Tuesday, December 25, 2012

आ रही है 'योजना'


अशोक मिश्र
मैं लखनऊ  के प्रसिद्ध ‘सर चिरकुटानंद प्रतिभावल्लभ स्मृति पुस्तकालय’ में दैनिक समाचारपत्र ‘अधिंयारे में प्रकाश’ की पुरानी प्रतियां उलट-पलट रहा था। उसी दौरान सन् 1952 में प्रकाशित एक व्यंग्य पर मेरी निगाह गई, जिसे किसी ऐसे शख्स ने लिखा था, जिसका तखल्लुस ‘खुरपेंची’ था। दरअसल, उस पुरानी और रखे-रखे धूमिल पड़ गई प्रति में व्यंग्यकार का सिर्फ तखल्लुस ही पढ़ने में आ रहा था। वह व्यंग्य मुझे आज आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी प्रासंगिक लगा, तो आपके सामने यथावत पेश करने का दुस्साहस कर रहा हूं। कुकुरभुकवा गांव के बाहर की पगडंडी पर पूरा गांव जमा था। स्त्री-पुरुष, बच्चे, जवान और बूढ़े सबकी निगाहें सड़क से निकलकर गांव तक आने वाली पगडंडी पर लगी हुई थीं। बच्चे जहां पगडंडी के किनारे के खेतों में खेलने में मशगूल थे, तो घूंघट में छिपी औरतें झुंड बनाकर अपनी दुनिया में मस्त थीं। उस भीड़ में शामिल साठ वर्षीय भुलुई प्रसाद ने तंबाकू को चूने से रगड़ने के बाद होंठों के बीच दबाते हुए कहा, ‘देखो! वह आए, तो सबसे पहले बच्चे लपककर उसके पैर छुएंगे। उसके बाद अपनी उम्र और पद के हिसाब से गांव की बहुएं पांव छुएंगी।’ यह सुनते ही भुलुई की भौजाई ने ठिठोली की, ‘और तुम क्या करोगे, भुलुई?’ गांव की जवान भौजाइयों से रस लेकर बतियाने वाले भुलुई इस मौके पर कहां चूकने वाले थे, ‘जैसे ही वह आएगी, सब उसकी ओर निहारने लगेंगे। सबकी और भइया की निगाह बचाकर मैं तुम्हें निहारने लगूंगा। निहारने दोगी न भौजाई?’ द्विअर्थी संवाद में माहिर भुलुई ने झट से नहले पर दहला जड़ दिया। भुलुई की बात सुनकर भौजाई के दूसरे देवर ठहाका लगाकर हंस पड़े। भौजाई भी कहां चूकने वाली थीं! उन्होंने तपाक से कहा, ‘भुलुई, तुम मुझे नहीं, बचना (भुलुई के बेटे) की महतारी को निहारना। कहीं ऐसा न हो कि तुम भौजाइयों के फेर में पड़ो और बचना की महतारी को उसका कोई देवर ले उड़े। बचना की महतारी के देवर कम छबीले नहीं हैं। भौजाई तो हाथ आने वाली नहीं है, लुगाई से भी हाथ धो बैठो।’
खिसियाए भुलुई दूसरी ओर सरक गए। भुलुई की बुआ, काकी, बहन या ताई लगने वाली औरतें खिलखिलाकर हंस पड़ी। कुछ बुजुर्ग औरतों ने भुलुई की भौजाई को मीठी झिड़की भी दी। काफी देर से कुछ बोलने को कुनमुना रहे कंधई से आखिर रहा नहीं गया, ‘बप्पा! वह कैसी है? उसको आपने कभी देखा है? तिक्कर काका बता रहे थे कि अभी कमसिन उमर है उसकी?’ पिछले चार-पांच घंटे से इंतजार में बैठे-बैठे ऊब चुके गोबरधन (गोवर्धन) ने झुंझलाते हुए कहा, ‘तुम्हारी छोटकी मौसी जैसी है वह। जा भाग ससुर के नाती! नहीं तो दूंगा कान के नीचे एक कंटाप, मुंह झांवर हो जाएगा। जवाहिरा भी न जाने किस मुसीबत में फंसा दिया हम सबको। अरे! भेजना ही था, तो भेज देता। यह क्या कि पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीट दिया।’ उस भीड़ में शामिल कुछ और लोग भी अब इंतजार करते-करते थक चुके थे, उन्होंने भी गोबरधन की बात पर ‘हां में हां’ मिलाना अपना पुनीत कर्तव्य समझा। कुछ लोग इंतजार करते-करते थक चुके थे और वे घर वापसी की सोच ही रहे थे कि तभी उन्हें दूर पगडंडी पर सुर्ख लाल कपड़ों में लिपटी एक महिला और उसके आगे-आगे एक पुरुष आता दिखाई पड़ा, तो उत्साहित होकर चिल्ला पड़े। एक बुजुर्ग ने गौर से देखते हुए कहा, ‘लगता है, जवाहिरा खुद लेकर आ रहा है।’ लोग टकटकी लगाए देखते रहे। उस जोड़े के नजदीक आते ही छबीली की माई चिल्ला पड़ी, ‘अरे यह तो खुरपेंचिया और उसकी मेहरिया है। अपनी ससुराल वह कल अपनी मेहरिया को विदा कराने गया था।’
गांव के बाहर भीड़ देखकर मैं (पाठक ध्यान दें, यह मुझे नहीं, बल्कि खुरपेंची समझकर पढ़ें) भौंचक्का रह गया। मैंने गांव के बुजुर्गों को प्रणाम करते हुए कहा, ‘अरे! आप लोग यहां...?’  गोबरधन ने झुंझलाते हुए कहा, ‘कल रेडियो पर जवाहिरा बोला था कि लोगों की गरीबी और भुखमरी मिटाने के लिए गांव-गांव योजना भेजी जा रही है। तो हम लोग सुबह से ही यहां पगडंडी पर योजना का इंतजार कर रहे हैं।’ गोवरधन काका की बात सुनते ही मेरी हंसी छूट गई। मैं पेट पकड़कर ठहाका लगाकर हंस पड़ा, ‘आप लोग भी कितने भोले हैं। अरे, ऐसी योजना को आते-आते अभी कई साल लगेंगे। और फिर योजना कोई मर्द या औरत तो है नहीं कि उसका आप लोग यहां खड़े होकर इंतजार करें। आप लोग घर जाइए, जब योजना आएगी, तो आपको पता लग जाएगा।’ तब से आज  तक उस गांव के लोगों को योजना का इंतजार है।

Sunday, December 16, 2012

समधन का अचार

अशोक मिश्र 


सुबह उठकर श्रीवास्तव जी ने अंगड़ाई ली, तो मैंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘भाई साहब! आपकी अंगड़ाई लेने की अदा देखकर मुझे एक शेर याद आ रहा है, अगर इजाजत हो, तो पेश करूं।’ श्रीवास्तव जी ने मुझे पहले तो घूरकर देखा। उनके घूरते ही मैं सकपका गया। मुझे सकपकाते देखकर उन्होंने दरियादिली दिखाई और किसी शहंशाह की तरह बोले, ‘अब जब दिमाग में आ ही गया है, तो सुना भी डालो।’ उनकी इस दरियादिली पर मैं खुश हो गया। मैंने अर्ज किया, ‘उनसे छींके से कोई चीज उतरवाई है/काम का काम है, अंगड़ाई की अंगड़ाई है।’ मेरे इतना कहते ही वे कविवर बिहारी लाल के किसी परकीया नायक की तरह शर्मा गए और बोले, ‘मैं एक बात बताऊं। जब मैं गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, तो मैं कई लड़कियों को अपनी अंगड़ाई से बेहोश कर चुका हूं। मेरी अंगड़ाइयों के बारे में लड़कियां शेर कहा करती थीं, ‘कहां पे बर्क (बिजली) चमकती है ऐ सानिया देख!\कोई मरदूद हॉस्टल के आस-पास अंगड़ाइयां लेता है।’ और यह कहते-कहते श्रीवास्तव जी खिलखिलाकर हंस पड़े। तभी रामभूल ने किचन से निकल कर कहा, ‘सर जी! भोजन तैयार हो गया है, तैयार हो जाइए।’
रामभूल की बात सुनकर हम दोनों अपने दैनिक कार्यों में संलग्न हो गए। मेरे बाथरूम से निकलते ही श्रीवास्तव जी ने सर्दी भगाने के लिए हाथ-पैरों को इधर-उधर फेंकते हुए बाबा रामदेव जैसी मुद्रा अख्तियार की और लगे नृत्यासन करने। इस पर भी ठंड से जकड़े हाथ-पैरों में गर्मी नहीं आई, तो उन्होंने ठुमका लगाते हुए द्रुत गति के विलंबित ताल में आलाप भरा, ‘समधन तेरी घोड़ी चने के खेत में...।’ और लगे नृत्य करने। मैंने कहा, ‘भाई साहब, जरा ध्यान से हिलोरें लें, कहीं बुढ़ापे में कमर लचक गई, तो मुश्किल होगी।’ श्रीवास्तव जी ने फिर मुझे घूरा, लेकिन मैं तब तक भागकर दूसरे कमरे में चला गया था। बाथरूम से श्रीवास्तव जी के गाने की अब आवाज आ रही थी, ‘ठंडे-ठंडे पानी में नहाना चाहिए...।’पूजा-पाठ का संक्षिप्त कार्यक्रम निबटाने के बाद जब श्रीवास्तव जी खाने को बैठे, तो उन्होंने रामभूल को हुक्म दिया, ‘सुनो! वह अचार का डिब्बा उठाकर लाना। बहुत दिन हुए अचार नहीं खाया है। आज अचार खाने का मन हो रहा है।’ रामभूल ने अचार का डिब्बा उठाया, लेकिन इसे संयोग कहें या दुर्योग, वह डिब्बा हाथ से छूटा और ‘पट्ट’ की आवाज करता हुआ जमीन पर आ गिरा। गटापारचे (प्लास्टिक) के डिब्बे का ढक्कन संयोग से नहीं खुला था, इसलिए अचार जमीन पर गिरने से बच गया था। अचार के डिब्बे को जमीन पर गिरा देखकर श्रीवास्तव जी कलप उठे, ‘हाय! यह तूने क्या कर डाला। नामुराद! तेरी आंखें क्या घास चरने चली गई हैं, तेरे हाथों में जान नहीं है क्या? ठीक से नहीं पकड़ सकता था अचार का डिब्बा।
तेरे हाथ से सब्जी से भरी कड़ाही गिर जाती, तो मुझे इतना दुख नहीं होता। कमअक्ल तूने अचार का डिब्बा गिरा दिया।’ श्रीवास्तव जी की बात सुनकर मैं भी भौंचक रह गया। बात-बात पर हंसने-खिलखिलाने और अपनी विनोदप्रियता के लिए विख्यात श्रीवास्तव जी का यह रूप अप्रत्याशित था। डिब्बे के गिरने और डांट खाने से रुंआसा रामभूल चुपचाप आकर खाना खाने लगा। उससे ज्यादा खाया नहीं गया और वह थोड़ा बहुत खाकर उठ गया। थोड़ी देर बाद श्रीवास्तव जी किसी काम से घर से निकल गए, तो रामभूल ने मुझसे पूछा, ‘भाई जी! मान लीजिए, अचार का डिब्बा हाथ से छूट ही गया था, तो श्रीवास्तव जी इस मामूली बात पर इतने नाराज क्यों हो उठे थे?’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘तुम नहीं समझोगे। दरअसल, अचार का जो डिब्बा तुम्हारे हाथ से छूटकर गिरा था, वह अचार उनकी समधन ने भिजवाया था। जब यह अचार लाए थे, तो वे इस डिब्बे को मुझे भी नहीं छूने देते थे। बहुत थोड़ा-सा अचार निकालकर दो भागों में बांटकर एक अपने लिए रखकर दूसरा मुझे दे देते थे। एक दिन मैंने थोड़ा बड़ा टुकड़ा ले लिया, तो वे बिगड़ पड़े थे, ‘सारा एक ही दिन में खा जाओगे। जानते हो, इसे मेरी समधन ने कितने प्यार से बनाकर भेजा है। इसमें समाए समधन के प्यार की नमकीनियत तुम जैसा हृदयहीन व्यक्ति क्या समझ सकता है। यह तो मुझसे पूछो, जो उस चुलबुली समधन को दिन में चार बार याद करता है।’
जानते हो, दिन में कई बार किचन में जाकर अपने तौलिये या रुमाल से अचार के डिब्बे पर जमी धूल को बड़े प्यार से झाड़ते हैं। उस डिब्बे को बड़े प्यार से सहलाते हैं। एक मजेदार बात बताऊं। सवा साल पहले भूल से श्रीवास्तव जी की बेल्ट उनकी साली के पर्स में और उनकी साली का टैल्क पाउडर उनके बैग में रह गया। दिल्ली आने पर उन्हें इस बात का पता चला। तब से वे उस पॉवडर के डिब्बे को अपने बैग में छिपाकर रखते हैं और उनकी बेल्ट उनकी साली जी लगा रही हैं। यह बुढ़ापे का प्रेम ऐसा ही होता है। तुम उनकी बात का बुरा मत मानना।’ मेरी बात सुनकर रामभूल चुपचाप अपने काम में लग गया।

Thursday, December 6, 2012

कौन है ‘आम’ आदमी?

अशोक मिश्र 

कल आफिस में बैठा खबरों की कतरब्योंत कर रहा था कि संपादक जी का बुलावा आया। उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने तालिबानी फरमान सुनाते हुए कहा, ‘केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर एक राइटअप जा रहा है। मुझे चार ‘आम’ आदमियों की बाइट्स चाहिए। फटाफट यहां से फूटो और शाम तक अपना काम पूरा करके वैसे ही हवा पर सवार होकर वापस आओ, जैसे हनुमान जी किष्किंधा पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर वापस आए थे। और सुनो! ये चारों आम ही होने चाहिए, खास नहीं।ह्ण संपादक जी का आदेश सिर माथे पर रखकर मैं ‘आम आदमी’ खोजने निकला। कई लोगों से पूछा, सबने बस एक ही बात कही, ‘देश की सवा सौ करोड़ आबादी में से सिर्फ पांच फीसदी खास आदमी हैं, बाकी तो सब आम ही हैं। आम आदमी तो सब जगह पाए जाते हैं।’ मैंने उस आदमी से पूछा, ‘तो क्या तुम भी आम आदमी हो?’ उसने कहा, ‘नहीं, मैं तो ‘फ्राड एंड फ्राड संस’ में सीनियर क्लर्क हूं। मैं आम आदमी कैसे हो सकता हूं?’ उस सीनियर क्लर्क से मैंने पूछा, ‘यह कमबख्त आम आदमी मुझे मिलेगा कहां? उसकी कोई पहचान तो होगी, उसका कोई रंग-रूप, कद-काठी...कुछ तो होगा यार...।’ वह सीनियर क्लर्क मेरी बात सुनकर पहले तो खूब हंसा और फिर यह कहते हुए अपनी राह चला गया, ‘भगवान का ही दूसरा रूप है आम आदमी। जिस तरह भगवान सब जगह हैं, सबमें हैं, वे घर में भी हैं, श्मशान में भी। वह हिंदू में हैं, मुसलमान में भी...ठीक उसी तरह आम आदमी है। सब जगह है, लेकिन कहीं नहीं है।’ मैंने उस आदमी को सनकी समझकर अपने कंधे उचकाए और आम आदमी की तलाश में आगे बढ़ गया।

आम आदमी को खोजते-खोजते शाम हो गई, लेकिन वह नामाकूल कहीं नहीं मिला। थकहार कर मैंने घर का रास्ता पकड़ा, रास्ते में छबीली अपने दरवाजे पर खड़ी मिल गई। मैंने उससे पूछा, ‘तुम आम आदमी हो?’ उसने अपनी चोटी को पकड़कर सीने की ओर लहराते हुए इठलाकर कहा, ‘तुममें सामान्य ज्ञान की बहुत कमी है। मैं आम या खास किसी भी तरह की आदमी नहीं हो सकती हूं। हां, मैं ‘आम महिला’ हो सकती हूं।’ मैं हड़बड़ा गया, ‘अरे...उस अर्थ में मैंने नहीं पूछा था। मेरा मतलब है कि तुम कॉमन मैन हो?’ वह इस बार भी मुस्कुराई और बोली, ‘अर्ज किया है कि मैं कॉमन वीमेन हो सकती हूं, कॉमन मैन नहीं।’ बार-बार उपहास उड़ाए जाने और कार्य में असफल रहने से खिन्न होकर मैंने कहा, ‘मुझे माफ करो, मैंने गलत दरवाजा खटखटा लिया है।’ इतना कहकर मैं जैसे ही आगे बढ़ा, छबीली ने कहा, ‘सुनिए, मैं आपकी ‘वो’ हूं, अपने बच्चों की मां हूं, लेकिन आम आदमी नहीं हूं।’ घर पहुंचा, तो काफी निराश था। मेरी दशा-दुर्दशा देखकर बीवी घबरा गई। उसने मुझसे परेशानी पूछी, तो मैंने झल्लाते हुए कहा, ‘यार! सारे देश में हल्ला हो रहा है आम आदमी का और दोपहर से ढूंढ रहा हूं इस नासपीटे ‘आम’ आदमी को। पता नहीं किस गली-कूंचे में रहता है यह मुआ।’ मेरी बीवी ने चाय का प्याला पकड़ाते हुए कहा, ‘बस..इतनी सी बात है? कल सुबह आपको एक आम आदमी से जरूर मिलवा दूंगी। निश्चिंत होकर बैठिए।’

अगले दिन सुबह जब बेटी तैयार होकर स्कूल जाने लगी, तो मेरी पत्नी ने जगाते हुए कहा, ‘एक आम आदमी आने वाला है। बाहर जाकर मिल लो।’ दरवाजे पर मेरी बेटी को स्कूल पहुंचाने वाला रिक्शाचालक खड़ा था। मैंने उससे पूछा, ‘तुम आम आदमी हो?’ मेरे पूछने पर वह घबड़ा गया, ‘ना बाबू! हम कइसे आम आदमी होय सकित है। हमार ऐसन भाग कहां? हम तौ कमरुद्दीन हूं, बच्चन (बच्चों) का इस्कूल पहुंचाइत हय। हमका आम आदमी से का लेना-देना है।’ मैंने बीवी की ओर सवालिया निगाहों से घूरा और कहा, ‘यही है तुम्हारा आम आदमी? कल से अब तक जो समझ पाया हूं, इस देश में हिंदू बसते हैं, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, सिख बसते हैं। अधिकारी-कर्मचारी, बेरोजगार-बारोजगार, अच्छे-बुरे रहते हैं, लेकिन आम आदमी कहीं नहीं पाया जाता है। खामुख्वाह, लोग आम आदमी के पीछे पड़े रहते हैं।’ दस बजे जब आफिस पहुंचा, तो संपादक जी के पास जाकर मैंने कहा, ‘सर! इस देश में आम आदमी नहीं पाया जाता। हां, अगर पाकिस्तान से घुसपैठ करके आया हो, मैं नहीं कह सकता। सीबीआई, आईबी, रॉ या आप जहां कहें, वहां आम आदमी के संबंध में आरटीआई लगा दूं। सरकार खोजकर बता देगी, यह कमबख्त आम आदमी कहां पाया जाता है।’ इतना कहकर मैं उनके चैंबर से बाहर आ गया। सुना है, मेरी बात सुनकर वे काफी देर तक अपना सिर पकड़कर बैठे रहे।

Friday, November 30, 2012

‘ढाई आखर’ का स्कूल


-अशोक मिश्र

काफी दिनों से दिली ख्वाहिश थी कि लव गुरु मटुकनाथ चौधरी से मुलाकात की जाए, उनसे लव टिप्स लिए जाएं। लेकिन ऐसा कोई संयोग नहीं बन पा रहा था। पिछले दिनों जब लव गुरु ने लव स्कूल खोलने की घोषणा की, तो मन चिहुंक उठा। फटाफट रिजर्वेशन करवाया और जा पहुंचा पटना के बीएन (बगलोल नारायण) कालेज। वहां से पूछता-पूछता उनके घर पहुंचा। लव गुरु खटिया पर बैठे प्याज छील रहे थे और उनकी शिष्या कम जीवन संगिनी जूली बैठी तरकारी काट रही थीं। मैंने उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हुए कहा, ‘अपनी पत्रिका के लिए आपका साक्षात्कार लेने आया हूं।’ मेरी बात सुनकर लवगुरु हिंदी साहित्य में वर्णित ‘नवोढ़ा’ नायिका की तरह शरमा गए, इस पर जूली खिलखिलाकर हंस पड़ीं। लव गुरु साक्षात्कार देने में आनाकानी करें, इससे पहले मैंने सवाल दाग दिया, ‘संत कबीर को आप कितना समझते हैं?’

लव गुरु ने कहा, ‘कबीर को मेरे अलावा इस देश में किसी और ने समझा ही नहीं है। कबीर का दर्शन तो मेरे रोम-रोम ने आत्मसात किया है। कबीरदास जी का कहना है, ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।’ इसीलिए पहले पोथी पढ़ी, मास्टर हुआ। जब कॉलेज में पढ़ने आई, तो हम दोनों ढाई आखर एक साथ पढ़ने लगे।’ मैंने अगला सवाल दागा, ‘प्रेम और प्रताड़ना (मारपीट-धमकी) को किस रूप में लेते हैं आप?’ लव गुरु कुछ कहते, इससे पहले लव गुरुआइन (जूली) टपक पड़ीं, ‘ढाई आखर भाखने (बांचने) के बाद सब कुछ बेमानी हो जाता है। अब हमारे मामले में ही लीजिए। क्या-क्या नहीं हुआ? दीदी (लव गुरु की पहली पत्नी) ने हमारे मुंह पर कालिख पोती, भरे बाजार में पीटा और पिटवाया, कॉलेज से निकाले गए, लेकिन मजाल है कि हममें से कोई विचलित हुआ हो। एक बार जब प्रेम का प्याला छककर पी लिया, तो नाचना ही था। हम भी नाचे। कुछ दुनिया को दिखाने के लिए नाचे, तो कुछ प्रेम के वशीभूत होकर नाचे।’

मैंने पूछा, ‘आप कोई लव स्कूल खोलने जा रहे हैं?’ लव गुरु ने उल्लास भरे स्वर में कहा, ‘हां, खोलने जा रहे हैं ‘जूली-मटुक प्रेम कला निकेतन।’ नई पीढ़ी को प्यार का पाठ पढ़ाने की जरूरत है। कितने शर्म की बात है कि ऋषि-मुनियों के देश में नौनिहालों को प्यार का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है। जब पूरी दुनिया जांगल्य युग में जी रही थी, तब हमारे ऋषि-मुनियों को प्रेम की महत्ता का ज्ञान था। वैसे हम जल्दी ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग और प्रदेश सरकार को ज्ञापन देकर मांग करने वाले हैं कि प्रेम को राष्ट्रीय कर्म घोषित किया जाए। जिस व्यक्ति की कोई प्रेम कहानी न हो, जो प्रेममार्गी होने की वजह से पिटा न हो, उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया जाए। ग्रेजुएशन में एक परचा सभी पार्टियां सिर्फ और सिर्फ प्रेमी-प्रेमिकाओं को ही अपना टिकट देकर उम्मीदवार बनाएं। हम अपनी पाठशाला में उसी को दाखिला देंगे, जो कच्चे प्रेमी-प्रेमिका होंगे। हम उन्हें संवार-निखारकर ‘स्किल्ड’ बनाएंगे।’ इसके बाद लव गुरु कुछ कहते, इससे पहले ही बीच में लव गुरुआइन टपक पड़ीं, ‘प्रेम में प्रवीण बनाने के लिए विद्यार्थियों को कुछ खास पाठ भी पढ़ाए जाएंगे। इसके लिए देश-विदेश से कुछ एक्सपर्ट भी बुलाए गए हैं। वे विद्यार्थियों को ‘कुशल प्रेमी’ बनने के कुछ खास टिप्स भी देंगे। ‘जूली-मटुक प्रेम कला निकेतन’ में आगामी वर्षों में प्रेम विषय में स्नातक और स्नातकोत्तर कोर्सेज शुरू किए जाएंगे।’

‘यूजीसी, केंद्र या राज्य सरकार आपके इस निकेतन और कोर्सेज को मान्यता देगी?’ मैंने अगला सवाल दाग दिया। लव गुरु ने कहा, ‘कबीरदास जी गए थे किसी से मान्यता मांगने। अरे सरकार नहीं देगी मान्यता, तो न दे। हमें किसी सरकारी मान्यता की दरकार नहीं है। हमारी प्रेम की पाठशाला चलेगी और जरूर चलेगी। हमें इस देश के प्रेमीजन मान्यता देंगे, गांव-गांव अपने साजन को टेरती, खोजती सजनियां देंगी हमें मान्यता। हमें किसी अन्य मान्यता की तब जरूरत ही क्या रहेगी।’ मैंने लव गुरु से कहा, ‘आप दो सीटें अपनी पाठशाला में मेरे कहने पर सुरक्षित रखिएगा, एक मेरे लिए, एक मेरी छबीली के लिए। हम दोनों आपकी पाठशाला में पढ़ने जरूर आएंगे।’ लव गुरुआइन ने तपाक से कहा, ‘तुम्हें दाखिला नहीं मिल सकता है, तुम किसी भी तरह प्रेमी नहीं लगते हो।’ लव गुरुआइन की बात सुनकर मैं झट से उनके पैरों पर गिर पड़ा, ‘नहीं मुझे दाखिला दे दीजिए। नहीं...मुझे दाखिला दे दीजिए।’ यह जोर-जोर से चिल्लाते-चिल्लाते मेरी देह पसीने से लथपथ हो उठी। मेरी बीवी ने मुझे रजाई ओढ़ाने के बाद थपथपाते हुए कहा, ‘कोई बुरा सपना देखा है क्या? सो जाइए, अभी रात बहुत बाकी है।’ मैं रजाई में दुबक कर सो गया।

Monday, November 26, 2012

राजनीतिक कुएं में भांग


-अशोक मिश्र
सुबह बरामदे में बैठा निठल्ला चिंतन (माफ कीजिए, निठल्लों पर चिंतन) कर ही रहा था कि छबीली ने आकर शांति भंग की। ‘यहां बैठकर आस-पड़ोस की महिलाओं को घूरने की बजाय बेटी को कभी-कभार पढ़ा दिया कीजिए। अब आपकी उम्र महिलाओं या लड़कियों को घूरने की नहीं रही।’ छबीली की बात सुनकर मैं भड़क गया, ‘उम्र की बात तो करो मत। हमारे देश में बहुत पुरानी कहावत है ‘साठा, तब पाठा।’ अभी तो मेरी उम्र मात्र बयालिस साल तीन महीने तेरह दिन की है।’ छबीली ने मुस्कुराकर कहा, ‘अपनी उम्र का सिजरा देने की बजाय बेटी का होमवर्क करा दीजिए, आपकी हम मां-बेटी पर बहुत बड़ी मेहरबानी होगी।’ मैंने सोचा कि सुबह-सुबह कौन इससे बेकार की चोंच लड़ाए। इससे बेहतर है कि बेटी को ही पढ़ा दूं। यह अभी शुरू हो जाएगी, तो फिर नान स्टाप बोलती जाएगी। कई गड़े मुर्दे उखाड़ेगी, जो जो अपनी सेहत के लिए भी अच्छा नहीं होगा। यह सोचकर मैं उठने ही वाला था कि तभी बेटी उस कमरे में आ गई। उसने मुझसे पूछा, ‘पापा! स्कूल का होमवर्क कंप्लीट करने में आपकी मदद चाहिए। हिंदी की मैम ने ‘कुएं में भांग पड़ना’ मुहावरे का उदाहरण सहित व्याख्या करके लाने को कहा है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या लिखूं। जहां तक मैं समझती हूं, जब भूल से किसी कुएं में कोई नशेड़ी पिसी हुई भांग गिरा देता है, तो उसे कुएं में भांग पड़ना कहते हैं।’
बेटी की बात सुनकर मैंने अपना माथा पीट लिया। मैंने झल्लाते हुए कहा, ‘बेटी, मैं तो देख रहा हूं, इस घर के कुएं में ही भांग पड़ी हुई है। वैसे कुएं में भांग पड़ना का अर्थ यह है कि जब किसी क्षेत्र विशेष के लोग उल्टी-सीधी हरकतें करने लगें, तो कहा जाता है कि कुएं में भांग पड़ गई है।’ मैंने उसे विस्तार से समझाने की दृष्टि से कहा, ‘अब जैसे अपनी भारतीय राजनीति को लो। इन दिनों नेताओं की हरकतें और उनके ओछे बयान को देखकर तो लगता है कि राजनीति के कुएं में भांग पड़ गई है। जिसकी जो मर्जी में आ रहा है, वही अनाप-शनाप बक रहा है। अब गडकरी को ही लो, उन्हें क्या जरूरत थी किसी के फटे में टांग अड़ाने की। अरे! आईक्यू की समानता समझाने के लिए कोई दूसरा उदाहरण नहीं सूझा था। लगे स्वामी विवेकानंद और दाउद इब्राहिम के बीच समानता दिखलाने। जेठमलानी जी तो उनके भी चचा निकले। गडकरी की बात पर हो-हल्ला मचा, तो जेठमलानी जी ताल ठोंककर आ गए मैदान में और लगे गडकरी की ‘हत्तेरे-धत्तेरे की’ करने। फिर बोले, राम बुरे पति थे, लक्ष्मण तो एकदम निकम्मे और काहिल थे। सीताहरण के बाद जब सीता को खोजने की बात चली, तो वे हीला-हवाली करने लगे। (यह बात लिखने के लिए भाजपाई और विहिप वाले माफ करेंगे। बात आई है, तो यह लिखना पड़ रहा है।)’
इतना कहकर मैं सांस लेने के लिए रुका। बेटी बड़े गौर से मेरी बात सुन रही थी। मैंने बात को विस्तार दिया, ‘कुएं में भांग पड़ने का उदाहरण यह कोई पहला नहीं है। भारतीय राजनीति में एक मोदी जी हैं, खुद तो शादी की, चार दिन बीवी के साथ और बाद में उनका हिंदुत्व जागा, तो पत्नी को छोड़कर चले आए। कहने का मतलब यह है कि मोदी जी को ‘गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज’ है। अपनी बीवी को निरपराध त्याग देने वाले मोदी को तब कष्ट होता है, जब कोई अपनी बीवी या गर्लफ्रेंड से टूटकर प्यार करता है। शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के प्यार को देखकर एक दिन मोदी को ताव आया और वे पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड का फतवा जारी कर बैठे। अब बेचारे मोदी की बोलती बंद है। जलता कोयला जो जीभ पर रख बैठे थे।’ बेटी अब भी बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रही थी। मुझे अपने हिंदी ज्ञान पर कुछ गर्व सा महसूस हुआ। मैंने शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन ऊंची करते हुए कहा, ‘बेटी! अब तुम्हें क्या-क्या बताऊं। अपने प्रदेश के मुखिया के पिता जी तो सबके बाप निकले। वे कहते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि जब महिलाएं संसद में पहुंचेंगी, तो लोग सीटियां बजाएंगे। महिला आरक्षण से परकटी (महिलाएं माफ करें) यानी पढ़ी-लिखी महिलाओं और लड़कियों को ही फायदा होगा।’ यह सुनकर मेरी बेटी अपने कमरे में होमवर्क पूरा करने लगी। अगले दिन जानते हैं, मेरी बेटी ने क्या कहा, ‘आप अच्छे पापा नहीं हैं। आपने जो अर्थ और उदाहरण बताया, मैंने वही लिखा और पूरे दिन मैम और सहेलियां मेरा मजाक उड़ाती रहीं।’

Saturday, November 3, 2012

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना


-अशोक मिश्र
बचपन में छठवीं-सातवीं कक्षा में हिंदी के मास्टर मटुकनाथ जब ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ कहावत का अर्थ पूछते थे, तो मैं हमेशा गड़बड़ा क्या जाता था, पिट जाता था। कक्षा में इसका अर्थ न बता पाने वाले छात्र-छात्राओं को ठोक-पीट चुकने के बाद मास्टर मटुकनाथ कई-कई बार इसका अर्थ बताते, उदाहरण देकर समझाते, लेकिन अपने पल्ले में नहीं पड़ना था, तो नहीं पड़ा। इस कहावत का अर्थ मुझे सैफीना की शादी के बाद कहीं जाकर समझ में आया। अब तो कोई मुझसे पूछे, तो मैं उदाहरण सहित समझा सकता हूं।
वाकई, इसे कहते हैं, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। शादी पटौदी खानदान के लख्ते जिगर ‘छोटे नवाब’ और करीना कपूर की हो रही थी, हाय-हाय मीडिया और सोशल मीडिया कर रहा था। अखबारों और टीवी चैनलों में तो सबसे पहले और एक्सक्लूसिव खबर और फोटो छापने-दिखाने की एक अंधी दौड़ मची हुई थी। सैफ अली खान और करीना ने शादी से पहले और बाद में मीडिया को कोई भाव नहीं दिया, लेकिन अखबारों ने ‘सौ-सौ जूते खाओ, तमाशा घुसकर देखो’ की तर्ज पर अपने रिपोर्ट्स और फोटोग्राफर्स तैनात कर रखे थे। वे सभी किसी मिशन की तरह हर उस जगह खबर सूंघते फिर रहे थे, जहां उन्हें कोई खबर या क्लू मिलने की थोड़ी-सी भी उम्मीद थी। अखबारों और टीवी चैनलों के ये जुझारू सिपाही इस आशा में इधर-उधर भागते फिर रहे थे कि क्या पता, कोई एक्सक्लूसिव फोटो या खबर मिल जाए, जिसे ‘लंतरानी’ वाली स्टाइल में पेश करके युवाओं के दिलों की धड़कन बढ़ाई जा सके।
इस मामले में सोशल मीडिया कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखा। फेसबुक और ट्विटर पर तो पिछले एक महीने से सिर्फ और सिर्फ एक ही मुद्दा छाया हुआ है। कोई एक ट्वीट करता था, ‘करीना, शादी के समय जोधपुरी चप्पल के साथ-साथ कश्मीरी मोजा पहनेंगी।’ बस, इस ट्वीट पर कमेंट्स की होड़ लग जाती थी। दिल्ली के एक आदमी ने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘निकाह कुबूल होते ही करीना चाट खाएंगी, पाव-बड़े खाएंगी या सिर्फ पानी पीकर काम चलाएंगी।’ इस पोस्ट पर ढेर सारे कमेंट आए। ज्यादातर लड़कों के। इतने सारे कमेंट्स देखकर तो ऐसा लग रहा था कि हिंदुस्तान के युवाओं के लिए गरीबी, बेकारी, भुखमरी और भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा करीना-सैफ की शादी थी। एक साहब ने कमेंट किया था, ‘तुम सबसे बड़े बेवकूफ हो, न वह चाट खाएंगी, न पानी पिएंगी। बिरयानी खाकर अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करेंगी।’ कई बार तो ऐसे-ऐसे कमेंट आते थे कि पढ़कर मन होता था कि अपना सिर सामने की दीवार पर दे मारूं। तब तक फेसबुक पर एक नई पोस्ट आ गई, ‘करीना कपूर शादी के बाद अपने नाम के साथ खान जोड़ेंगी या कपूर ही रहने देंगी, या फिर कपूर और खान दोनों को जोड़कर काम चलाएंगी।’ इसके साथ ही करीना की किसी फिल्म की तस्वीर में नत्थी कर दी जाती थी। इसको लेकर फिर शुरू हो जाती थी, लाइक करने, कमेंट करने-करवाने और शेयर करने की एक अंतहीन प्रतियोगिता। ‘करीना लवर्स क्लब’ नाम से फेसबुक एकाउंट खोलने वाले एक शख्स ने कमेंट पोस्ट किया, ‘करीना चाहे अपने नाम के साथ कपूर लिखे या खान, तेरे बाप का क्या जाता है?’
ठीक शादी की रात लगभग रात एक बजे मेरे एक लंगोटिया यार ‘मिस्टर घोंचूराम’ ने मुझे फोन किया। झुंझलाते हुए मैंने कटखने अंदाज में पूछा, ‘क्या है? अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही है, तो कम से कम दूसरों को तो सोने दो?’ उन्होंने रुआंसे स्वर में पूछा, ‘यार! यह बताओ, शादी हो गई?’ मैंने पूछा, ‘किसकी?’ उन्होंने कहा, ‘करीना की और किसकी? आज किसी और हीरोइन की शादी होने वाली थी?’ ‘हां! मेरे बाबा की है न आज! बाबा और दादी के फेरे हो रहे हैं, मैं पंडाल में खड़ा खाना खा रहा हूं। तू भी आ जा, साथ मिलकर खाते हैं।’ इतना कहकर मैंने अपने मोबाइल का स्विच आॅफ कर दिया। तीन दिन तक मोबाइल को आॅन करने की हिम्मत नहीं हुई। आपके साथ भी ऐसा हुआ हो, तो बताइएगा।

प्रधानमंत्री जी! कुछ तो बोलिए


-अशोक मिश्र
आदरणीय प्रधानमंत्री जी, सतश्री अकाल। पिछले काफी दिनों से द्विविधा में था। कई बार सोचा कि आपको पत्र लिखूं। सोचता था कि जब आपको अपने ही मंत्रियों के स्याह-सफेद कारनामे पर निगाह डालने और अपने दागी मंत्रियों को बदलने की फुरसत नहीं है, तो मेरे जैसे आम आदमी के आम खत की क्या बिसात है। लेकिन जब आपने ‘सब कुछ बदल डालूंगा’ की गर्जना करके मामूली फेरबदल किया, तो मैंने आपको पत्र लिखने की हिम्मत जुटा ली। प्रधानमंत्री जी, आपकी तस्वीर चैनलों या समाचार पत्र-पत्रिकाओं में जब भी छपी देखता हूं, तो मुझे किसी कवि की नौकरशाहों पर लिखी एक कविता की कुछ पंक्तियां याद आ जाती हैं, ‘आप अफसर हैं, बड़ी खुशी की बात/आप अफसर हैं बड़ी खुशी की बात/आपके चश्मे से सोचा था कम देखते हैं/आप सुनते भी नहीं, बड़ी खुशी की बात।’ उस्ताद मुजरिम बताते हैं कि आप राजनीति में आने से पहले सचमुच बहुत बड़े अफसर रहे हैं। राजनीति में आने के बाद आपने देखना और सुनना ही नहीं, बल्कि बोलना तक छोड़ दिया है। सच बताऊं, प्रधानमंत्री जी! मैं आपकी इसी खूबी का मुरीद हूं। आपकी एक चुप्पी, सवालों की आबरू जो रखती है। यह मंत्र वाकई काफी कारगर है। इसी मंत्र को जपकर मैं आजकल अपने सिर पर आई बला को टालने में सफल हो रहा हूं।
सर, आपको एक बात बताऊं। जब मैं छोटा था, स्कूल में बोलने के चलते अपनी टीचर और सहपाठियों से पिट जाता था। बड़ा हुआ, तो गली-मोहल्लों के लड़कों और अपने भाइयों से बोलने के चलते ही ठोक दिया जाता था। कई बार तो इतना पीटा गया कि हल्दी पीने की नौबत तक आ गई। खुदा न खास्ता, शादी के बाद भी यही दुर्गुण मेरे पिटने का कारण बना। कई बार घरैतिन से हुई ‘जूतम पैजार’ इस मोड़ तक पहुंची कि हम दोनों एक दूसरे को ‘जूते में दाल’ बांटने लगे। कभी घरैतिन पिटीं, तो कभी मैं। लेकिन अब मैं काफी मजे में हूं। आपकी ही तरह मैंने देखना, सुनना और बोलना छोड़ दिया है। बीवी कहती है, चार किलो आलू लाना, तो मैं यह नहीं पूछता कि इतने आलू का करना क्या है? बीवी अगर कहे कि चलती ट्रेन के आगे कूदकर इस पार से उस पार निकल कर दिखाओ, तो यकीन मानिए कि बीवी की ‘हाय-हाय, किचकिच’ से बेहतर है कि ट्रेन के आगे कूद जाऊं। प्रधानमंत्री जी! अब मैं अपने अनुभव यह समझ सकता हूं कि आपके कम बोलने, सुनने और देखने की शुरुआत घर से ही हुई होगी। आंटी जी (मिसेज प्रधानमंत्री) ने वही स्थितियां पैदा की होंगी, जो आज मेरी पत्नी ने मेरी कर दी है। वो कहा गया है न! खग जाने खग की ही भाषा। तो मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूं।
लेकिन प्रधानमंत्री जी! छोटा मुंह बड़ी बात कहूं। मेरे बोलने, सुनने और देखने की शक्ति का ह्रास होने से सिर्फ मेरा व्यक्तिगत नुकसान है। आप हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। आपके बोलने का मतलब है कि इस देश के सवा सौ करोड़ लोग बोल रहे हैं। आपके सुनने का मतलब है कि किसी बात को पूरा एक जीवंत देश सुन रहा है। आप कोई मामूली आदमी नहीं हैं। आप हमारे देश की आन-बान और शान हैं। लेकिन अफसोस कि आप मूक, बधिर का अभिनय करते-करते सचमुच मूक और बधिर हो गए हैं। यह न तो आपके लिए फायदेमंद है, न ही देश के लिए। आपके न बोलने का ही नतीजा है कि आपके ही मंत्रियों में से कोई कोयला खा कर पेट भर रहा है, तो कोई टूजी स्पेक्ट्रम। कोई ‘आदर्श’ घोटाला कर रहा है, तो कोई थोरियम घोटाला।
आपके कुछ सिपहसालार तो ऐसे-ऐसे कच्चे हैं कि उन्हें घोटाला करना भी नहीं आता है। महज सत्तर-बहत्तर लाख रुपये के लिए अपनी इज्जत दांव पर लगाते फिर रहे हैं। कई बार मीडिया में जो खबरें आईं, उससे लगा कि आप सब बदल डालेंगे, लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। आपने हाथ पैर धोकर कह दिया कि पूरा चेहरा धुल गया है। चेहरा ऐसे थोड़े न धुला करता है। बदलना है, तो सब कुछ बदल डालिए। यह क्या कि आपने कुछ प्यादे बदल दिए और कहा कि बदलाव हो गया। अरे जनाब! राजा और वजीर तो वही पुराने वाले हैं। ऐसे में लोग आपको ललकार रहे हैं। आपको कमजोर, डमी पीएम और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं। आपकी शान में गुस्ताखियां कर रहे हैं, इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि आप अपनी जड़ता तोड़िए। बोलिए, कुछ तो बोलिए। आपका ही-उस्ताद गुनहगार।

Tuesday, October 16, 2012

‘करसी’ चली गई


-अशोक मिश्र
आप लोगों को एक मजेदार वाकया सुनाऊं। बात उन दिनों की है, जब नया-नया जवान हुआ था। कविताओं से समाज में क्रांति लाने का जज्बा मन में हिलोरें मार रहा था। उन्हीं दिनों नया-नया मार्क्सवादी भी हुआ था। कवि गोष्ठियों में जिन कविताओं में जरा-सा भी शृंगार रस या छायावादी काव्य की झलक मिलती, झट से फरमान जारी कर देता था, ‘अरे यार! यह कवि है या सामंतीवादी टट्टू।’ समंदर की लहरों की तरह ठाठें मारता जोश किसी से भी भिड़ने को तैयार रहता था। मैंने बहस और अंतहीन विवादों से अपना नाता इस तरह जोड़ रखा था, जैसे आंसू और विरह का आपसी रिश्ता होता है। लखनऊ में कोई भी साहित्यिक गोष्ठी हो, अपनी क्रांतिकारी कविताओं और विचारों के साथ मैं हाजिर। इस पुनीत कार्य को संपादित करने के लिए बीस-बाइस किमी तक साइकिल चलाता था। उन दिनों गजल लिखने का नया-नया शौक भी पाला था।

मेरे क्रांतिकारी विचारों और फरमानों का नतीजा यह हुआ कि कवि गोष्ठियों में जैसे ही मैं अपनी गजलें पढ़ता, कुछ मठाधीश टाइप के शायर तुरंत सुना देते, ‘बेटे! तुम्हारी गजलें ‘बहर’ से खारिज हैं, ‘काफिया’ भी दुरुस्त नहीं है, ‘रदीफ’ में सख्ता है।’ दूसरों को अपने फरमान से परेशान करने वाला मैं अब खुद परेशान रहने लगा, कि सारी रात उल्लुओं की तरह जागकर तुक और छंद भिड़ाने के बावजूद ये कमबख्त बहर, काफिया और रदीफ क्यों नहीं काबू आ रहे हैं। इसका जवाब सूझा कि मैं भी इन उर्दूदां लोगों की तरह उर्दू सीखूं और उर्दू अदब का कायदा भी। सो, मैं एक मौलवी जी के सान्निध्य में इस काम में युद्ध स्तर पर जुट गया। कुछ दिनों बाद हिज्जे मिला-मिलाकर उर्दू पढ़ लेने लगा। पारंगत होने के लिए ‘कौमी आवाज’ अखबार भी घर पर मंगाने लगा। एक दिन अखबार में एक शे’र पढ़ा, ‘करने चला सुधार तो करसी चली गई।’ मैं यहां ‘करसी’ शब्द का अर्थ नहीं समझ पाया, तो मैंने लखनऊ के एक मशहूर शायर ‘गाफ नून’ साहब से इसका अर्थ पूछा। उन्होंने समझाया, ‘यह एक क्रांतिकारी गजल है। आपने रामधारी सिंह दिनकर का महाकाव्य उर्वशी पढ़ा है न! उर्वशी का अर्थ ‘उर-वशी’ यानी दिल में बसने वाली भी है। इस शे’र में करसी शब्द भी ‘कर-सी’ यानी कर (टैक्स) की तरह के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ यह है कि जब शायर ने अपने आस-पास गरीबों को आर्थिक स्थिति सुधारने के गुर बताए, तो उनकी गरीबी और परेशानियां धीरे-धीरे ठीक वैसे ही खत्म हो गईं, जैसे जनता से धीरे-धीरे सरकार ‘कर’ (टैक्स) के रूप में पैसा खींच लेती है।’

चचा ‘गाफ नून’ के उत्तर से मुझे संतोष नहीं मिला, तो मैंने अपने अजीज मित्र शायर ‘बतकूचन बेढंगी’ से इस पंक्ति का अर्थ पूछा। वे यह शे’र सुनते ही उछल पड़े। उन्होंने शायर को दाद देते हुए कहा, ‘वाह...वाह! क्या उम्दा गजल कही है गजलगो ने। दरअसल, यह कबीरदास के रहस्यवादी और महादेवी वर्मा के छायावादी काव्य परंपरा का मिश्रित शे’र है। मियां! मेरा ख्याल है कि इस पंक्ति में आगे-पीछे कुछ शब्द गायब हैं। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं, पंक्ति कुछ इस प्रकार है, ‘निकाह करने चला सुधार, तो करसी चली गई।’ कहीं किसी गांव में ‘सुधार’ और ‘करसी’ नाम के आशिक-माशूका रहते थे। उनका इश्क जब गली-कूंचे में चर्चित होने लगा, तो माशूका के घरवालों ने ‘करसी’ पर तमाम तरह की बंदिशें लगानी शुरू कर दीं। एक दिन दोनों ने घर से भागकर निकाह करने का मनसूबा बनाया। दोनों नियत समय पर भागकर आशिक के एक दोस्त के घर पहुंचे। उसके बाद दूसरे दिन उनके दोस्त ने उन्हें काजी साहब के सामने निकाह के लिए पेश किया। निकाह हो पाता, इससे पहले घटनास्थल पर माशूका का चाचा आ धमका। डर के मारे माशूका करसी वहां से भाग गई।’
इतना कहकर ‘बतकूचन बेढंगी’ ने जिराफ की तरह गर्व से अपनी गर्दन उठाई, इधर-उधर देखा और चलते बने। मैं शायर ‘बतकूचन बेढंगी’ की व्याख्या से भी संतुष्ट नहीं था। काफी दिनों तक परेशान होकर इसका संभावित अर्थ खोजता रहा, मगजमारी करता रहा। ...लेकिन एक दिन, कुछ सोचते-सोचते मैं अचानक उछल पड़ा। इस पंक्ति का अर्थ मेरी समझ में आ गया था। दरअसल, यह मेरी कमअक्ली ही थी कि मैं उर्दू का बेसिक फंडा ही भूल गया था। उर्दू सिखाते समय मौलवी साहब ने बताया था कि उर्दू में लिखते समय कुछ मात्राएं लगाने का चलन नहीं है। जैसे उ, इ आदि की मात्राएं। यह बात समझ में आते ही शेर कुछ इस तरह बना, ‘करने चला सुधार, तो कुरसी चली गई।’

Sunday, October 14, 2012

‘मदरचेंज’ शॉपिंग मॉल


-अशोक मिश्र

नथईपुरवा गांव में रामभूल काका ने अपनी दस वर्षीय बेटी सुतंतरता (स्वतंत्रता) की पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहा, ‘तू मेरी जान मत खा, अपनी अम्मा के पास जाकर मर।’ मैंने बुक्का फाड़कर रोती सुतंतरता को पलभर निहारा। उसकी आंख, नाक और मुंह से गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी बहकर ठुड्ढ़ी पर संगम जैसा कोलाज रच रही थी। मैंने रामभूल काका से उलाहने के स्वर में कहा,‘क्या काका! आप भी इस छोटी-सी बिटिया पर अपना क्रोध उतार रहे हैं। यह क्यों रो रही है?’

काका ने अंगोछे से अपना पसीना पोंछते हुए कहा, ‘क्या बताएं बेटा! श्यामता बाबू का बेटा गॉटर अभी थोड़ी देर पहले एक चमकीली पन्नी में लिए कुछ खा रहा था। अच्छा-सा उसका नाम है..खाते समय जो ‘कुर्र..कुर्र’ की आवाज करता है।’ मैंने कहा, ‘कुरकुरे...।’ काका रामभूल ने कहा, ‘हां बेटा! वही...अब ई अंगरेजी नाम तुमही लोग जानो। तो गॉटर को कुरकुरे खाते देख सुतंतरता ने जिद पकड़ ली कि मुझे भी कुरकुरे चाहिए। मैंने इस सुतंतरिया से कहा कि अपनी अम्मा से दो रुपये लेकर माता बदल पंसारी की दुकान से कंपट या टाफी ले लो, लेकिन इसे भवानी उठा ले जाए, यह अइलहवा मोड़ पर खुली ऊ चमक-दमक वाली दुकान से ‘कुर्रकुर्रे’ लेने की जिद सुबह से पकड़े हुए है।’ रामभूल काका की बात में गुस्सा, बेबसी और बेटी को पीटने का अपराधबोध एक साथ झलक रहा था। वे बोले, ‘बेटा! दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद कहीं जाकर सौ-सवा सौ रुपये मजदूरी मिलती है। अब अगर रोज-रोज सुतंतरता दस-बीस रुपये की यह आलतू-फालतू चीजें खरीदने की जिद करेगी, तो गुस्सा आएगा ही। गांव में यह अच्छी बला खोल दी है नासपीटों ने। जब से यह अंगरेजी दुकान खुली है, गांव के लड़के-लड़कियां बिगाड़ रही हैं।’

रामभूल काका की बात सुनते ही मुझे याद आया कि अइलहवा मोड़ पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अपना शॉपिंग मॉल अभी दो महीने पहले ही खोला है। छह महीने पहले जब मैं गांव आया था, तब यह शॉपिंग मॉल बन रहा था। उस समय शॉपिंग मॉल की बन रही इमारत को देखकर गांव के ही एक स्नातक बेरोजगार से मैंने पूछा था, ‘रंगनाथ भाई! यहां कोई सिनेमा हॉल बन रहा है क्या?’ गहरी सांस लेते हुए रंगनाथ ने कहा था, ‘नहीं भइया! यहां एक शॉपिंग मॉल खोला जाएगा।’ रंगनाथ की बात सुनकर मैं अवाक रह गया। रंगनाथ अपनी रौ में बोले जा रहा था, ‘भइया! आप तो जानते ही हैं, नथईपुरवा में पिछली चार पीढ़ियों से माता बदल पंसारी की दुकान चल रही है। गांव के लोग हल्दी, धनिया, गुड़, साबुन जैसी चीजों पीढ़ियों से माता बदल की दुकान से ही खरीदते आ रहे हैं। पैसा हुआ तो भी, नहीं हुआ तो भी। सुख हो, दुख हो, माता बदल पंसारी ने कभी उधार देने से किसी को मना नहीं किया। लोग सामान उधार लेते रहते हैं और जब अनाज पैदा होता है, तो चुकता कर देते हैं। लेकिन अब लगता है कि माता बदल पंसारी के बुरे दिन आ गए। सुना है, इस मॉल में सुई-धागे से लेकर हवाई जहाज, नमक-मिर्च से लेकर विदेशी कपड़े तक बिका करेंगे। सदियों से गांव में अपनी दुकान चला रहे माता बदल पंसारी की भट्ठी बुझाने और लोगों को लुभाने के लिए इस शॉपिंग मॉल का नाम जानते हो क्या रखा गया है...मदरचेंज शॉपिंग मॉल।’

रंगनाथ को उदास देखकर मैंन ढांढस बंधाते हुए कहा था, ‘रंगनाथ भाई! ये कंपनियां चाहे जो कुछ बेचें, लेकिन ये कंपनियां माता बदल पंसारी की तरह सौदा खरीदने गए बच्चों को ‘घातू’ (सौदा खरीदने गए बच्चों को दुकानदार की तरफ से दिया जाने वाला एक कंपट, भेली का एक टुकड़ा या एक बिस्कुट) तो नहीं देंगी न! तुम देखना, गांव के बच्चे घातू की लालच में इन कंपनियों की बड़ी-बड़ी दुकानों की ओर मुंह नहीं करेंगी। उन्हें घातू खाने की आदत जो पड़ गई है।’ लेकिन आज सुतंतरता को पिटने के बाद भी कुरकुरे खाने की जिद पर अड़ा देखकर मुझे लगा कि शायद मैं गलत सोच रहा था। मैंने रोती सुतंतरता को दस रुपये का नोट पकड़ाया और आगे बढ़ गया।

जुलाहे से लट्ठम लट्ठा


-अशोक मिश्र

लाला लक्ष्मी दयाल इंटर कालेज में दसवीं कक्षा की हिंदी विषय की अर्धवार्षिक परीक्षा में एक सवाल पूछा गया था, ‘सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम-लट्ठा’ मुहावरे का उदाहरण सहित अर्थ बताओ। इस स्कूल के एक होनहार छात्र ने मुहावरे का अर्थ बताते हुए उदाहरण दिया। भारत के किसी गांव में दो बुजुर्ग गप्प गोष्ठी जमाए बैठे थे। एक बुजुर्ग ने तंबाकू मलकर होठों के नीचे दबाने के बाद पिच्च से जमीन पर थूकते हुए कहा, ‘रामबचन! तुम यह समझो कि केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनने की देर है, बस। इधर वे प्रधानमंत्री बने कि हम लोगों के दुख-दलिद्दर समझो दूर हो गए। गांधी बाबा (महात्मा गांधी) तो सुराज (स्वराज्य) ही लाए थे, ये तो सुराज और क्रांति दोनों ला रहे हैं। एक दवा से काम न चले, तो दूसरी दवा हाजिर है।’

रामबचन ने सिर पर बंधी पकड़ी उतारकर सिर खुजाते हुए कहा, ‘भुलावन भाई! सुराज और क्रांति सब भ्रमजाल हैं। आजादी से पहले गांधी बाबा के सुराज का बड़ा हल्ला था। आजादी तो आई, लेकिन सुराज पता नहीं कैसे रास्ता भटककर अमीरों के घर पहुंच गया और उनके घर की पहरेदारी करने लगा। जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने कहा कि वे देश की गरीब जनता के लिए ‘समाजवाद’ ला रहे हैं। वे पता नहीं कैसा समाजवाद लाए कि गरीबों की दुर्गति हो गई। उनकी बेटी ने जब गद्दी संभाली, तो ‘गरीबी हटाओ’ नारे की ओट में वे गरीबों को ही हटाने लगीं। गरीब-गुरबा त्राहि-त्राहि कर उठे। गरीबों की दुर्दशा देखकर जेपी बाबू बिलबिला उठे। उन्होंने कहा कि अब गरीबी हटाओ से काम नहीं चलेगा, संपूर्ण क्रांति करनी होगी। लेकिन भाग्य फेर देखो, कुछ दिन आंदोलन चलाने के बाद उनकी संपूर्ण क्रांति साबुन के झाग की तरह न जाने कहां बिला गई। इसके बाद बड़े-बड़े दार्शनिक आए, विचारक आए, संत आए, महात्मा आए, निरहू आए, घुरहू आए, लेकिन सब बेकार। कभी नागनाथ प्रधानमंत्री बने, तो कभी सांपनाथ। सबने हमारे दुख-दलिद्दर को दूर करने की बीन बजाई,। हमारा दुख-दलिद्दर तो दूर नहीं हुआ, लेकिन उनकी सात पीढ़ियों का दुख-दलिद्दर जरूर दूर हो गया। सबने कहा कि गरीबी दूर करना हमारी पहली प्राथमिकता है, लेकिन पिछले साठ-पैंसठ साल से दो पीढ़ियां तो इसी भ्रमजाल में जीते-जीते बूढ़ी हो गईं। आज तक न सुराज आया, न संपूर्ण क्रांति हुई। हां, हम सबकी दुर्दशा जरूर हो गई। नोन, तेल, लकड़ी जुटाने में ही पूरी जिंदगी बिला गई।’

‘केजरीवाल अन्ना हजारे के चेले हैं, अन्ना हजारे अपने को गांधी बाबा का चेला कहते हैं। तुम देखना, राम बचन! गुरु गुड़ ही रहेगा, चेला शक्कर हो जाएगा। गांधी और अन्ना का यह चेला अपने गुरुओं से कहीं आगे जाएगा। हमने तो सुना है कि हिमालय पर्वत पर पिछले सौ साल से तपस्या कर रहा कोई योगी आया था, उसने केजरीवाल को कोई सिद्ध मंत्र दिया है जिसका जाप करते ही उसकी पार्टी के सारे उम्मीदवार दूध से धुल जाएंगे। उनके चरित्र पर कोई दाग नहीं रह जाएगा। भ्रष्टाचार की ओर तो वे आंख उठाकर नहीं देखेंगे। एक हफ्ता पहले जंतर-मंतर पर केजरीवाल को देखा नहीं, केंद्र सरकार पर कैसे गरज रहे थे। एकदम सुभाष बाबू की तरह।’ राम भुलावन ने जमीन पर पास रखी लाठी उठाकर पटकते हुए कहा,‘टीवी पर मैंने देखा था, जब वे बोल रहे थे, तो उनके सिर के चारों ओर एक आभा घूमती दिखाई दे रही थी। जैसे संतों-महात्माओं के होती थी पुराने जमाने में।’

‘भुलावन भाई! ये चेला ही तो सारी खुराफात की जड़ हैं। ऊंच-नीच करते खुद हैं और फोकट में बदनाम होते हैं उनके गुरु। तुमने देखा नहीं, गांधी के चेलों ने गांधी को किस तरह बेच दिया, मानो वे घर में फालतू पड़ी रद्दी हों। देखना एक दिन अन्ना के ये चेले अन्ना को भी बेच खाएंगे।’ रामबचन के इतना कहते ही राम भुलावन तमतमाकर उठ खड़े हो गए और लाठी हाथ में ले ली, ‘चोट्टे! तूने मेरे गांधी बाबा को रद्दी कहा। तू अपने आपको समझता क्या है? तेरी सारी मस्ती अभी झाड़ता हूं।’ इतना कहकर रामभुलावन ने रामबचन के सिर पर लाठी दे मारी। सिर से खून बहता देखकर राम बचन हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाए, तो उनके बेटे घर से निकल आए और फिर गांव में दोनों पक्षों में जमकर लाठियां चलीं। कई लोगों के हाथ-पांव टूटे, सिर फूटे और पुलिस ने दोनों तरफ के दस-दस, बारह-बारह लोगों को गिरफ्तार कर लिया।