लिखा, 'दिल्ली में एक 'एलजीÓ होता है। एलजी का फुलफॉर्म क्या होता है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन सुनते हैं कि मुख्यमंत्री जी अपना राजकाज चलाने में इनसे बहुत सहयोग लेते हैं। 'एलजीÓ जी भी बड़े उदारमना हैं। जब भी पुलिस से संबंधित कोई मामला आता है, तो मुख्यमंत्री जी पुलिस अधिकारियों से कहते हैं कि एलजी साहब से पूछो क्या करना है। जब पुलिस वाले एलजी साहब के पास जाते है, तो एलजी साहब कहते हैं कि मुख्यमंत्री जी से पूछो। इस मामले में उनके ही आदेश चलेंगे। बेचारी पुलिस इन दोनों लोगों के अतिशय प्रेम के चक्कर में फंसकर वही करती है, जो उसे सुहाता है। कई बार तो यह सुहाना आम जनता पर ही भारी पड़ जाता है। लेकिन मजाल है कि दिल्ली की जनता इन तीनों लोगों के आपसी प्रेम और भाईचारे पर तनिक भी नाराज हो।Ó निबंध तो बहुत बड़ा था, लेकिन यह उसका सार-संक्षेप है।

Wednesday, August 5, 2015

अब छबीली भी बनेगी शिक्षामंत्री

अशोक मिश्र
मेरे मोहल्ले में रहती है छबीली। पूरे मोहल्ले के दिलों की धड़कन है छबीली। युवाओं के दिल की धड़कने उसे देखते ही बढ़ जाती है, चेहरे पर रौनक आ जाती है। लेकिन महिलाएं जब उसे अपने घर  के आसपास देखती हैं, तो इस भय से उनके दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं कि कहीं रमुआ के पापा तो लप्पो-छप्पो नहीं कर रहे थे इसके साथ। आज घर पहुंचा तो देखा कि दशहरे के हाथी की तरह सजी-संवरी छबीली विराजमान है। घरैतिन से मूक नजरों से  भीतर ही भीतर प्रसन्न होते हुए सवाल किया, तो वह बोली, 'आप यहीं आकर बैठिए, मैं जरा चाय-पानी की व्यवस्था करती हूं।' मैं हैरान रह गया कि कल तक छबीली के नाम से भड़कने वाली घरैतिन आज मुझे उसके साथ बैठने को कह रही हैं, तो जरूर कोई लोचा है। 
मैंने उसके सामने बैठते हुए उसे भरपूर नजरों से निहारा, तो वह मुस्कुराई। बोली, 'जीजू...आप जानते ही हैं कि बहुत जल्दी मंत्रिमंडल का विस्तार होने वाला है। मैं आपसे यह पूछने आई हूं कि अगर बैक डोर से मेरी मंत्रिमंडल में इंट्री होती है, तो कौन सा विभाग मांगू।'
यह एक और धमाका था मेरे लिए। कल तक पार्टी का झंडा उठाकर चलने वाली छबीली मंत्री बनने जा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो मुझे देखकर बिदक जाया करती थी, वह आज जीजू कहकर संबोधित कर रही है। मैंने कहा, 'तुम कौन सा विभाग लेना चाहती हो।' उसने तपाक से मुस्कुराते हुए कहा, शिक्षा विभाग। उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि मेरी कनपटी के नीचे बम विस्फोट हुआ है। 'छन्न' से कान बज उठा। वह इठलाती हुई बोली, 'बात यह है जीजू....बचपन में मैंने मास्टरों की बहुत मार खाई है। मास्टरों की मारने-पीटने और परीक्षा के दौरान कड़ाई करने के चलते ही मैं दसवीं में पांच बार फेल हुई और झख मारकर मेरे बाबू जी ने एक फटीचर के साथ मुझे बांध दिया।'
उसकी बात सुनकर मैं भौंचक रह गया। सोचने लगा कि इस देश के कुछ शिक्षा मंत्री तो पहले से ही शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा करने पर तुले हुए हैं, अब अगर यह भी उनमें शामिल हो गई, तो भगवान ही मालिक है इस देश-प्रदेश के नौनिहालों का। मैंने कहा, 'अरे नहीं..तुम कोई दूसरा विभाग देख लो, बच्चों को बख्श दो, यह उन पर बहुत बड़ी मेहरबानी होगी। वैसे भी शिक्षा मंत्री को बहुत पढ़ा लिखा होना चाहिए।'
मेरी बात सुनकर छबीली बमक गई, रोष भरे शब्दों में बोली, 'क्यों जीजू...जब मध्य प्रदेश में बिना पढ़े-लिखे लोग पीएचडी कर सकते हैं, डॉक्टर बन सकते हैं, फर्जी डिग्री हथिया कर मंत्री, सांसद और विधायक बन सकते हैं, तो मैं शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बन सकती। झारखंड की वह बहन भी तो शिक्षा मंत्री है, जो प्रदेश को देश बना देती है। आखिर मेरे शिक्षा मंत्री बनने में क्या बुराई है।'
'देख..छबीली..शिक्षा मंत्री का पद बहुत जिम्मेदारी का पद है। यह देश-प्रदेश के नौनिहालों के भविष्य का सवाल है। तू दूसरा कोई भी विभाग ले ले, लेकिन यह विभाग तो भूलकर भी न लेना।' मैंने समझाने की कोशिश की।
मेरे इतना कहते ही वह कुछ रुष्ट स्वर में बोली, 'आप मुझे बेवकूफ समझते हैं। आप को मेरा टेस्ट लेना हो, तो ले लीजिए। आप तीन सवाल पूछिए और अगर मैं जवाब नहीं दे पाई, तो अपना इरादा बदल दूंगी। मैंने उसके यह कहते ही तपाक से पूछा, 'सिकंदर कौन था?' वह भी उसी तत्परता से बोली, 'जीजू..था नहीं, है कहिए। मेरी मौसी की बड़ी बेटी के देवर हैं सिकंदर बाबू। उनकी शादी मेरी बड़ी बुआ की देवरानी की बहन से हुई है। क्या पर्सनॉल्टी है उनकी..एकदम रणबीर कपूर लगते हैं।'
मैं उसका जवाब सुनकर सहम गया। मैंने धीमे स्वर में पूछा, 'और पोरस?' मेरा सवाल सुनकर पहले तो छबीली शरमाई और बोली, 'क्या जीजू..अब आप ठिठोली करने लगे। पोरस नहीं..पौरुष..यह तो उसमें काफी कूट-कूटकर भरा है। एकदम चौड़ा सीना, भरी-भरी मांसल बाहें, चौड़ा माथा..मेरी बड़ी बुआ की देवरानी के घरवालों ने तो उसे देखते ही पसंद कर लिया था। उसे देखकर न..कोई भी लड़की उस पर लट्टू हो सकती है। आपको सच बताऊं..कभी मैं भी लट्टू हुई थी, लेकिन मुए ने घास ही नहीं डाली।' छबीली का जवाब सुनकर मैं तीसरा सवाल करने का साहस नहीं जुटा पाया। मुझे चुप देखकर छबीली प्रसन्नता से उछल पड़ी और हांक लगाकर बोली, 'जिज्जी..मैंने जीजू को भी संतुष्ट कर दिया है। अब वे भी मान गए हैं। मैं अभी जाकर मुख्यमंत्री जी को बताती हूं कि मुझे शिक्षा विभाग ही चाहिए।' इतना कहकर वह दनदनाती हुई घर से निकल गई। घरैतिन हांक लगाती रह गईं, 'अरी चाय तो पीती जा..।' मैं तब से इस इंतजार में हूं कि मेरी साली छबीली साहिबा कब शिक्षा मंत्री बनती हैं और मैं लोगों पर रोब गांठ सकूं कि खबरदार! जो कभी तीन-पांच किया, तो साली से कहकर 'तीयां-पांचा' करवा दूंगा।

Wednesday, July 29, 2015

'सेर' को मिल गया 'सवा सेर'

अशोक मिश्र
जिस कार्यालय में मैं दिन भर खबरों की कतरब्योंत करता हूं, उसी आफिस में काम करता है अच्छन प्रसाद। बीस-बाइस साल का चेहरे से भोला-भाला लगने वाला लड़का। हल्की-हलकी दाढ़ी,  ऊपर की ओर संवारे गए बाल। रंग न बहुत गोरा, न बहुत काला। स्वस्थ किंतु पतला-दुबला शरीर। पहली ही नजर में देखने पर एक 'अच्छे' लड़के की छवि मन-मस्तिष्क में उभरती है। एक दिन मैं किसी गंभीर समस्या पर कुछ लिखने का मूड बनाकर बैठा ही था कि वह अपना सिर खुजाता नमूदार हो गया। मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाह से देखा, तो उसने पूछा, 'सर! अगर आप डिस्टर्ब न हों, तो एक बात पूछूं। बहुत दिनों से पूछना चाहता हूं।' मैंने गुर्राते हुए कहा, 'सारे मूड का सत्यानाश करके पूछता है कि डिस्टर्ब तो नहीं हो रहे हैं। चल, अब बक भी दे जो बकना है..मुंह बाये खड़ा देख क्या रहा है।'
अच्छन प्रसाद ने धीमे स्वर में पूछा, 'सर..ये मुंबई वाले ये हीरोइनें तो रोज नहाती होंगी?'
उसकी बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। भला बताओ..कहां मैं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार कर रहूा हूं, ईरान-तूरान से लेकर साइबेरिया तक, भारत से लेकर अमेरिका तक के लोगों को एक नई रोशनी से रू-ब-रू कराने की जुगत में लगा हुआ हूं और यह कमबख्त हीरोइनों के नहाने-धोने पर ही अटका हुआ है। मैंने गुर्राते हुए कहा, 'हां..नहाती-धोती हैं, तो तुझे क्या?' उसने फिर मासूमियत भरे लहजे में पूछा, 'सर...अमेरिका, लंदन, फ्रांस की हीरोइनें भी नहाती-धोती होंगी? मेरा मतलब अंग्रेजी फिल्मों की हीरोइनें....?'
उसकी बात सुनकर मेरा पारा चढ़ गया। मैंने लगभग डपटते हुए कहा, 'तू कहना क्या चाहता है? तेरी बात मेरे पल्ले तो पड़ नहीं रही है? जो कुछ पूछना है, साफ-साफ पूछ और फूट ले यहां से। बात को जलेबी की तरह घुमा मत।' मेरी तल्ख आवाज को सुनकर वह सिटपिटा गया। फिर थोड़ी देर वह बोला, 'सर...क्या कभी ऐसा आविष्कार हो सकता है कि आदमी के शरीर का कोई हिस्सा मशीन में डाला जाए और वह साबुन-शैंपू बन जाए।'
उसकी बात मेरे सिर के ऊपर से गुजर गई। मैंने कुछ देर तक उसकी बात के मायने-मतलब निकालने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद भी मेरे अक्ल के दरवाजे नहीं खुले, तो मैंने गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा, 'भाई मेरे!...तेरे कहने का मतलब क्या है? साफ-साफ बता।' 
अच्छन प्रसाद  ने कहा, 'सर..बात यह है कि टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक हीरोइन नहा रही है..साबुन उठाती है और पूरे शरीर पर साबुन लगाने लगती है। तो सर..मेरे मन में ख्याल आया कि अगर मैं वह साबुन होता, तो..। बस सर...यह ख्याल आते ही सोचा कि आपसे पूछ लूं कि कहीं कोई ऐसे आविष्कार की गुंजाइश बनती दिख रही हो, तो मैं इस जन्म में आशा रखूं, वरना...।' अच्छन प्रसाद की बात सुनते ही मेरे भीतर का आक्रोश किसी शक्तिशाली हैंड ग्रेनेड की तरह फट पड़ा। मैं चीखा, 'अबे भाग जा, वरना तेरी वो गत करूंगा कि तीन दिन तक हल्दी पियेगा।'
अच्छन प्रसाद तो मूड का कबाड़ा करके खिसक गया। सारा दिन मूड उखड़ा-उखड़ा सा रहा। काम पूरा न होने की वजह से क्रोध में संपादक जी ने गिरधर की कुंडलियों का पाठ किया, वह अलग है। तब से मैं अच्छन प्रसाद को देखते ही किनारा काट जाता हूं। एक दिन मैं अपना काम खत्म करके घर जा रहा था। आफिस के गेट पर ही अच्छन प्रसाद दिख गए। मैंने कतराकर निकल जाने में ही भलाई समझी। मुझे देखते ही अच्छन प्रसाद ने लगभग सैल्यूट की मुद्रा में लंबा नमस्कार किया। बोला, 'सर..सर...एक बात बताइए, बराक ओबामा हिंदू हैं क्या?' उसकी कम अक्ली पर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने कहा, 'यह तुमसे किसने कह दिया?' उसने कहा, 'सर जी..आज अपने अखबार में छपा है, इसलिए मुझे लगा कि बराक ओबामा हिंदू हैं।'
'अबे मंदअक्ल..अपने अखबार में यह कहां लिखा है कि बराक ओबामा हिंदू हैं।' मैंने खीझते हुए कहा। अच्छन प्रसाद ने बड़े सलीके से उत्तर दिया, 'सर जी..अपने अखबार के पहले पन्ने पर छपा है कि बराक ओबामा ने कहा, हे भगवान! तेरा लाख-लाख आभार...हमने अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था को संभाल लिया। अब अगर वे हिंदू न होते, तो भगवान को आभार क्यों जताते?' अच्छन प्रसाद की बात सुनकर मैं अपना माथा पकड़कर वहीं बैठ गया। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'अरे यार! तू मुझे 'पकाता' क्यों रहता है? मेरा पीछा छोड़ दे..मेरे भाई..मैं तो आजिज आ गया हूं, तुझसे।'
अच्छन प्रसाद के चेहरे पर पहली बार मुझे मुस्कान दिखी। वह मुस्कुराते हुए बोला, 'सर... आप भी तो पकाते रहते हैं, कभी व्यंग्य के नाम पर, तो कभी लेख के नाम पर। सर..आप 'पकाएं', तो यह आपकी प्रतिभा और मैं 'पकाऊं' तो मेरा पागलपन। सोचिए सर, आपके इन सड़े-गले व्यंग्यों और लेखों को पढ़कर हमारे पाठकों को कितनी कोफ्त होती होगी।' इतना कहकर अच्छन प्रसाद तो आफिस में चले गए और मैं गेट पर खड़ा रहा। मन तो यही कर रहा था कि अपना सिर सामने की दीवार पर दे मारूं।

Wednesday, July 22, 2015

सब कुछ चकाचक है, भइया!

अशोक मिश्र
आफिस पहुंचते ही संपादक जी ने आदेश का टोकरा मेरे सिर पर पटक दिया, 'मैं केंद्र सरकार की अब तक की उपलब्धियों पर एक परिशिष्ट (सप्लीमेंट) निकालना चाहता हूं। फौरन से पेशतर मुझे एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट चाहिए, ताकि उसे सप्लीमेंट में लिया जा सके।' इतना कहकर वे अपने चैंबर नुमा दड़बे में घुस गए। मैं सिर पकड़ कर बैठ गया। काफी शोध, पूछताछ और साक्षात्कार के बाद जो रिपोर्ट मैंने तैयार की, उसे देखते ही संपादक जी ने मेरे मुंह पर मारते हुए कहा, 'यह तुमने रिपोर्ट तैयार की है?...इसे ले जाकर रद्दी की टोकरी में डाल दो...।' इसके बाद वे मोबाइल पर व्यस्त हो गए। मैं लोट आया। अब आपके सामने अपनी रिपोर्ट पेश कर रहा हूँ । आप ही बताइए, इसमें मैंने क्या गलत लिखा था?
मैंने लिखा था, देश में सबके अच्छे दिन आ बहुत पुरानी बात हो चुकी है। यहां तो सब कुछ चकाचक है। दूध पीने वालों के लिए सरकार ने जहां हर गली के मोड़ पर मिल्क बूथ का इंतजाम किया है, तो शराब पीने वालों के लिए हर चौराहे पर 'मुफ्त सुरा वितरण केंद्र' स्थापित किए गए हैं। कहने का मतलब है कि जिसकी जैसी आवश्यकता है, सरकार ने वैसे ही प्रबंध किए हैं। सरकार की मेहरबानी से पूरे देश में रामराज्य कायम हो गया है। देश के प्रत्येक मोहल्ले, कालोनी और चौराहों पर लगे सरकारी नल पर शेर और बकरी एक साथ पानी पीते हैं। कई बार तो शेर एकदम लखनवी अंदाज में बकरी से 'पहले आप' कहते हुए पानी पीने का आग्रह करता है। बकरी भी दोस्ताना अंदाज में मुस्कुराती हुई पानी पीने के बात 'थैंक्स' कहती हुई चली जाती है। देश में अब न कोई गरीब है, न अमीर। इस सरकार से पहले जितने अमीर थे, सरकार के प्रभाव से वे पद और धन का मोह त्यागकर एकदम विरागी हो गए हैं। उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति, रुपया-पैसा या तो सरकार को दे दिया है या फिर गरीबों में बराबर-बराबर बांट दिया है। अपने पास सिर्फ इतना ही छोड़ा है, जितना इस देश के एक आम आदमी के पास है। यही नहीं, सरकार ने विदेश में जमा सारा काला और सफेद धन भारत में मंगवाकर अपने देश की जनता के बीच बंटवा दिया है। इस देश का हर नागरिक पंद्रह से बीस लख टकिया हो गया है। अब तो देश में पैदा होने वाला बच्चा भी पैदा होते ही लखटकिया हो जाता है क्योंकि बच्चे के संभावित जन्म से एक सप्ताह पहले सरकार उसके नाम का किसी बैंक में खाता खुलवाकर उसके नाम उतना ही पैसा डाल देती है जितना कि उसने दूसरे नागरिकों को दिया था। सरकार ने जन-धन योजना का पैसा पहली ही किस्त जमा होते ही खाताधारक के खाते में जमा करवा दिया है कि यदि दुर्घटना में खाताधारक की मृत्यु हो गई, तो ठीक...नहीं तो बाद में खाताधारक सधन्यवाद वह पैसा सरकार को वापस कर देगा।
देश में स्किल इंडिया बड़े जोर-शोर से चल रहा है। जिन्हें आईएएस, पीसीएस से लेकर इंजीनियर, मैनेजर, मजदूर, बस चालक, रिक्शावाला...कहने का मतलब है कि जिसकी जिस क्षेत्र में रुचि है, सरकार ने वैसे-वैसे प्रशिक्षण और शिक्षण संस्थान खुलवा दिए हैं। भ्रष्टाचार, लूट-खसोट से लेकर छिनताई और पाकेटमारी की लुप्त होती कला को भी जिंदा रखने का प्रयास सरकार बड़े पैमाने पर कर रही है। आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ करप्शन से लेकर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आफ पिकपाकेटिंग जैसे संस्थान प्रत्येक शहर में खुलवाए गए हैं, ताकि भारत की ये अमूल्य ललित कलाएं लुप्त न हो जाएं और पश्चिमी देश इन्हें अपना बताकर पेटेंट न करवा लें। सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों में पाकेटमारों, उठाईगीरों, ठगों, पूजा-पाठ के नाम पर ठगने वालों को बीस फीसदी आरक्षण दिया जाता है। बस, हत्या और बलात्कार जैसे मामलों में बड़ी सख्ती से सरकार पेश आती है। वैसे भी सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और छुटभैये से लेकर राष्ट्रीय स्तर के पार्टी नेताओं की चारित्रिक शुचिता, कर्तव्य पारायणता, लोक कल्याणकारी भावना ने देश की जनता को काफी प्रभावित किया है। अब कार्यालय चाहे किसी भी विभाग का हो, सरकारी हो या गैर सरकारी, ठीक दस बजे खुल जाता है और अपना काम लेकर आने वाली जनता का दरवाजे पर ही विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी मुस्कुराकर स्वागत करता है। उसे चाय-काफी पिलाकर पहले ठंडा होने दिया जाता है, फिर उसका काम पूछकर तुरंत निबटाया जाता है।
तो पाठको! यह है मेरी रिपोर्ट का निचोड़। बस आप इस बात को पुराने समय में चिट्ठियों में लिखा जाने वाला जुमला 'कि लिखा कम, समझना ज्यादा' की तर्ज पर पढ़ें। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरी यह रिपोर्ट संपादक जी को पसंद ही नहीं आई। अब आप लोग ही बताइए, मैंने कुछ गलत लिखा था क्या?

Friday, July 17, 2015

अब तो भैंस भी हो जाएगी डिजिटल

अशोक मिश्र
नथईपुरवा गांव में लुंगाड़ा ब्रिगेड (फालतू किस्म के आवारा लड़के) परचून की दुकान के सामने बैठी बतकूचन कर रही थी। उनमें से एक के हाथ में उसी दिन का अखबार था। वह अटक-अटक कर अखबार की हेडलाइंस पढ़ता जा रहा था, 'परधानमंतरी ने डिजि..टल इनडिया का किया उद..घाटन..। बोले, अब देश भर के गांव हो जाएंगे डिजि..टल।Ó इतना पढ़कर उसने शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन चारों ओर घुमाई और कुछ गर्व भरे शब्दों में पूछा, 'सुकुल काका..कुछ समझ में आया डिजि..टल का मतलब? अगर गांवों में सब कुछ डिजि..टल हो गया, तो मजा आ जाएगा।Ó
चतुरानन सुकुल ने नकारात्मक लहजे में सिर हिलाते हुए कहा, 'ई परधानमंतरी हैं न...एकदम मौका ही नहीं देते जरा भी सांस लेने का। अभी कुछ दिन पहले किए गए योग से कमर सीधी भी नहीं हुई थी कि पीठ पर लाद दिए हैं डिजिटल-फिजिटल इंडिया। अभी अच्छे दिन आना तो बाकी ही है। एक भी काम ढंग का हुआ नहीं और दूसरे का सपना दिखाने लगते हैं।Ó
'काका...आप भी न, एकदम गंवई-गंवार ही रहेंगे जिंदगी भर। अरे बड़े सपने देखिए..बड़े। सपने देखने में धेला भर का खर्च आए, तो बताइएगा। आपको क्या पता डिजि..टल होने के मतलब। अब गांव में सब कुछ डिजि...टल हो जाएगा। सब कुछ..माने सब कुछ। आपको खुर्रा-खांसी हुई, यहीं बैठे-बैठे कंपूटर से अस्पताल को अपनी हारी-बीमारी के बारे में बताइए, घंटा-आधा घंटा में दवाई आपके घर पहुंच जाएगी। न चार कोस पैदल चलने की झंझट, न अस्पताल में लाइन लगाने का टंटा।Ó लुंगाड़ा ब्रिगेड के एक वरिष्ठ सदस्य सुखई ज्ञान बघार रहे थे। वे अपनी सुविधा के अनुसार कठिन या लंबे शब्दों को दो भागों में बांटकर उच्चारण करने के आदी थे। तभी चतुरानन सुकुल ने बात काटते हुए कहा, 'कल तो यही बात परधानमंत्री जी टीबिया (टीवी) पर कह रहे थे कि अब तो किसानन का ट्यूबवेल चलाने के लिए खेत पर भी नहीं जाना पड़ेगा। अपने घर में बैठे-बैठे कंपूटर का बटन दबाओ, उधर ट्यूबवेल अपने-आप चालू हो जाएगा। खेत सींच जाने पर ट्यूबवेल अपने आप बंद भी हो जाएगा। भैंस चराने, गोबर उठाने से लेकर खेत में खाद डालने तक का काम अब सब डिजिटल हो जाएगा।Ó
 अब बारी थी लुंगाड़ा ब्रिगेड के उन युवकों के मुंह ताकने की, जो अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी समझते थे। वे मुंह बाए चतुरानन सुकुल का मुंह ताक रहे थे और सुकुल धारा प्रवाह बोलते जा रहे थे, 'जानते हो..अब भैंस, गाय, बकरी से लेकर दूसरे जानवर तक डिजिटल हो जाएंगे। जैसे ही गाय, बकरी या भैंस को गोबर करने का समय हुआ, कंपूटर का बटन दबाओ, आपके घर के बाहर या भीतर बंधे पशु खटाखट खूंटे से अलग हटकर गोबर करने लगेंगे। दूध देने का टाइम हुआ, तो उनके थन के नीचे  बस बाल्टी रख दो, वे दूध देने लगेंगी। मजाल है कि दूध की एक बूंद भी बाल्टी या लोटे से बाहर निकल जाए? जैसे ही बाल्टी भरी, उनके दूध की धार तुरंत बंद। यहां कंपूटर का बटन 'लपलपÓ करके जलने लगेगा। जैसे ही कंपूटर का बटन लपलप करे, तुम जान जाओ कि कोई गड़बड़ है।Ó
'हां..काका.. अब तो बस मजे ही मजे हैं। अच्छा काका..गाय, भैंस, बकरी ही डिजिटल हो पाएंगी और कोई और भी...?Ó सुखई ने चुहुल के अंदाज में चतुरानन सुकुल को छेड़ा।
हाजिर जवाब चतुरानन सुकुल ने नहले पर दहला जड़ा, 'हां..हां..क्यों नहीं, तुम्हारी मौसी, मामी और महतारी भी डिजिटल हो जाएंगी।Ó गांव के रिश्ते से भौजाई लगने वाली सुखई की मां से सुकुल ने मजाक किया। चतुरानन सुकुल की बात सुनते ही वहां उपस्थित सारे लोग हंस पड़े। खिसियाए सुखई ने वहां से हट लेने में ही भलाई समझी। और फिर धीरे-धीरे यह मंडली बिखर गई किसी नई जगह मजमा जमाने की नीयत से, जहां चतुरानन सुकुल जैसे लोग उनकी गप गोष्ठी में विघ्न न डाल सकें।

Friday, July 10, 2015

जितना बड़ा फेंकू, उतना बड़ा मौनी

अशोक मिश्र
एनसीआर से प्रकाशित
दैनिक 'न्यू ब्राइट स्टारÓ के
10/07/2015 के अंक में छपा
मेरा एक व्यंग्य
मौन की महिमा संस्कृत साहित्य में बहुत बढ़-चढ़कर बताई गई है। पूरा संस्कृत साहित्य मौन की महत्ता से भरा पड़ा है। कहा गया है कि मौन  सबसे बड़ा हथियार है, जिससे आप कितने ही वीर, पराक्रमी और तेजस्वी शत्रु को पराजित कर सकते हैं। कहते हैं कि मौन रहना भी एक साधना है। जैसे अतिभोग से वितृष्णा होने पर व्यक्ति योगी हो जाता है, वैसे ही लंबी-लंबी फेंकने के बाद मौन एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है। जिस तरह योग की पराकाष्ठा अतिभोग के बिना संभव नहीं है, ठीक उसी प्रकार मौन का रास्ता भी लंबी-लंबी फेंकने, लंबे-चौड़े वायदे करने से ही होकर जाता है। जो व्यक्ति फेंकने की कला में जितना ज्यादा  निष्णात होता है, उसे मौन की भी कला बहुत अच्छी तरह से आती है। वह जानता है कि उसे कब और कितना फेंकना है और फेंकने के बाद उठे बवंडर के थमने तक किस तरह मौन रहना है? इससे पहले वाले मौनी बाबा जब यह कहते थे कि 'हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखेÓ, तो यही लोग संसद और सड़क तक बाइस पसेरी धान बोए रहते थे। संसद में तो हल्ला-गुल्ला मचाते ही थे, सड़क पर भी छाती पीटते थे। बात-बात पर नारा लगाते थे, इस्तीफा दो..इस्तीफा दो..।
अब इसे राजनीति की द्वंद्वात्मकता कहें, इतिहास का अपने को दोहराना कहें, कल तक जो लोग बात-बात पर सावन-भादों के मेढक की तरह एक लय और सुरताल में टर्राते थे, इस्तीफा दो.. बर्खास्त करो..जवाब दो..भ्रष्टाचारियों को बाहर करो..। आज वे लोग उन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं। कल तक छप्पन इंच का सीना फुलाकर मौनी बाबा को कठघरे में खड़ा करने वाला आज खुद कठघरे में हैं। राजनीति में भूमिका बदल गई है। कल तक मौन रहने वाले अपना व्रत तोड़ चुके हैं, बात-बात पर हंगामा खड़ा करने वाले इन दिनों भीगी बिल्ली की तरह टुकुर-टुकुर इस्तीफा मांगने वालों के जोश ठंडे होने का इंतजार कर रहे हैं। यह मौन रहने वाले का सबसे बड़ा हथियार है।

पहले वाले मौनी बाबा को किसी ने विरोधियों के उकसाने पर कुछ कहते सुना है? नहीं न..वे अपना मौन व्रत तभी तोड़ते थे, जब उनके व्रत के पारायण का समय आता था। जो लोग आज गरज-बरस रहे हैं, खुदा न खास्ता..कल अगर वे प्रधानमंत्रित्व को प्राप्त हुए, तो वे भी मौन धारण कर लेंगे। आप उनका कुछ बिगाड़ लेंगे क्या? बोलना-न बोलना, मौन व्रत धारण करना, उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।

Wednesday, July 1, 2015

रोज तमाशा जनता के आगे

अशोक मिश्र
मोहल्ले अपने जिले के अपररूप होते हैं और जिले अपने राज्य के। राज्यों में पूरे देश का बिंब उभरता है। आज दिल्ली की जो हालत है, उसे देखकर मुझे अपने बचपन का वह मोहल्ला याद आता है, जहां सभी औरतें रहती तो एक साथ हिल मिलकर। किसी के सिर में जरा सा दर्द हुआ, तो मोहल्ले की लगभग सभी औरतें सेवा में हाजिर। कोई बाम लाकर दे रहा है, लो जिज्जी..थोड़ा सा मल लो..अभी थोड़ी देर में सिरदर्द ऐसे गायब हो जाएगा, जैसे दर्द मुआ कभी रहा ही नहीं हो। कोई महकउवा (महकने वाला) तेल लिए हाजिर। रामू की अम्मा..बड़ा ठंडा तेल है, लाओ सिर की मालिश कर देती हूं, दर्द अभी छूमंतर हो जाएगा। और खबरदार..जो आज तिनका भी तोड़ा, रामदुलारी से कह दूंगी, सारा घर का काम कर देगी और खाना बनाकर सबको खिला भी देगी। अगर खुदा न खास्ता..वहां रामदुलारी अगर मौजूद हुई, तो उसकी पीठ पर दो धौल जमाती हुई उसकी मां कहती थी, कुलच्छनी कहीं की..देख नहीं रही कि चाची के घर के बरतन-भांडे जूठे पड़े हैं। चल जल्दी से बरतन साफ कर खाना बना दे। यह हाल पूरे मोहल्ले की औरतों का था। सुख-दुख में ऐसे साथ कि जैसे एक ही पेट से पैदा हुई बहनें हों।
लेकिन जिस दिन किसी भी दो औरतों की किसी भी बात को लेकर आपस में बिगड़ जाती थी, उस दिन हम बच्चों को मनोरंजन का एक साधन भी मिल जाता था। वैसे इससे हम बच्चों का सामान्य ज्ञान भी बढ़ता था, हम सब में संबंधों को लेकर एक समझ विकसित होती थी। दोनों पक्ष की औरतें एक दूसरे के वैध और अवैध संबंधों का खुलासा करती हुई सात पुश्त तक का सिजरा पेश कर देती थीं। दिल्ली में आजकल यही हो रहा है। सभी राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे का सिजरा खोलकर बैठी हैं। छोटी-छोटी बातों को बतंगड़ बनाया जा रहा है, जैसे इसी पुनीत कार्य के लिए जनता ने उन्हें चुनकर संसद और विधानसभा में भेजा है। एक पार्टी दूसरी पार्टी पर आरोप लगाती है कि तुम्हारे इतने सांसदों-विधायकों की डिग्रियां फर्जी हैं, तो दूसरी झट से आरोप लगाने वाली पार्टी का कच्चा-चिटठा पेश कर देती है। देश-प्रदेश की जनता भकुआई हुई यह तमाशा देखने को मजबूर है।

यह पुलिस है या चूं-चूं का मुरब्बा

अशोक मिश्र
उस्ताद गुनहगार और मुसद्दी लाल पड़ोसी होने के साथ-साथ दोस्त भी हैं। इनकी दोस्ती फिल्म शोले के 'जय'  और 'वीरू' वाली है। एक देश का नामी-गिरामी पाकेटमार, जिसके सौ-पचास शिष्य पूरे देश में अपनी अंगुलियों का कमाल दिखाकर अपने बाल बच्चों का पेट पाल रहे हैं। दूसरा एक थाने का मामूली सा सिपाही, जो साल के दस महीने या तो लाइनहाजिर रहता है या फिर सस्पेंड। दोनों को एक दूसरे के 'प्लस-माइनस' यानी गुण-अवगुण अच्छी तरह से पता हैं। कई बार तो अपना सस्पेंशन खत्म कराने के लिए मुसद्दी लाल ने उस्ताद गुनहगार को रंगे हाथ पकडऩे का कारनामा किया है और फिर अपनी बीवी को भेजकर उनकी जमानत भी करवाई है। शाम को मुसद्दी लाल ने गुनहगार को अपनी छत पर आने का इशारा किया, तो वे दबे पांव अपनी छत से मुसद्दीलाल की छत पर आ गए। मुसद्दी लाल ने बैठने का इशारा करते हुए कहा, 'आइए उस्ताद! मेरे पास एक बोतल सामाजिक बुराई है, हम दोनों इसको पीकर समाज से इसे खत्म करने का पुनीत कार्य करते हैं।'
आधी सामाजिक बुराई खत्म करने के बाद मुसद्दी लाल बोले, 'यार! तू मुझे भी पाकेटमारी सिखा दे। मैं भी तेरी तरह पाकेटमार बनकर सुकून की जिंदगी बिता सकूं। यह नौकरी है कि मुसीबत है। अब तो मन ऊब गया है इस पुलिसिया नौकरी से।'  गुनहगार झूमते हुए बोले, 'पॉकेटमारी कोई गाजर का हलवा है कि मुंह में रखा और घूंट गए? जानते हो, जब कोई चोर या पाकेटमार पकड़ा जाता है, तो उसका स्वागत सत्कार लोग किस तरह करते हैं? हर आता-जाता आदमी के हाथ जमाने के बाद मुंह पर ऐसे थूक कर चला जाता है, जैसे इस दुनिया का सबसे बड़ा शरीफ वही हो, भले ही उसने लाखों रुपये का गबन किया हो, अमानत में खयानत किया हो। तुम पुलिसिये भी तो गाहे-बगाहे हम लोगों की किस तरह पूजा करते हो, यह किसी से छिपा हुआ है क्या? अब साफ-साफ बताओ..हुआ क्या है? तू तो बहुत खुश रहता था अपनी पुलिस की नौकरी से।'
मुसद्दी लाल ने एक लंबा घूंट भरा और बोले, 'पहले तो सब कुछ ठीक ठाक था। चोरी-चकारी करने वालों को पकड़ता था, उनसे कुछ वसूली-फसूली कर ली, दो-चार थप्पड़ लगा दिए, बहुत गंभीर अपराध हुआ, तो कानून के अनुसार धाराएं लगा दी और अदालत में पेश कर दिया। अपना काम खत्म। भले ही हम भ्रष्ट हों, लाख बुराई हों हम पुलिस वालों में, लेकिन मन में कहीं न कहीं एक सुकून था कि हमारी भी समाज में एक उपयोगिता है। लेकिन यह भ्रम अब टूटता जा रहा है। लगता है कि हम सिर्फ काठ के उल्लू हैं।'
उस्ताद गुनहगार ने गिलास भरते हुए कहा, 'तू कुछ बताएगा भी या मामले की पूंछ यों ही खींचता रहेगा। हुआ क्या..जो तू आज दार्शनिक बना हुआ है?' मुसद्दी लाल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, 'क्या बताऊं..आज हमारी हालत यह हो गई है कि मंत्री का कच्छा खो जाए, तो हम खोजकर लाएं। उनकी बनियान हवा में उड़ जाए, तो पुलिस वाले दोषी..किसी की भैंस चोरी हो, तो पुलिस खोजे, मंत्री, सांसद, विधायक या साहब का टॉमी आवारगी के चक्कर में बंगले से बाहर चला जाए, तो वह भी पुलिस के मत्थे..बताओ भला..अब मुर्गियां कहां से ढूंढकर लाया जाए। भला बताओ..पुलिस न हो गई, चूं-चूं का मुरब्बा हो गई..जिसका जब मन हुआ मुंह में रखा और गप्प से घूंट गया।'
'हां..भाई..सचमुच..जैसे पुलिस वालों की कोई औकात ही नहीं रह गई है। अरे..इन लोगों को समझना चाहिए कि पुलिस वाले भी इंसान होते हैं। मुझे तो अब उस मुर्गी और भैंस चोर पर गुस्सा आ रहा है। इन नासपीटों ने हम चोरों-पाकेटमारों की इज्जत का फालूदा बना दिया है। कोई स्टैंडर्ड ही नहीं रह गया है चोरी-चकारी का।' इतना कहकर दोनों घूंट-घूंट पीकर अपना गम गलत करते रहे।