पारंपरिक नहरों या ट्यूबवेलों के माध्यम से खेतों तक पानी पहुँचाने की प्रक्रिया में रिसाव और वाष्पीकरण के कारण लगभग 30 से 40 प्रतिशत पानी बर्बाद हो जाता है। कृषि में धान की खेती के लिए जरूरत से ज्यादा पानी निकालना और नहरों को पूरी तरह से पक्का (कंक्रीट) करने के कारण जमीन में पानी का प्राकृतिक रिसाव रुकना इन इलाकों में मुख्य रूप से जलस्तर गिरने के कारण हैं। यही वजह है कि सैनी सरकार ने राज्य में खेती की तस्वीर बदलने का फैसला किया है। अब सरकार ने पानी आधारित सबसे बड़ा ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल तैयार करना शुरू कर दिया है। आने वाले वर्षों में खेतों में खुले पानी से सिंचाई और ट्यूबवेल आधारित व्यवस्था को धीरे-धीरे सीमित कर माइक्रो इरिगेशन आधारित स्मार्ट सिंचाई मॉडल लागू किया जाएगा।
इसकी शुरुआत प्रदेश के नौ जिलों से होगी, जहां किसानों के समूह बनाकर सामूहिक जल टैंक तैयार किए जाएंगे। सरकार ने पहले चरण में भिवानी, चरखी दादरी, गुरुग्राम, महेंद्रगढ़, नूंह, रेवाड़ी, हिसार, झज्जर और सिरसा को चुना है। इन जिलों में किसानों के समूहों को सामूहिक टैंक निर्माण पर 85 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाएगी। प्रत्येक 10 एकड़ या उससे अधिक भूमि के लिए किसानों के समूह बनाकर सामूहिक टैंक तैयार किए जाएंगे।
इन टैंकों को नहरों से पाइपलाइन के जरिए भरा जाएगा। फिर इन्हीं से खेतों तक टपका या फव्वारा सिंचाई प्रणाली के माध्यम से पानी पहुंचाया जाएगा। फव्वारा या टपका विधि से फसलों की सिंचाई करने पर पानी की बरबादी नहीं होती है और फसल को जरूरत का पानी भी मुहैया हो जाता है। फसल भी अच्छी होती है। सामूहिक टैंक योजना के तहत पानी के भंडारण से किसानों को व्यक्तिगत रूप से ट्यूबवेल लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
वह सामूहिक टैंक में भरे हुए पानी का उपयोग अपने फसलों की सिंचाई के लिए कर सकते हैं। यदि मुख्यमंत्री की योजना के अनुसार किसानों ने अपने फसलों की सिंचाई की तो कम पानी और आधुनिक सिंचाई तकनीकों के उपयोग से किसानों का सिंचाई खर्च न्यूनतम हो जाएगा और कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी। बस जरूरत है राज्य के हर किसान को सामूहिक टैंक योजना से परिचित कराने और इसके फायदे बताने की।
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