बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र में एक संत रहते थे वाहिय दारूचीरिथ। उन्होंने अपनी वासना और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। धन संपत्ति का उन्हें मोह ही नहीं था। महाराष्ट्र के पालघर जिले के नालासोपारा को ही प्राचीन काल में सुप्पारक तीर्थ कहा जाता था। साधु वाहिय दारूचीरिथ जहां भी जाते लोग उनके चरणों में अपनी धन, संपत्ति, वस्त्रों और विभिन्न तरह के उपहारों का ढेर लगा देते थे।धीरे धीरे उनमें एक अहंभाव जागने लगा। वृद्ध गुरु को अपने शिष्य के अहंभाव के बारे में जानकारी मिल गई। गुरु ने अपने शिष्य दारूचीरिथ से कहा कि तुमने गौतम बुद्ध का नाम सुना है? दारूचीरिथ ने उत्तर दिया, हां गुरुवर! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। जेतवन में वह परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत मार्ग को सिद्ध कर लिया है। गुरु ने कहा, तब तुम्हें उनके सामीप्य में कुछ दिन बिताने चाहिए।
गुरु की बात मानकर दारूचीरिथ सुप्पारक से जेतवन के लिए चल पड़े। जब वह जेतवन पहुंचे, तो उन्होंने एक भिक्षु से पूछा कि आप लोग बता सकते हैं, तथागत मिलेंगे? उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, भिक्षा के लिए श्रावस्ती गए हैं। तीसरे पहर तक आएंगे। आप विश्राम करें। दारूचीरिथ को आश्चर्य हुआ कि इतने भिक्षुओं के होते हुए बुद्ध को भिक्षा मांगने की जरूरत क्यों पड़ी। वह वहीं पहुंचे जहां भिक्षा के लिए बुद्ध खड़े थे।
दारूचीरिथ ने कहा कि भगवन! आप मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें। बुद्ध ने कहा कि यह उचित समय नहीं है। जब दारूचीरिथ ने कई बार जिद की तो महात्मा बुद्ध ने कहा कि जो एक ही बार में एक ही काम में इतना तल्लीन हो जाए कि दूसरी इंद्रियां भाव ही शेष न रह जाए, तो वह अनासक्त और बंधन मुक्त हो जाता है। अब दारूचीरिथ को अपनी कमियों का भान हुआ। वह बुद्ध को प्रणाम कर जेतवन की ओर लौट पड़े।