बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हमारे धर्म ग्रंथों में सेवा को भक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया गया है। कहते हैं कि समाज में उस व्यक्ति को ज्यादा सम्मान प्राप्त होता है, जो सेवा करता है। भक्ति करने वाला भी सम्मान का अधिकारी होता है, लेकिन सेवक और भक्त दोनों एक साथ हों, तो स्वाभाविक है कि सेवक को ज्यादा मान मिलेगा।इस संबंध में एक कथा है। कहते हैं कि किसी देश के राजा के दरबार में एक व्यक्ति ने एक सवाल पूछा कि राजन! किसी मनुष्य के जीवन में भक्ति और सेवा में किसका महत्व ज्यादा है? राजा और उनके दरबारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए। राजा ने उस व्यक्ति से कहा कि आप मुझे कुछ दिन का समय दें, मैं विचार करके आपके सवाल का जवाब दूंगा।
इस घटना को कुछ दिन बीत गए। एक दिन राजा अकेले ही घूमने के लिए निकल पड़ा। उसने अपने साथ किसी भी अंगरक्षक को नहीं लिया। संयोग से राजा रास्ता भटक गया। दिन भर भटकने के बाद उसे बहुत तेज प्यास लगी। तभी कुछ दूरी पर उसे एक संत की कुटिया दिखाई दी। वह किसी तरह वहां पहुंचा और ‘पानी-पानी’ कहते हुए राजा मुर्छित हो गया। संत ने उस समय समाधि लगा रखी थी।
संत के कानों में ‘पानी-पानी’ की पुकार पड़ी तो उसकी समाधि टूट गई। संत ने तत्काल पानी लाकर राजा को पिलाया। राजा को जब होश आया, तो उसे पता चला कि उसकी वजह से संत की समाधि भंग हो गई है। उसने कहा कि अब मुझे प्रायश्चित करना होगा।
तब संत ने कहा कि आपको प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं है। मुझे आपको पानी पिलाने के बाद जो संतुष्टि मिली, वह समाधि लगाने के बाद भी नहीं मिलती। भक्ति करने से ज्यादा महत्वपूर्ण सेवा करना है। यह सुनकर राजा को उस व्यक्ति के सवाल का जवाब मिल गया।

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