Saturday, August 22, 2026

जिन्होंने बचपन संवारा, बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर

अशोक मिश्र

हरियाणा आज भी अपने बड़े बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा के लिए देश में विख्यात है। यह प्रदेश तो बड़ों के आदर-सत्कार के लिए जाना जाता था। जहां ताऊ-चाचा के बिना कोई ब्याह नहीं होता था। जहां दादा के हुक्के के धुएं से ही घर की शाम बनती थी। वहीं आज गांवों में भी ताले लगे हुए घरों में अकेले रह रहे बुजुर्ग दिख जाते हैं। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने की घटनाओं को पढ़ सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं, लेकिन अफसोस कि ऐसी घटनाएं अब प्रदेश में एक खामोश सच्चाई बनती जा रही हैं। 

जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन कंधों पर बैठकर मेले देखे, बाजार में घूमने गए, जिन आंखों ने बुखार में रात-रात भर जागकर इंतजार किया, वही हाथ, वही कंधे, वही आंखें आज एक कमरे के कोने में सामान की तरह अकेली छोड़ दी जा रही है। यह सिर्फ  किसी एक परिवार की कहानी नहीं है, यह पूरे समाज की विडंबना है। कहने को तो लोग तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए, लेकिन वही लोग संवेदना की सीढ़ियां उतरते गए हैं, यह कटु सत्य है। प्रदेश में दिनोंदिन नए खुलते वृद्धाश्रम और उनमें बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का सबसे बड़ा कारण एकल परिवार का सपना है जिसे लोगों ने आधुनिकता समझ लिया है। 

हरियाणा में वृद्धाश्रम  अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहे, ग्रामीण इलाकों और जिला मुख्यालयों के आसपास ऐसे आश्रमों की संख्या चुपचाप बढ़ रही है। प्रदेश में पहले घर आंगन होता था जिसमें दादा-दादी कहानियां होते थे, संस्कार होते थे। अब घर एक फ्लैट बन गया है, जहां दो लोगों के बाद तीसरे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है। नौकरी, करियर, बच्चों की पढ़ाई और शहरों की भागदौड़ ने लोगों को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि बुजुर्गों की धीमी चाल उन्हें बोझ लगने लगी है। 

उनकी दवाइयों का समय, उनकी बार-बार की एक ही बात, उनका पुराने जमाने का टोकना-टाकना, यह सब भागदौड़ भरे जीवन के हिसाब से फिट नहीं बैठता है और इसका नतीजा यह होता है कि घर का बुजुर्ग वृद्धाश्रम में नजर आने लगता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में यह बदलाव और भी ज्यादा चुभता है। सोच कर देखें। एक दिन वे लोग भी वहीं खड़े होंगे जिन्होंने अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रम भेजा है। उनके भी घुटने जवाब दे चुके होंगे, आंखें भी धुंधली हो गई होंगी। तब उन्हें क्या चाहिए होगा? 

एक आलीशान कमरा या अपने बच्चों की आहट? जो बीज आज वह बो रहे हैं, वही कल उनकी फसल होगी। इस जटिल समस्या का समाधान कानून नहीं कर सकता है। लोगों के मन में बदलाव लाकर किया जा सकता है। मां-बाप को बोझ नहीं, घर की नींव समझना होगा। जैसे नींव दिखाई नहीं देती पर उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है, वैसे ही बुजुर्ग दिखाई भले कम देते हों, पर उन्हीं के आशीर्वाद पर घर टिका होता है।

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