भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर प्राचीनकाल से अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया, इसका कोई आंकड़ा दे पाना कतई संभव नहीं है। पिछले सौ-पचास साल का आंकड़ा यदि हम इकट्ठा कर भी ले, तो यह सच्चाई नहीं बदलने वाली है कि डायन शब्द की उत्पत्ति के पीछे पुरुषवादी सत्ता का हाथ रहा है। जो भी स्त्रियां पुरुषों के अनुकूल नहीं रहीं, उनके लिए ही पुरुषों ने यह शब्द ईजाद किया। डायन मतलब बुरी औरत.. जो पुरुषों का कहा नहीं मानती, जो बच्चों को खा जाती है, जिसकी वजह से देश, गांव, समाज और परिवार पर विपत्ति टूट पड़ती है। मजेदार बात यह है कि पुरुषों ने शब्द डायन गढ़ने के बाद यह खूबसूरत हथियार महिलाओं के ही हाथ में थमा दिया कि लो! जब हमें जरूरत महसूस होगी, हमारे इशारे पर उन स्त्रियों को डायन का खिताब देकर मार दो, जो हमारे इशारे पर चलने से इंकार करती हैं, जो पितृसत्ताक व्यवस्था वा पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ बगावत करती हैं। यह खेल आज भी जारी है। आज इसका कुछ रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे की मानसिकता वही हजारों साल पुरानी है। अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी विवश, लाचार, गरीब, अशिक्षित महिला को डायन बताकर मार दो। अफसोसजनक बात तो यह है कि इस साजिश में अब महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं, यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने को ही किसी न किसी रूप में कमजोर कर रही हैं।
हजारों साल बीत जाने के बावजूद इस देश की महिलाओं को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं दिया गया कि वे जब किसी महिला को डायन बताने के लिए प्रेरित की जाती हैं, तो उसके पीछे कारण क्या रहते हैं? आखिर औरत ही डायन क्यों होती है, पुरुष क्यों नहीं? डायन, चुड़ैल, भूतनी, कुटनी, वेश्या जैसे शब्दों की तलवार महिलाओं को ही रक्तरंजित क्यों करती है? भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस कहकर किसी पुरुष को मार दिया गया हो, ऐसी घटनाएं वर्तमान में तो क्या, अतीत में भी शायद ही देखने को मिले। और यदि एकाध हैं भी, तो उसके दूसरे समाजशास्त्रीय कारण रहे होंगे। कुछ राज्यों में तो औरतों को डायन बताकर मार देने की परंपरा आज भी अबाध गति से जारी है। अगर हम डायन बताकर मारी जाने वाली महिलाओं की आर्थिक दशा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि अब तक ज्ञात सभी घटनाओं में लगभग 28 फीसदी महिलाएं या तो गरीब रही हैं, विधवा रही हैं या फिर तलाकशुदा। डायन बताकर मारी गई कुंवारी लड़कियों की भी आर्थिक दशा ऐसी ही रही होगी। अमीर घरों की महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटना न बराबर है। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि डायन कही जाने वाली औरतों के पीछे उनकी गरीबी, असहायता, शोषण-दोहन और यौन उत्पीडन जैसी प्रवृत्तियां उत्प्रेरक के रूप में काम करती रही है। अब तक जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें कुछ बातें तो कामन हैं, जैसे, संपत्ति विवाद, यौन शोषण, आपसी रंजिश आदि। इन कारणों से एक बात तो समझ में आती है कि कुछ लोग या समुदाय अपने ही नाते-रिश्तेदार महिलाओं को उनकी संपत्ति हड़पने, उनका यौन शोषण करने या फिर जमीन का बंटवारा न करना पड़े, इसके लिए कुछ महिलाओं या पुरुषों को लालच देकर डायन घोषित करके मार देते हैं। यह सदियों से होता चला आ रहा है।
झारखंड में ये समस्या विकराल रूप में है। उड़ीसा, आंध्र प्रदेश भी ऐसी हत्याओं के मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाए। सरकार ने अपनी तरफ से कोशिश की और कर रही है, लेकिन लोगों की मानसिकता में अभी नकारात्मक बातें भरी पड़ी हैं। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना पर विश्वास अब भी कायम हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। इसके बाद भी समाज में कोई खास बदलाव नहीं आया है। राजस्थान सरकार ने डायन प्रथा विरोधी कानून, 2015 पास करके ऐसी हत्याओं पर रोक लगाने की कोशिश की है।
असम में तो पिछले पांच सालों में 70 से अधिक महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में हर साल डायन के नाम पर महिलाओं की बलि ली जा रही है। पुलिस और प्रशासन बहुत दबाव पड़ने और मीडिया में बात उछल जाने पर फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। कुछ लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, बाद में जमानत पर छूटकर चले आते हैं, कई बार तो क्या, ज्यादातर मामलों में आरोपी सुबूत के अभाव में बरी तक हो जाते हैं। इस अभिशाप के खिलाफ आवाज सदियों से नहीं उठती रही है, लेकिन इस अभिशाप के खिलाफ असम ने जो पहल की है, वह बेमिसाल है। असम की ही एक बहादुर महिला 62 वर्षीय बीरूवाला डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रही है। वह अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान इस डायन प्रथा रूपी अभिशाप से बचा चुकी है। अब असम ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में महिलाएं और पुरुष धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे इसके खिलाफ आवाज भी उठाने लगे हैं, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
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