Saturday, August 22, 2026

प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध जब घर-परिवार और राजपाट त्यागकर मानव कल्याण के लिए घर से निकले, तो उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिस व्यक्ति ने अपनी 29 वर्ष की आयु तक किसी प्रकार के अभाव का अनुभव न किया हो, जिसने कभी कड़ी धूप में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ी हो, उस राजकुमार को जगह-जगह की धूल छाननी पड़ रही थी। 

जिसने अपने जीवन में स्वादिष्ट भोजनों का ही स्वाद चखा हो, उसे केवल एक समय की भिक्षा पर ही अपना गुजारा करना पड़ रहा हो, ऐसी स्थिति काफी दारुण थी। नंगे पैर चलने से पैरों में घाव हो गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए उनका मन विचलित हो रहा था। चलते चलते वह एक झील के पास पहुंचे जिसका जल बड़ा शीतल था। उन्होंने उस झील का पानी पिया। 

तभी उनकी निगाह एक गिलहरी पर पड़ी। वह अपनी पूंछ भिगोकर झील को सुखाने का प्रयास कर रही थी। महात्मा बुद्ध ने उस गिलहरी से बड़े प्रेम से पूछा, प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो? उस गिलहरी ने जवाब दिया कि इस झील ने मेरे बच्चों को निगल लिया है, मैं इसको सुखाकर रहूंगी। बुद्ध ने कहा कि तुम्हारे पूंछ भिगोकर पानी बाहर छिड़कने से झील सूख जाएगी? गिलहरी ने कहा कि मेरे पास समय नहीं है। मैं यह प्रयास करती रहूंगी।

 बुद्ध ने कहा कि इस काम में कितना समय लगेगा, इसका तुम्हें भान है? इसमें तुम्हारा पूरा जीवन बीत जाएगा, लेकिन झील नहीं सूखेगी। गिलहरी ने कहा कि भले ही जीवन बीत जाए, लेकिन मैं यह काम करके ही रहूंगी। अपनी पीड़ा से व्यथित बुद्ध के हृदय तक गिलहरी की बात पहुंची। उन्होंने सोचा कि जब यह छोटी सी गिलहरी जीवन भर प्रयास करके इस विशाल झील को सुखाने को तत्पर है, तो मैं मनुष्य होकर इन कठिनाइयों से भागने की सोच रहा हूं। अब उनका आत्मविश्वास लौट आया था।

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