बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
विशाखा कोशल प्रदेश की राजधानी साकेत(वर्तमान में अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी। उसके माता-पिता पहले मगध में रहते थे। जब वह सात साल की थी, तो महात्मा बुद्ध मगध आए थे, तो वह उनसे मिली थी। बाद में उसके परिजन साकेत आ गए। जब वह सोलह साल की हुई, तो उसका विवाह श्रावस्ती के धनी व्यापारी मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ और वह अपनी ससुराल श्रावस्ती आ गई। उसे मिगारमाता भी कहा जाता है क्योंकि उसने मिगारा को बौद्ध बनने को प्रेरित किया था। तब उसके ससुर ने उसे अपनी माता का दर्जा दिया था।एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध जेतवन पधारे। विशाखा ने अगले दिन बुद्ध के प्रवचन की व्यवस्था की थी। दुर्योग से उसी रात विशाका के पौत्र धीरज का निधन हो गया। पौत्र का दाह संस्कार होने के बाद भी वह रोती रही। जब थोड़ा सा दुख कम हुआ, तो वह उस सभा में जा बैठी जहां बुद्ध लोगों को संबोधित कर रहे थे।
बुद्ध ने देखा कि विशाखा अस्त व्यस्त वस्त्रों में बैठी शोकमग्न है। बुद्ध ने कहा, विशाखे! मध्याह्न हो चला, तूने अपने वस्त्र नहीं बदले। विशाखा ने रुदन भरे स्वर में कहा, भगवन! मेरे पौध का निधन हो गया है। बहुत समझाने पर जब उसका रोना बंद नहीं हुआ, तो बुद्ध ने कहा, विशाखे! यदि तुझे तेरा पौत्र मिल जाए तो तुझे खुशी होगी? विशाखा ने कहा, हां, तब मेरी खुशी का पारावार नहीं रहेगा।
बुद्ध ने कहा कि यदि तुझे श्रावस्ती की जनसंख्या जितने पुत्र-पौत्र हो जाएं, तो तुझे अपार खुशी होगी। विशाखा ने कहा, हां, मैं तो बहुत खुश हो जाऊंगी। बुद्ध ने कहा कि तब तो रोज किसी न किसी की मृत्यु होती रहेगी। तू तो रोज इसी तरह व्याकुल रहेगी। सोच, जब तू एक पौत्र के निधन पर इतनी दुखी है, तब क्या होगा? तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है। सेवा में जो सुख है, वह आसक्ति में नहीं है।
विशाखा महात्मा बुद्ध की बात को समझ गई और उसी दिन से सेवा का पंथ अपना लिया।
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