Tuesday, March 4, 2025

हेनरी फोर्ड ने जुनून के चलते पाई सफलता

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अमेरिका के प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड को सस्ती कारों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 को मिशिगैन राज्य में हुआ था। स्वभाव से मेहनती और कुछ कर गुजरने की ललक की वजह से हेनरी फोर्ड ने 16 साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया था और डिट्राइड में चले गए थे। हेनरी ने सिर्फ15 साल की उम्र तक ही स्कूली शिक्षा पाई थी। 

कम पढ़े होने के बावजूद उनमें यांत्रिकी में काफी रुचि थी। कई कारखानों में काम करके इन्होंने मशीनों का ज्ञान प्राप्त किया और फिर 1886 में अपने पिता के पास लौट आए। पिता की 80 एकड़ जमीन पर इन्होंने मशीनों की मरम्मत का कारखाना खोला। चार साल बाद एक बार फिर घर छोड़कर डिट्राइड चले गए और एक इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करना शुरू किया। यहां इन्होंने एक कार बनाई। इसी तरह जीवन चलता रहा। 

सन 1903 में इन्होंने फोर्ड कंपनी की स्थापना की और कार उद्योग में अपने पैर जमाने शुरू कर दिए। कंपनी खोलने के पहले साल फोर्ड ने 1703 गाड़ियां बनाई जो काफी मुनाफे में बिकीं। अगले साल इन्होंने पांच हजार गाड़ियां बेचीं। फोर्ड का सपना था कि मजबूत, छोटी, सस्ती और तेज चलने वाली गाड़ियां बनाई जाए ताकि अधिक से अधिक लोग इन्हें खरीद सकें। उन दिनों इनकी एक गाड़ी की कीमत 825 डालर हुआ करती थी। 

फोर्ड ने अपने कर्मचारियों का वेतन दो गुना करते हुए सस्ती और अच्छी कार बनाने को प्रेरित किया। सन 1913 में इन्होंने असेंबली लाइन तकनीक से गाड़ी बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। अधिक उत्पादन से गाड़ियों की लागत घटी और उसकी कीमत 260 डॉलर रह गई। बाद में फोर्ड कंपनी ने ट्रक और ट्रैक्टर भी बनाना शुरू किया और दुनिया की कार उद्योग को एक नया रूप प्रदान किया।



बेमानी है अब ट्रंप को अपना दोस्त समझना

अशोक मिश्र

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी घोषणाओं से, अपने रवैये से एक बात तो साफ कर दिया है कि वह भविष्य में संकट पड़ने पर किसी भी देश की बिना कुछ लिए दिए धेले भर की मदद करने वाले नहीं हैं। उनके लिए अमेरिका फर्स्ट है। इसके लिए वे वह सब कुछ करेंगे जिससे अमेरिका का भला हो। ठीक बात भी है। अगर किसी देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अपने देश का भला चाहता है, तो इसमें बुरा क्या है? सबको अपने देश से प्यार होता है और अपना और अपने देश का हित सबसे पहले देखता है। ट्रंप की इस बात और रवैये से उन देशों को धक्का लग सकता है, जो अब तक अमेरिका से मदद, ऋण या युद्ध काल में हथियारों की मदद लेते रहे हैं। नाटो संधि की वजह से अपने दुश्मन को अमेरिका का दुश्मन मानते रहे हैं। ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद सब कुछ बदल गया है। दुनिया में अब एक नए सिरे से खेमे बंदी शुरू हो गई है। ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने से पहले जो अमेरिका रूस का प्रतिद्वंद्वी हुआ करता था, वह अब दोस्त होने जा रहा है। चीन के खिलाफ कसता शिकंजा अब बहुत हद तक ढीला हो चुका है। बाइडेन काल में जो अमेरिका चीन के खिलाफ ताइवान की हर संभव मदद करने को तैयार था, वहीं अब ट्रंप का आरोप है कि ताइवान की चिप इंडस्ट्री अमेरिका को नुकसान पहुंचा रही है। ताइवान के लिए अब चीन से टकराहट नहीं मोल लेने वाले हैं ट्रंप।

ट्रंप को अपना हितैषी, दोस्त या पक्षधर समझने वाले लोगों और देशों के लिए एक साफ संदेश है कि ट्रंप सिर्फअपने अलावा किसी के नहीं हैं। जेनेटिक आधार पर कहा जाता है कि अमेरिका और यूरोपवासियों का डीएनए एक है। यदि समाज शास्त्र की भाषा में कहा जाए तो ट्रंप के साथ-साथ अमेरिका के गोरे लोग यूरोप के गोरे लोगों के रक्त संबंधी हैं। लेकिन जब ट्रंप यूरोपीय देशों के नहीं हुए, तो क्या वह भारत, चीन, पाकिस्तान, रूस, जापान के हो पाएंगे? कतई नहीं। अपने दूसरे शासनकाल की शुरुआत में ही ट्रंप ने पूरी दुनिया का समीकरण ही बदल दिया है। नतीजा यह हो रहा है कि कल तक जो दुश्मन थे, आज वह दोस्त हो रहे हैं। दोस्त दुश्मन हो रहे हैं। कल तक ट्रंप को दोस्त कहने वाले पीएम मोदी भी शायद उतने मुक्त भाव से ट्रंप को अपना न कह पाएं। भारत ने वैसे तो अब तक बड़े संतुलित तरीके से वैश्विक मंच पर अपनी बात रखी है, लेकिन यह भारत के लिए भी एक संकेत है कि ट्रंप से पुरानी दोस्ती और साझेदारी भविष्य में काम आने वाली नहीं है। निस्संदेह मोदी और पुतिन के रिश्ते प्रगाढ़ हैं। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अब ट्ंप और पुतिन एक ही पाले में खड़े नजर आ रहे हैं। ट्रंप चीन के प्रति नरम रवैया अपना रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जिस अंदाज में ट्रंप प्रशंसा कर रहे हैं, वह भारत के लिए खटकने वाला है। पाकिस्तान पर चीन का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है। साउथ पोल की ताकतवर देश माना जाने वाला ब्राजील और साउथ अफ्रीका की निकटता चीन के साथ काफी हद तक बढ़ चुकी है। रूस पहले ही चीन से मित्रता कर चुका है।

अगर ट्रंप और पुतिन के चरित्र को समझने की कोशिश की जाए तो दोनों में एक साम्यता जरूर नजर आती है और वह उन्नीसवीं सदी के साम्राज्यवादी शासकों की तरह सोच है। दोनों एक तरह से अधिनायक वादी हैं। पुतिन को अपना विरोध स्वीकार्य नहीं है। उन पर अपनी आलोचना करने वालों को प्रताड़ित करने और हत्या करवा देने के आरोप हैं, तो ट्रंप को भी अपनी किसी बात का विरोध पसंद नहीं है। ट्रंप इन दिनों सिर्फएलन मस्क की बात सुन रहे हैं बाकि उन्हें किसी की बात नहीं सुननी है। बिना किसी की सुने उन्होंने अमेरिका के लाखों लोगों को नौकरी से निकाल दिया। अब भी निकालते जा रहे हैं। दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ भी रूखा व्यवहार कर रहे हैं।




Monday, March 3, 2025

सुंदरता और यौवन नहीं होते चिरस्थायी


बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र

जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कब क्या हो जाए, कोई नहीं कह सकता है। आज जो बच्चा है, कल वह जवान होगा। आज जो जवान है, कल वह अधेड़ और बूढ़ा होगा। अपनी युवावस्था पर इतराने वालों को एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि सुंदरता और यौवन चिरस्थायी नहीं होते हैं। सुंदर से सुंदर व्यक्ति जब बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंचता है, तब उसका चेहरा और शरीर सुंदर नहीं रह जाता है। 

ऐसी स्थिति में अपनी सुंदरता और यौवन पर इतराने वालों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं है। 

शहर के बाजार में एक भिखारी बैठकर भिक्षा मांगता था। वह इतना कमजोर हो चुका था कि उसके शरीर की एक-एक हड्डी साफ दिखाई देती थी। उसे देखकर उधर से गुजरने वाले एक युवक के मन में घृणा और दया के भाव एक साथ उभरते थे। 

एक दिन उस युवक ने उस भिखारी से कह ही दिया कि जब तुम इतने कमजोर हो, चल-फिर नहीं सकते हो, तो जीने की लालसा क्यों पालते हो? तुम और जीकर क्या करोगे? तुम्हें भीख भी मांगनी पड़ रही है। तुम भगवान से यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें मृत्यु देकर इन कष्टों से मुक्ति दिला दें। 

उसकी बात सुनकर भिखारी ने कहा कि बेटा! तुम्हारी बात सही है। मुझे इस उम्र में यकीनन मर जाना चाहिए। मैं भी ईश्वर से प्रति दिन यही मांगता हूं कि मुझे इस शरीर से मुक्ति दे दें, लेकिन शायद भगवान मुझे और जिंदा रखना चाहते हैं ताकि जो लोग मेरे इस शरीर को देखकर घृणा करते हैं, वे इस बात समझ सकें कि सुख और यौवन स्थायी नहीं होते हैं। बेटा! युवावस्था में मैं भी तुम्हारी तरह सुंदर और हष्ट-पुष्ट था। 

यह सुनकर युवक उस भिखारी की बात समझ गया। वह शर्मिंदा होकर चला गया।

मैंने भी आपकी मातृभाषा का आदर किया

अशोक मिश्र

नरेंद्र दत्त को भले ही कम लोग जानते हों, लेकिन स्वामी विवेकानंद को लगभग भारत में सभी लोग जानते होंगे। विस्तार से भले ही स्वामी विवेकानंद के बारे में कुछ न बता पाएं, लेकिन इतना तो जरूरत जानते हैं कि वह हमारे देश के संत थे और उन्होंने समाज सुधार की दिशा में बहुत काम किया था। 

यही
स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता का उदाहरण है। नरेंद्र दत्त यानी स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में कोलकाता में हुआ था। स्वामी जी के जन्म के एक साल बाद इनके पिता विश्वनाथ दत्त का निधन हो गया था। इसके चलते परिवार को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद स्वामी विवेकानंद ने देश और समाज की उन्नति के लिए प्रयास करना नहीं छोड़ा। 

जब वह 1893 में शिकागो में हो रही धर्म संसद में भाग लेने के लिए अमेरिका गए तो वहां लोगों ने इनका बहुत स्वागत किया। कुछ लोगों ने इनसे अंग्रेजी में सवाल पूछा, तो स्वामी विवेकानंद ने हिंदी में जवाब दिया। अमेरिका में ज्यादातर लोग अंग्रेजी में बातचीत करते हैं। उनकी मातृभाषा भी अंग्रेजी है। 

जब स्वामी विवेकानंद ने अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब हिंदी में दिया, तो लोगों ने समझा कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति ने उनसे हिंदी में पूछा कि आप कैसे हैं? 

स्वामी जी ने कहा कि आई एम फाइन एंड थैंक्यू। 

यह सुनकर सब चकित रह गए। लोगों ने कहा कि आपने अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का हिंदी में जवाब दिया। हिंदी में सवाल किया, तो अंग्रेजी में जवाब दिया। ऐसा क्यों? 

स्वामी जी ने कहा कि आपने अपनी मातृभाषा में बात की, तो मैंने भी अपनी मातृभाषा में जवाब दिया। आपने हमारी भाषा का आदर करते हुए हिंदी में पूछा, तो मैंने भी आपकी भाषा का आदर करते हुए अंग्रेजी में जवाब दिया। स्वामी जी का यह जवाब सुनकर लोग बहुत प्रसन्न हए।

मनुष्य की इच्छा शक्ति से बढ़कर कोई नहीं

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध को गौतम इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनका पालन पोषण उनकी मौसी महा प्रजापति गौतमी ने किया था। बुद्ध यानी सिद्धार्थ के जन्म के साथ दिन बाद उनकी मां महामाया की मृत्यु हो गई थी। महाप्रजापति गौतमी वह पहली महिला थीं जिसने बौद्ध धर्म में भिक्षुणी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया था। 

महात्मा बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में नवजात पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा को छोड़ दिया था और सत्य की खोज में घर से निकल पड़े थे। तथागत दूसरों को तमाम विपदाओं में घिरा देखकर उनकी समस्याओं को दूर करना चाहते थे। एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में प्रवचन दे रहे थे। 

उनके एक शिष्य ने जिज्ञासावश पूछ लिया कि भंते! कोई इस निर्जीव पत्थर पर शासन कर सकता है क्या? 

यह सुनकर बुद्ध मुुस्कुराए और बोले, क्यों? लोहे की हथौड़ी-छेनी से पत्थर को टूटते नहीं देखा है क्या? 

तब शिष्य ने कहा कि तब तो लोहा इस दुनिया में सबसे शक्तिशाली है। 

बुद्ध बोले, लोहे को तो आग जलाकर द्रव्य बना देती है। लोहा सबसे शक्तिशाली कैसे हुआ?

उस शिष्य ने फिर कहा-फिर तो आग से बढ़कर कोई नहीं हो सकता है। 

अब बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आग पर पानी पड़ते ही आग तो तुरंत बुझ जाती है। 

शिष्य अब भी अपनी बात आगे बढ़ाने पर तुला हुआ था, तब पानी निश्चित रूप से सर्वशक्तिमान है।

बुद्ध फिर बोले, पानी को तो हवा सोख लेती है। उसे अपने साथ बहा ले जाती है। 

शिष्य बोला, फिर तो हवा ही सबसे शक्तिशाली है। 

बुद्ध ने कहा कि इनसान अपनी इच्छा शक्ति से उद्यम करके हवा की दिशा बदल देता है। इस संसार में मनुष्य की इच्छा शक्ति से बढ़कर कोई दूसरी शक्ति नहीं है। मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति के बल पर कुछ भी कर सकता है। यह सुनकर उस शिष्य की सारी जिज्ञासाएं शांत हो गई और वह दूसरे काम में लग गया।



Saturday, March 1, 2025

गुलामी से मुक्त हुए हकीम लुकमान


बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र

हकीम लुकमान का जन्म अरब में हुआ था। वह देश कौन सा था, इसके बारे में इतिहासकारों में मतभेद है। नूबिया, सूडान या इथोपिया में से किसी एक देश में पैदा हुए थे हकीम लुकमान, ऐसा भी मानने वाले इतिहासकार हैं। बहरहाल, यूनानी चिकित्सा में लुकमान का काफी नाम था। लुकमान का जिक्र कुरान में भी किया गया है। 

एक कथा के अनुसार, बचपन में वह किसी उमराव के वह गुलाम थे। उन दिनों अरब में गुलाम रखने की प्रथा थी। बाद में उमराव ने लुकमान को गुलामी से मुक्त कर दिया था। इसके बारे में भी एक कहानी कही जाती है। कहते हैं कि एक दिन उमराव ककड़ी खा रहा था जो काफी कड़वी थी। उसने आधी ककड़ी लुकमान को खाने को दी, तो उन्होंने खा ली। उमराव ने पूछा कि तुमने बताया नहीं कि ककड़ी कड़वी थी। 

लुकमान ने कहा कि जब आप रोज स्वादिष्ट भोजन खाने को देते हैं, तो क्या एक दिन में कड़वी ककड़ी नहीं खा सकता? यह सुनकर उमराव प्रसन्न हुआ और उसने लुकमान को गुलामी से मुक्त कर दिया। कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने चिकित्सा विज्ञान की खूब मन लगाकर पढ़ाई की और उन्होंने सभी तरह के रोगों का उपचार खोज लिया। 

यह भी कहा जाता है कि वह भारतीय आयुर्वेद के जनक चरक के समकालीन थे। लुकमान ने अपने एक दूत को चरक के पास संदेश भेजते हुए कहा कि रास्ते में तुम इमली के पेड़ के नीचे ही रात्रि विश्राम करना। जब वह दूत चरक के पास पहुंचा, तो उसके शरीर पर फफोले पड़े हुए थे।

 चरक ने संदेश का कागज देखा, उस पर कुछ नहीं लिखा हुआ था। चरक ने भी एक कागज देते हुए कहा कि तुम रात में नीम के नीचे रुकना। जब दूत लुकमान के पास पहुंचा, तो उसके फफोले ठीक हो गए थे। चरक ने जो कागज भेजा था, वह भी सादा था।



संत की जान के बदले पूरा ईरान ले लो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बारहवीं शताब्दी में फारस के नेशांपुर में प्रसिद्ध सूफी संत फरीदउद्दीन अत्तार का जन्म हुआ था। वैसे उनका नाम अबू हामिद बिन अबू बक्र इब्राहीम था, लेकिन उनको ख्याति फरीदउद्दीन अत्तार के नाम से मिली। अत्तार सूफीवाद के तीन प्रसिद्ध स्तंभों में से एक माने जाते हैं। अत्तार का सबसे  प्रसिद्ध ग्रंथ फारसी भाषा का मसनवी अत्तार माना जाता है। यह भी माना जाता है कि अत्तार अपने जमाने के प्रसिद्ध रसायनज्ञ के बेटे थे। 

उन्होंने शुरुआती दौर में वैद्य का काम किया था, लेकिन बाद में यह पेशा छोड़ दिया था। इनके संबंध में एक रोचक घटना बताई जाती है। बात उन दिनों की है, जब तुर्की और ईरान के बीच युद्ध चल रहा था। काफी दिनों से चल रहे युद्ध का कोई फैसला नहीं हो पा रहा था। 

हालांकि ईरान का पलड़ा युद्ध में भारी था। संयोग से तुर्की से गुजर रहे संत फरीदउद्दीन अत्तार को तुर्कियों ने गिरफ्तार कर लिया। तुर्की के बादशाह ने संत को फांसी की सजा सुनाई। यह सुनकर ईरान में हाहाकार मच गया। संत की सजा सुनकर लोग परेशान हो उठे। एक अमीर आदमी ने तुर्की के सामने प्रस्ताव रखा कि संत का जितना वजन है, उसके बराबर हीरा, मोती या जवाहरात ले लो, लेकिन संत को छोड़ दो। बहुत सारे लोग संत के बदले अपनी जान देने को तैयार थे। लेकिन तुर्की का बादशाह इस पर तैयार नहीं हुआ। 

तब ईरान का बादशाह आगे आया और उसने तुर्की के बादशाह से कहा कि वह ईरान ले ले, लेकिन संत को छोड़ दे। तुर्की के बादशाह को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि एक आदमी के लिए आप पूरा राज्य देने को तैयार हैं। ईरानी बादशाह ने कहा कि राज्य तो आज है, कल नहीं रहेगा, लेकिन यदि संत को फांसी हो गई, तो ईरान हमेशा के लिए कलंकित हो जाएगा। यह सुनकर तुर्की के बादशाह ने संत को रिहा कर दिया।



Friday, February 28, 2025

रूस के नगर सेठ का पाखंड

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र


लियो टालस्टाय रूस से प्रसिद्ध लेखक थे। उन्होंने रूसी जनता के जीवन की सच्ची झांकी अपने लेखन में प्रस्तुत की है। हमारे देश में जिस तरह मुंशी प्रेमचंद को किसानों और गरीबों की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त माना जाता है, ठीक उसी तरह लियो टालस्टाय के लेखन में रूसी जनता के दुख-दर्द झलकते हैं। 

उन्होंने मेरा बचपन और मेरा विश्वविद्यालय नाम से दो आत्मकथाएं लिखी हैं और उसमें जो कुछ और जैसा भोगा है, उसको बड़ी साफगाई से प्रस्तुत किया है। एक बार वे चर्च गए। उन्होंने सोचा कि शांत वातावरण में प्रार्थना सुन सकूंगा और कर भी सकूंगा। उन्होंने वहां जाकर देखा कि एक व्यक्ति ईसा की मूर्ति के आगे सिर झुकाकर प्रार्थना कर रहा है। वह आदमी कह रहा था कि हे भगवान! मैंने काफी अपराध किए हैं। ये अपराध वैसे तो क्षमा के लायक नहीं हैं, लेकिन मुझे माफ कर देना। 

यह व्यक्ति नगर का सबसे धनवान व्यक्ति था। यह सुनकर उन्हें लगा कि यह कितना महान व्यक्ति है, जो अपने गुनाहों को ईसा के आगे स्वीकार कर रहा है। तभी उस व्यक्ति की निगाह टालस्टाय पर पड़ी। उसने पूछा-अभी मैंने जो कहा, उसे आपने सुना क्या? तो टालस्टाय ने कहा कि मैंने पूरा सुना। 

उस व्यक्ति ने कहा कि आपको मेरी बात सुननी नहीं चाहिए थी। लेकिन इस बात का उल्लेख किसी से मत करना क्योंकि यह मेरे और परमेश्वर के बीच की बात थी। दुनिया वालों के लिए यह बात नहीं थी। 

इस पर टालस्टाय ने कहा कि आपके अपराधों की स्वीकारोक्ति सुनकर लगा था कि आप महान व्यक्ति हैं। लेकिन यह बात कहकर आपने बता दिया कि वास्तव में आपको अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है।


मिठाई के जार में रख दिया चूहा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ब्रिटेन के दक्षिण वेल्स के कार्डिफ शहर में 13 सितंबर 1916 को प्रसिद्ध उपन्यासकार और हास्य व्यंग्य लेखक रोआल्ड डाहल का जन्म हुआ था। इनके पिता का परिवार नार्वे से ब्रिटेन आया था। डाहल जब तीन साल के थे, तब इनकी एक बड़ी बहन की सात साल की उम्र में मौत हो गई थी। यह सदमा उनके पिता शायद बर्दाश्त नहीं कर सके और कुछ सप्ताह के बाद उनकी भी मौत हो गई। 

उनके पिता अपने बेटे को खूब पढ़ाना लिखाना चाहते थे, इसलिए अपने पति की इच्छा को पूरी करने के लिए रोआल्ड डाहल का उन्होंने लांडाल्फ शहर के एक स्कूल में भर्ती कराया। यह यहां बहुत ज्यादा दिन नहीं पढ़ सके। बड़े होकर इन्होंने सेना में विंग कमांडर का पद हासिल किया और विश्व युद्ध में भाग लिया। इसी के बाद डाहल ने साहित्य में प्रवेश किया। इन्होंने बाल साहित्य पर बहुत काम किया।

इनकी एक प्रसिद्ध किताब है माटिल्डा। इस पुस्तक के बारे में कहा जाता है कि किताब की घटनाएं इनके जीवन से जुड़ी हैं। यह जब सात साल के थे, तब इन इनका नाम लांडाल्फ के एक स्कूल में लिखाया गया। जिस रास्ते से यह आते जाते थे। उस रास्ते में रंग-बिरंगी मिठाइयों की दुकान पड़ती थी। डाहल और उनके चार साथी रोज उस दुकान पर जाते, मिठाइयों को देखते और घर चले जाते। जब पैसा होता तो खरीद भी लेते थे। 

एक दिन डॉहल ने मिठाई की जार में मरा हुआ चूहा डाल दिया। दुकान की मालकिन शिकायत लेकर स्कूल पहुंची और उसने चौथी, पांचवीं और छठी क्लास के बच्चों में डाहल को पहचान लिया। स्कूल में इनकी पिटाई हुई, तो इनकी मां पीठ पर बेंत के निशान देख लिया। बस, क्या था गुस्साई हुई स्कूल पहुंची और उनका नाम उस स्कूल से कटवा दिया।

Thursday, February 27, 2025

हॉकी खिलाड़ी रूप सिंह को प्रिंसिपल से मिला उपहार

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सेना में मेजर रहे हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद के छोेटे भाई थे कैप्टन रूप सिंह। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 8 सितंबर 1908 में बैंस राजपूत घराने में पैदा हुए रूप सिंह ने हॉकी के मैदान पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया था। उन्होंने 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीते थे। 

उन्होंने लॉस एंजिल्स ग्रीष्मकालीन ओलंपिक 1932 में जापान के खिलाफ तीन गोल और अमेरिका के खिलाफ दस गोल किए थे। उनकी प्रारंभिक पढ़ाई लिखाई ग्वालियर के विक्टोरिया स्कूल में हुई थी। उन दिनों देश पर अंग्रेजों का शासन था। 

अंग्रेजी स्कूलों में भारतीय छात्र-छात्राओं को बहुत मुश्किल से एडमिशन मिलता था। रूप सिंह ने अपनी प्रतिभा के बल पर विक्टोरिया स्कूल में दाखिला पाया था। बात उन दिनों की है, जब वह छठवीं क्लास में पढ़ते थे, तब उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया था। 

पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ वह खेलकूद में भी आगे थे। यही वजह थी कि प्रिंसिपल का वह चहेता बन गए थे। हॉकी बहुत बढ़िया खेलते थे। वह स्कूल में ही प्रैक्टिस किया करते थे। एक दिन स्कूल के बगल में रहने वाला एक आदमी बहुत गुस्से से तमतमाता हुआ स्कूल पहुंचा। उसने प्रिंसिपल से गुस्से में कहा कि तुम्हारे स्कूल के एक छात्र ने इतनी तेजी से हॉकी की बॉल मेरी दीवार पर मारी है कि दीवार चटक गई है। गुस्से से बोलने वाला पड़ोसी भी अंग्रेज ही था। 

प्रिंसिपल समझ गए कि यह काम किसने किया होगा। किसी तरह उन्होंने उस पड़ोसी को समझा-बुझाकर घर भेजा। बाद में उन्होंने रूप सिंह बैंस को बुलाकर एक हॉकी बॉल उनको पुरस्कार के रूप में दी। अपने प्रिंसिपल के प्रोत्साहन की बदौलत एक दिन रूप सिंह ने ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया।