बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
श्रावस्ती में एक युवक था अंकमाल। बौद्ध कथाओं में इसका कई बार जिक्र आया है। कुछ लोग अंकमाल और अंगुलिमाल को एक ही मानते हैं। शायद यह दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। एक दिन युवा अंकमाल महात्मा बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ। उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि भंते! मैं संसार की सेवा करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आप जहां उचित समझें, मुझे भेज दें ताकि लोगों को मैं धर्म का रास्ता बता पाऊं।अंकमाल की बात सुनकर महात्मा बुद्ध हंसे और बोले, दुनिया को कुछ के लिए तुम्हारे पास भी तो कुछ होना चाहिए। जाओ, अपनी योग्यता बढ़ाओ। अंकमाल वहां से चला गया। उसने दस साल तक कठोर परिश्रम करके 24 कलाएं सीखीं। तीर बनाने से लेकर नाव चलाने तक की विद्याएं सीखने से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। वह कलाविशारद कहा जाने लगा। उसे अपने ऊपर अभिमान हो गया।
वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा और अभिमानपूर्वक कहा कि मैं अब 24 कलाओं को जानता हूं। हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूं। बुद्ध ने कहा कि तुमने योग्यता हासिल की है, लेकिन परीक्षा नहीं दी है। एक दिन वेष बदलकर बुद्ध उसके पास पहुंचे और उसकी बुराई करने लगे। वह उन्हें क्रोधित होकर मारने दौड़ा। उसी दिन वह आम्रपाली के साथ उससे मिलने पहुंचे, तो वह पूरे समय आम्रपाली को ही देखता रहा। उसी दिन दोपहर में दो बौद्ध श्रमण पहुंचे और उससे कहा कि महाराज आपको मंत्रीपद देना चाहते हैं क्या स्वीकार करेंगे?
अंकमाल को लोभ आ गया। वह बोला, हां..हां, अभी चलो। दोनों श्रमण चुपचाप चले गए। शाम को अंकमाल को तथागत ने बुलवाया और पूछा, वत्स! तुमने काम, क्रोध और लोभ पर विजय पाने की विद्या सीखी है। अंकमाल चुप रह गया। उसे दिन हुई सारी घटनाएं याद आईं। उसने लज्जा से सिर झुका लिया। उस दिन से आत्म विजय की साधना शुरू कर दी।