Tuesday, May 26, 2026

‘सुबह होती है’

सन 1968 में मास्को में खींची गई मानव जी की तस्वीर

दिवंगत श्री रामेश्वर दत्त मानव

प्रात: उठ दुनिया जगती है।
पक्षी का कलरव होता है
फूलों का उत्सव होता है
भ्रमरों का गुंजन होता है
सब अपने कामों में लगते
मै भी बिकने चल देता हूं
शोषण की तपती भट्टी में
जलने सिकने चल देता हूं
कभी एक दिन को मैं बिकता
कभी एक हफ्ते बिकता हूं
कभी जरा महंगे बिकता हूं
कभी जरा सस्ते बिकता हूं
मै बिकता, मेरी मेहनत बिकती
इज्जत बिकती, अस्मत बिकती
मै क्या मेरी किस्मत बिकती

जी हां हम इंसान नही हैं
जी हां, हम भी चीज हो गये
फिर भी हमें क्रय नहीं करते
हम इतने नाचीज हो गये
एक पहर दिन बीत गया है
लेकिन कोई खरीदार न आया
अच्छा माटी के मोल खरीदोगे
बाबू क्या मुझे खरीदोगे
मैं अपने को बेच रहा हूं
बोलो क्या मुझे खरीदोगे।

जी हां मैं आदम का प्यारा
हब्बा के आंखों का तारा
परमेश्वर के पुत्र लाड़ले
ब्रम्हा का मैं गढ़ा संवारा
दुनिया आज बनी बाजार
चलता तेजी से व्यापार
रुपये से आदान प्रदान
दे दो रुपया लो ईमान

कविता कला नृत्य संगीत
प्रेमी प्रेयसी मन के मीत
नाता रिश्ता जग की रीत
बिना अर्थ के जुड़े न प्रीत
सब कुछ व्यर्थ निर्रथक बात
प्यारे करो अर्थ की बात

सर्वे:गुणा :कंचनमा श्रयन्ति
सुजना: रुदन्ति मूर्खा: हसंति

जिसके सोना उसकी चांदी
वर्ना बस समझो बर्बादी
आज रुपया सबका माप
चाहे हम हों चाहे आप
रुपया हो तो पुण्य खरीद
पापी होकर पुण्य खरीद
ज्ञान, कल्पना, सुख और आशा
बिकता है सब सरे बाजार

अर्थपूर्ण हैं नैन सभी के
अर्थपूर्ण हैं बैन सभी के
अर्थपूर्ण हैं सैन सभी के
अर्थपूर्ण हर एक इशारे
पहुंचो ऊंची जहां दुकान
और फीके हों पकवान
और खरीदो वेद कुरान
दे दो रुपया लो ईमान
अच्छा माटी के मोल खरीदोगे
बाबू क्या मुझे खरीदोगे।
मैं अपने को बेच रहा हूं
बोलो क्या मुझे खरीदोगे।

एक बार जब बिके हरिश्चन्द्र
हो गयी उनकी अमर कहानी।
रंगे गये पन्नों पर पन्ने
छोड़ गये वो अमर निशानी
धर्म ग्रंथ ने कहा धन्य हो
राजा हरिश्चन्द्र की जय हो
सत्य मार्ग पर बिकने वाले
राजा हरिश्चन्द्र की जय हो
उनकी विक्रय कथा अमर हो गयी

उनकी कथा हुई व्यापकतम
जन मन गन की व्यथा हो गयी
मै और मेरे अगणित भाई
रोज बिके पर किसने देखा
किसके मस्तक पर है आयी
चिंताओं की अविकल रेखा
कौन कहेगा कथा हमारी
कौन सुनेगा व्यथा हमारी
हम पापी गरीब जो ठहरे
कहने वाले हो गये गूंगे
सुनने वाले हो गये बहरे

शैव्या ने जब आंचल फाड़े
और रोहित को कफन ओढ़ाये
क्षीरोदधि में प्रलय मच गयी
दौड़े हुए स्वयं प्रभु आये
मेरी भी नारी ने अपने
बिना कफन के पूत बहाये
बिलख बिलख रोयी चिल्लायी
किन्तु नहीं परमेश्वर आये।
हम भक्तन के भक्त हमारे
प्रभु नहीं आये भक्त पुकारे
एक बार जब द्रुपद सुता की
दु:शासन ने खींची साड़ी
स्वमं चीर में समा गये प्रभु
बच गयी लाज चकित हुए प्राणी

देख असंख्यों दुपद सुता को
दु:शासन ने नग्न कर दिया
दुर्योधन हो रहा मगन
धर्मराज को भग्न कर दिया
डेढ़ हाथ की ओढ़नी ओढ़े
स्तन ढकै कि घूंघट काढ़े
अंगनैया में जेठ खड़े हैं
और ड्यौढ़ी पर सासुर ठाढे
इनको हे भगवान निहारो
ओ धन वालों मुझे खरीदोगे।
मैं अपने को बेच रहा हूं
बोलो क्या मुझे खरीदोगे।

सुनो स्वैद हमारे रक्त से ही
बस तुम्हारी जि़न्दगी है
अरे ओ पापी तुम हमारा
रक्त पीकर जी रहे हो
सुरा कामिनी कंचन नहीं
जीवन कहाता
श्रमफल छीनकर जीना
नहीं जीवन कहाता
रहे जो सर्द गरमी में
रहे गर्म सर्दी में
उसे कुछ इस करीने से
हमीं ने तो बनाया है
हमारी कला देखोगे
जरा देखो अजंता में
ऐलोरा में जरा घुसिये
अरे कुछ सांस तो रोको
यह कितनी भावमय मुद्रा
सरस यूं प्रेम की कविता
प्रस्तर में कि मानो
प्रेम का आवेश होता है
अभी ये बोल देंगे
यह अहसास होता है
कला श्रमजीवियों के
कृत्य से अमरत्व पाती है।
मैंने हिम किरणों से पूछा
तुमने कहीं तपन देखी है
हिम किरणें सकुचाकर बोलीं
जहां गये शीतलता पायी
तपन किसे कहते है बतलाना
मैंने सूरज से पूछा तुमने
कही अंधियारा देखा है
और सूरज के बोल न फूटे
विस्मित होकर वह बोला
मेरी असंख्य किरणों ने
जहां गयी उजियारा देखा
अंधियारा किसे कहते है बतलाना
मैने अपनी पत्नी से पूछा
तुमने सुख देखा है
विस्मित होकर बोली
नैहर देखा, सासुर देखा, सुख क्या है देख न पायी
मै बोला परदेस चला
दूर देश को मै जाउंगा कुछ दिन वहां रहूंगा
लेकिन सुख झोली में भर लाउंगा।
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मेरे पिता दिवंगत रामेश्वर दत्त ‘मानव’ की वर्ष 1965 में प्रकाशित लंबी कविता ‘सुबह होती है’ के कुछ अंश

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