अशोक मिश्र
हरियाणा में अब सवाल यह नहीं है कि लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। असली सवाल यह है कि जिन लोगों को पीने का पानी मिल रहा है, वह पानी पीने लायक है भी या नहीं। नूंह और पलवल के लगभग 103 गांवों में लोगों को निर्धारित मात्रा से चालीस लीटर पानी कम मिल रहा है। कांग्रेस विधायक आफताब अहमद के सवाल का जवाब देते हुए जन स्वास्थ्य अभियंत्रिकी मंत्री रणबीर गंगवा ने बताया कि राज्य के 297 गांवों में प्रति व्यक्ति दैनिक पेयजल उपलब्धता 55 लीटर से कम है।इन गांवों में जो पानी मिल रहा है, उसका टीडीएस यानी पानी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थ कई जगहों पर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसी तरह की स्थिति प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी है। लवल में औसत टीडीएस तीन साल में 74 प्रतिशत बढ़कर 940 से 1,636 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया है और जिले के सभी छह ब्लॉक प्रभावित हैं। नूंह के इंदरी ब्लॉक में टीडीएस लगभग दोगुना होकर 1,002 से 1,974 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया है, जो 2,000 मिलीग्राम प्रति लीटर की उस अंतिम सीमा के बेहद करीब है जिसे भारतीय मानक केवल तभी स्वीकार करते हैं जब कोई वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न हो।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अनुसार प्रदेश के 61.33 प्रतिशत क्षेत्र में भूजल का अति-दोहन हो रहा है। रासायनिक उर्वरकों और औद्योगिक कचरे से भूजल में नाइट्रेट, फ्लोराइड और भारी धातुओं का घुलना है, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रह गया। इस स्थिति के लिए जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी हुई है। लंबे समय से भूजल का अत्यधिक दोहन होता रहा है। कृषि में पानी की अधिक खपत, नहरी पानी की अपर्याप्त उपलब्धता और भूजल पर निर्भरता ने संकट को गहराया। कई क्षेत्रों में भूजल स्वाभाविक रूप से खारा या खनिजों से युक्त है, लेकिन उपचार संयंत्र और नहर आधारित वैकल्पिक स्रोत विकसित करने में पर्याप्त गति नहीं दिखाई गई।
जनस्वास्थ्य विभाग की परियोजनाओं में देरी, रखरखाव की कमी और निगरानी की कमजोरी भी समस्या बढ़ाती है। अवैध कनेक्शन पानी को अंतिम छोर तक पहुंचने से रोकते हैं। जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल का लक्ष्य पूरा होने का दावा किया जाता है, लेकिन पानी की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पाई। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर उनके क्रियान्वयन में अंतर रहा। शासन-प्रशासन को अब ठोस और त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।
हरियाणा के गांवों में पेयजल संकट अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गया है। सरकारी आंकड़े खुद समस्या की गंभीरता स्वीकार करते हैं। अब जरूरी है कि घोषणाओं से आगे बढ़कर प्रभावी क्रियान्वयन हो, ताकि हर घर तक स्वच्छ और पर्याप्त पानी पहुंचे। जल संकट सिर्फ प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़ा मुद्दा है।
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