Sunday, October 31, 2010

हाथ जिस जिस के गुनाहों में सने हैं अब तक

अशोक मिश्र

‘आज को आज, कल को कल लिखना

सिर्फ थोड़ा संभल-संभल लिखना

दिल में बस दर्द का अहसास रहे

कोई मुश्किल नहीं गजल लिखना।’

ये जजबात हैं गजलगो कुंवर ‘कुसुमेश’ के। वे अपनी गजल संग्रह ‘कुछ न हासिल हुआ’ में आदमीयत के ह्रास और धन-दौलत के पीछे भागने की प्रवृत्ति पर प्रहार करने से नहीं चूकते हैं। वे कहते हैं, ‘आदमी छोड़कर आदमीयत, डूबता जा रहा मालो-जर में।’ दरअसल आज के युग की वास्तविक पहचान जैसे मालो-जर ही हो गए हैं। यह कैसी विडंबना है कि इंसान अपने चारित्रिक, मानसिक और सामाजिक गुणों की बजाय धन-दौलत से पहचाना जाने लगा है। आज समाज में उसी को महत्व दिया जा रहा है, जो जायज-नाजायज तरीके से अकूत धन कमा रहा है। वे आदमी को पहचाने की हिदायत देते हुए कहते हैं, ‘कभी घर से बाहर निकलकर तो देखो, पलटकर जमाने के तेवर तो देखो। जिसे फख्र से आदमी कह रहे हो, मियां झांककर उसके अंदर तो देखो।’ फैशनपरस्ती और पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण का खामियाजा हमारी पुरानी सभ्यता और संस्कृति को उठाना पड़ रहा है। फैशन के नाम पर नग्नता बढ़ती जा रही है। विज्ञापन भले ही किसी वस्तु का हो, उसमें आज के बाजार ने स्त्रियों की उपस्थिति अनिवार्य बना दी है। यहां तक कि ट्रैक्टर और ट्रक के विज्ञापन में भी नारी किसी न किसी बहाने मौजूद रहती है। बाजार ने स्त्री को एकदम वस्तु बना दिया है। शायर कुंवर ‘कुसुमेश’ के शब्दों में-

‘वाकई वक्त अच्छा नहीं है

हो रहा जो वो होता नहीं है

पश्चिमी सभ्यता का नतीजा-

तन पे नारी के कपड़ा नहीं है।’

ग्लोबल वार्मिंग आज की प्रमुख समस्या है। पृथ्वी का लगातार बढ़ता तापमान और समुद्र का तल हमें आगाह कर रहा है कि यदि हम अब भी नहीं संभले, तो इसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा। महानगरों में बढ़ती कारों, एयरकंडीशनरों और कल-कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित पदार्थों के चलते पर्यावरण का मिजाज बिगड़ रहा है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से कुछ ऐसे इलाकों में बर्फबारी हो रही है, जहां पहले बर्फबारी नहीं होती थी। वहीं मास्को के रेड स्क्वायर जैसे इलाकों में पिछले साल बर्फ ही नहीं पड़ी। इन पर्यावरणीय परिवर्तन के प्रति कुंवर ‘कुसुमेश’ की नजर गयी है। वे मानव जाति को सचेत करते हुए कहते हैं,

‘धरातल डगमगाना जानता है

फलक गुस्सा दिखाना जानता है।

सुनामी से चला हमको पता यह

समंदर भी डराना जानता है।

समझना मत कभी कुदरत को गूंगा

ये गूंगा गुनगुनाना जानता है।’

झूठ, फरेब और मतलबपरस्ती के इस दौर में भी दोस्ती, पाकीजा प्रेम और इंसानियत का जज्बा भले ही मात्रात्मक रूप से कम पाया जाता हो, लेकिन पाया जरूर जाता है। अकसर वे लोग अपने जीवन में सफल दिखते हैं, जो जीवन भर स्वार्थपरता, बेईमानी और झूठ का कारोबार करते हैं। दुनिया उन्हीं को झुककर सलाम करती है, लोग उनकी बातों को अहमियत भी देते हैं। बेईमान और दगाबाज लोग इसके बावजूद लबादा ईमानदारी और प्रेम का ही ओढ़ते हैं। कुसुमेश का एक शे’र ऐसी स्थिति का खुलासा करता है, ‘दौरे हाजिर में हरिश्चंद्र वो हुआ जो, झूठ बोला है सरासर जिंदगी में। दुश्मनी इंसान की फितरत में शामिल, दोस्ती किसको मयस्सर जिंदगी में।’ गजल संग्रह ‘कुछ न हासिल हुआ’ में शायर कुंवर कुसुमेश ने जीवन के विविध पक्षों और रंगों को उकेरने का प्रयास किया किया है। राजनीति, पर्यावरण, शिक्षा, सभ्यता, गांव-गिरांव, खेती और जीवन के विविध रंग इसमें बिखरे पड़े हैं। ‘नाहक जरा से चांद पर इतरा रहा फलक, एक चाँद इस जमीं पे हमारा है देखिए’ कहकर माहताब को चुनौती देने वाले शायर कुंवर कुसुमेश ने वर्तमान राजनीति की नब्ज कुछ इस तरह टटोली है,

‘फूल के नाम पे कांटे ही मिले हैं अब तक,

और हम हैं कि उम्मीदों पे टिके हैं अब तक।

दौरे हाजिर ने उसे काबिले-कुर्सी माना,

हाथ जिस जिस के गुनाहों में सने हैं अब तक।’

Saturday, October 30, 2010

मैं उल्लू हूँ, तुम नादान

-अशोक मिश्र
घरैतिन और बच्चों ने सुबह से ही घर को संसद भवन बना रखा था। कोई पटाखों के लिए अनुदान मांग रहा था, तो कोई लक्ष्मी पूजा के लिए हजारों का वित्त विधेयक पारित कराने की जुगत में घेराव पर आमादा था। मैं हर बार की तरह सिर्फ आश्वासन और अंतरिम राहत के बल पर दीपावली सत्र बिता लेना चाहता था। बच्चे पटाखों, फुलझड़ियों के लिए मेरे आगे पीछे ठुनक रहे थे, बेटी, स्टाइलिश लहंगा-चुन्नी की पुरानी मांग का प्रस्ताव अपनी जननी से स्वीकृत करवाकर मेरे सामने भी पेश कर चुकी थी। बेटा दो-ढाई हजार रुपये की कीमत वाले पटाखों और बमों की लिस्ट थमाकर पड़ोस में खेलने जा चुका था। घरैतिन को बनारसी साड़ी और दो तोले वजन वाले सोने के कंगन चाहिए थे। बार-बार प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिए जाने से वे मौन रहकर विरोध प्रकट कर रही थीं। सो, मरता क्या न करता वाली कहावत चरितार्थ करते हुए मैं सभी प्रस्तावों और मांगों की सूची समेटकर बाजार जाने के लिए घर से निकल पड़ा।
हाथ में थैला पकड़े मैं खरामा-खरामा पैदल ही बाजार की ओर चला जा रहा था। जेब में पड़ी मामूली सी रकम और पर्ची में लिखे सामान की कीमत का समीकरण बनाता-बिगाड़ता मैं बगिया नाले के पास स्थित काफी पुराने पीपल के पेड़ के पास पहुंचा ही था कि ऊपर से आवाज आई, ‘मैं उल्लू हूं। तुम बुद्धिबेचू व्यंग्यकार हो।’ इस आवाज को मैंने पहले तो अपना भ्रम समझा। सोचा कि पिछले कई दिनों से पैसे की किल्लत और घरैतिन की लगातार बढ़ती मांग के चलते दिमाग का कोई नट-बोल्ट ढीला होकर गिर गया है और चलने से इस नट-बोल्ट की आवाज आती है। या फिर ज्यादा सोचने की वजह से शायद मेरे कान बज रहे हैं। यही सोचकर आगे बड़ा ही था कि एक बार आवाज आई, ‘मैं उल्लू हूं। तुम नादान हो।’ इस बार मुझे दिमाग के हिल जाने का कोई भ्रम नहीं रहा। मैं चौंक उठा। बचपन में मेरी मां अक्सर कहा करती थीं, दोपहर में बाहर खेलने मत जाया करो। पुराने पीपल के पेड़ पर भूत, पिशाच या ब्रह्मराक्षस रहता है। भूत-पिशाच से बचने के लिए सचमुच दोपहर को हम सभी भाई बाहर नहीं निकलते थे। एकाएक याद आया कि कहीं कोई भूत-पिशाच तो नहीं? मैंने ऊपर की ओर देखा। एक बड़ा-सा उल्लू बैठा मुझे उल्लू की तरह निहार रहा था। उसने मुझे घूरते हुए कहा, ‘अबे उल्लू की दुम! मैं कोई ऐरा-गैरा उल्लू नहीं हूं। लक्ष्मी जी का वाहन उल्लूकराज हूं। लक्ष्मी जी इस बार मृत्युलोक वासियों को एक विशेष पैकेज देने जा रही हैं। उसी की सेटिंग के लिए मैं पहले से भेजा गया हूं।’
मैं उस उल्लू को मनुष्यों की तरह बोलता पाकर भौंचक था, ‘हे उल्लूकराज! पहले तो दीपावली की रात किसी दीन-हीन के घर आकर देवी लक्ष्मी उसका भाग्य बदल देती थीं। लेकिन क्या अब ऐसा नहीं होता?’
उल्लूकराज ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘तुम तो रहे पूरे काठ के उल्लू। बाइसवीं शताब्दी में रहकर उन्नीसवीं शताब्दी की बात करते हो। क्या मर्त्यलोक में मुंह देखकर पैकेज नहीं दिया जाता। विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन से लेकर दाह संस्कार पर मिलने वाला अनुदान क्या बिना लिए-दिये मिल जाता है? जब तुम मर्त्यलोकवासी हर बात में उत्कोच का मुंह देखते हो, तो हम क्यों पीछे रहें। अगर इस बार दीपावली पर दरिद्रता हरण परियोजना के तहत अनुदान लेना है, तो बताओ कितने प्रतिशत मुझे और कितने प्रतिशत लक्ष्मी जी को दोगे? जल्दी सोचकर बताओ। इस बार विष्णु जी ने बहुत कम फंड दरिद्रता हरण परियोजना के लिए पारित किया है। महामहिम विष्णु जी तो इस पूरे प्रोजेक्ट को ही खत्म करने पर तुले हुए थे, लेकिन लक्ष्मी जी ने अपने विशेषाधिकार का उपयोग कर इस वर्ष के लिए मंजूरी ले ली है। अब तक पूरे देश में चार सौ उन्नीस लोग तलाशे जा चुके हैं। अब केवल एक की तलाश बाकी है। अगर तुम ठीक-ठाक उत्कोच, वह भी एडवांस देने का वायदा करो, तो मैं इस बार तुम्हें करोड़पति बनवा सकता हूं।’
मैं सोच में पड़ गया। एक तरफ तो मुझे करोड़पति बनने का लालच कुछ कर गुजरने को उकसा रहा था, दूसरी तरफ बुद्धिजीवी होने का दंभ इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि यह मनुष्य की भाषा में बोलने वाला उल्लू लक्ष्मी का वाहन हो सकता है? लक्ष्मी और विष्णु की गाथाएं मुझे हमेशा कपोल कल्पित लगते रहे हैं। लेकिन एक बार फिर मन डांवाडोल हुआ कि क्या पता सचमुच यह लक्ष्मी का वाहन हो और मेरी किस्मत बदलने वाली हो! मैंने साहस करके पूछा, ‘लक्ष्मी के प्रिय वाहन उल्लूकराज जी! यह बताइए कि मुझे आपके और आदरणीया मिसेज लक्ष्मी जी के लिए क्या करना होगा?’
‘कुछ नहीं...बस मेरे लिए सिर्फ एक प्रतिशत और मालकिन के लिए पांच प्रतिशत अभी देना होगा। आज रात आपको यह रकम इस तरह लौटाई जाएगी कि आप करोड़पति भी हो जाएं और सरकार को दमड़ी भी न देनी पड़े।’ उल्लूकराज जी मुस्कुराए।
मैंने विनीत भाव से कहा, ‘लेकिन लक्ष्मी जी से कहिएगा कि वे जो कुछ भी दें, जरा व्हाइट मनी के रूप में दें। ब्लैक मनी अपने से पचती नहीं है। छोटा-मोटा व्यंग्यकार हूं न, सो अपना हाजमा जरा कमजोर है।’
उल्लूकराज जी मुस्कुराये, ‘तुम इसकी चिंता मत करो। इस बार मर्त्यलोक पर जिसे भी दरिद्रता हरण प्रोग्राम के तहत उपकृत किया जाएगा, उसकी सूची मर्त्यलोक के आयकर विभाग के कमिश्नर को पहले से ही दे दी जाएगी। सौ करोड़ का पैकेज इस बार सूबे के आयकर कमिश्नर को भी दिया जा रहा है। अब जल्दी से रकम ढीली करो। शाम हो रही है, सात बजे तक लक्ष्मी जी को फाइनल सूची भी देनी है।’
‘पर मेरे पास सिर्फ पैंतीस हजार रुपये हैं, वह भी पत्नी और बच्चों के लिए गहने, खिलौने, कपड़े और मिठाइयां खरीदने के लिए हैं।’ मैंने दांत निपोर दिये।उल्लूकराज भुनभुनाए, ‘पता नहीं किस भुक्खड़ से पाला पड़ गया है? अब तक जिसके सामने भी प्रस्ताव रखा है, उसने न केवल अपना हिस्सा अदा कर दिया, बल्कि दस-बीस हजार मुझे बख्शीश भी दी है। लाओ, अभी जितना है, बाकी अनुदान मिलने के बाद दे देना। लक्ष्मी जी का हिस्सा मैं अपने पास से दे दूंगा।’मैंने अपने जेब में पड़े पैंतीस हजार छह सौ रुपये में से छह सौ निकालने के बाद रकम पीपल के पेड़ के पास रख दी। उल्लूकराज ने पेड़ की डाल से उड़ान भरी और चोंच में रकम दबाकर अनंत आकाश में विलुप्त हो गये।
मैं खाली हाथ घर पहुंचा, तो सबने घेर लिया और सवालों की झड़ी लगा दी। मैंने मुस्कुराते हुए लक्ष्मीवाहन उल्लूकराज से मुलाकात और दरिद्रता हरण अनुदान मिलने की गाथा सुनाई, तो सब खुश हो गये। बेसब्री और चहलकदमी करते-करते रात आई। पूजा का समय हुआ, तो सजी-धजी घरैतिन और बच्चे अमीर होने की खुशी में चमक रहे थे। लेकिन यह क्या...? पूजा का समय निकल गया, लेकिन लक्ष्मी जी तो क्या...उल्लूकराज के भी दर्शन नहीं हुए। फिर तो पूरी रात गुजर गयी। न लक्ष्मी जी आईं और न उल्लूकराज। घरैतिन को लगता है कि मैं सारी रकम जुए में हार गया था और उन्हें कपोल-कल्पित कहानी सुनाकर बहलाने की कोशिश की थी। बच्चे भी अपनी मां के साथ हैं। पिछले चार दिन से मैं अपने ही घर में बेगानों की तरह रहकर उल्लूकराज का इंतजार कर रहा हूं। मैं अब भी निराश नहीं हूं। हो सकता है, इस बार लेट हो जाने से सूची में नाम न पड़ पाया हो और अगले साल मेरी किस्मत बदल ही जाए।

Tuesday, August 31, 2010

गधों का कायांतरण

दिल्ली के संसद मार्ग पर गधों का सम्मेलन हो रहा था। एक स्वामी टाइप के बुजुर्ग गधे गर्दभानंद को सम्मेलन का सभापति बनाया गया था। सभापति के आसन ग्रहण करते ही सभी गधों ने ‘ढेंचू-ढेंचू’ की आवाज से उनका स्वागत किया। एक युवा गधे ने सम्मेलन का संचालन करते हुए कहा, ‘मित्रों, आज दिल्ली में आप सभी गधों का स्वागत करते हुए मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है। पहले आपको यह बता दें कि यह सम्मेलन बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? आप जानते हैं कि सदियों से हम गधों के आश्रयदाता धोबी रहे हैं। उनके रहते हमें कभी भोजन की समस्या नहीं रही। वे हमें खिलाते थे और जमकर काम लेते थे। इससे हमें उज्र भी नहीं था। लेकिन अब जब उनके लिए हम अनुपयोगी हो गये हैं, तो हमारे सामने भोजन की समस्या आ खड़ी हुई है। इसलिए इंसानों की परंपरा के विपरीत मैं सबसे पहले सभापति महोदय से अनुरोध करता हूं कि वे विषय प्रवर्तन के लिए आगे आयें।’ इतना कहकर युवा गधा एक तरफ खड़ा हो गया।
सभापति स्वामी गर्दभानंद ने आसन के सामने रखे हरे चारे को मुंह में भरा और चबाते हुए माइक के सामने आ खड़े हुए। बोले, ‘देश भर से आये प्यारे गर्दभ भाइयों! पिछले कई दिनों से हरे चारे को देखने को तरस गयी आंखों को आज कितना सुकून मिल रहा है, यह मैं आपको नहीं बता सकता। इस सम्मेलन के आयोजकों को सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने पद और गरिमा के हिसाब से हम सभी गधों को हरा चारा उपलब्ध कराया। कितने अफसोस की बात है कि कभी सावन-भादों में जिधर नजर दौड़ाइए, आपको हरा ही हरा दिखता था। लेकिन आज हरियाली या तो कोठियों में कैद है या फिर घिरे हुए फार्म हाउसों में। बाकी तो हरियाली कहीं दिखती नहीं है।’
इतना कहकर सभापति महोदय सांस लेने के लिए रुके और बोले, ‘आज सुबह मैं दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा था, तो पाया कि हमारे कई भाई कायांतरण कर इंसानी वेश धारण किये कारों में घूम रहे हैं। कोई कोट-पैंट पहने है, तो कोई धोती कुरते में है। कुछ कायांतरित गधे तो देश के राजनीतिक दलों में भी अपनी जगह बना चुके हैं। उनकी स्थिति देखने में मुझे काफी अच्छी लगी। कई तो केंद्र और राज्य सरकारों में सरकारी अफसर बने बैठे हैं। सरकार और जनता को चरे जा रहे हैं। इससे मुझे लगा कि इस देश में चारागाह की समस्या कतई नहीं है। बस थोड़ी सी अकल दौड़ाने की जरूरत है। अगर हम लोग पूरे देश को चारागाह समझ लें, तो फिर हमारे सामने चारे की समस्या कहां रहेगी। इसलिए सबसे पहला काम यह करें कि आप लोग अपना कायांतरण करें और इंसान का रूप धारण कर जहां मौका मिले, घुस जायें। संसद, विधानसभाओं, बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों में जब, जहां और जैसे भी मौका मिले, बड़े-बड़े पद हथियायें। अपने भाइयों को प्रमोट करें। खुद जी भर कर चरें और बाकी साथियों को भी चरने का मौका दें।’
सभापति महोदय के इतना कहते ही सारे गधे एक बार फिर ‘ढेंचू-ढेंचू’ कहकर चिल्लाए और लयात्मक ढंग से दुलत्ती झाड़ने लगे। सभापति ने उन्हें शांत रहने का इशारा करते हुए थोड़ी सी घास उठाई और चबाने लगे। खूब चबाकर खाने के बाद उन्होंने फिर कहना शुरू किया, ‘लेकिन भाइयों, आप लोगों को मैं अभी से आगाह कर दूं। कायांतरण के बाद आपमें कुछ इंसानी बुराइयां भी आ सकती हैं। जिस थाली में खाता है, इंसान उसी थाली में छेद करता है। उसके लिए बहन, बेटी, बीवी जैसे शब्द अब कोई मायने नहीं रखते। वह उनकी बेकद्री करता रहता है, हमें इंसानों की इसी प्रवृत्ति से बचकर रहना है। हम देश को चारागाह तो समझें, लेकिन उसे बेच खाने की कभी न सोचें।’ सभापति के इतना कहते ही सारे गधे ‘ढेंचू-ढेंचू’ कहकर लयात्मक ढंग से दुलत्तियां झाड़ने लगे। सभापति ने उन्हें शांत होने का इशारा किया, लेकिन उनकी दुलत्तियां जारी रहीं। नतीजा यह हुआ कि कई गधों को दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। वैसे उनका यह सम्मेलन आज भी जारी है। सम्मेलन के निष्कर्ष का इंतजार मुझे भी है और आपको भी होगा ही।

भगवन! बस एक बार सांसद बनवा दो

उस्ताद मुजरिम भगवान की प्रतिमा के आगे हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे थे, ‘भगवन! बस एक बार कृपा कर दो। आगे से कभी आपसे कुछ नहीं मांगूंगा। अच्छा आप ही बताइए, आपसे अब तक कुछ मांगा है? लेकिन अब मांगता हूं। जब तक आप मेरी मनोकामना पूरी नहीं करते, तब तक मुन्नाभाई की तरह रोज सुबह आपके मंदिर में आकर गांधीगीरी करता रहूंगा। आखिर आप कब तक नहीं पसीजेंगे। आपको मेरी बात माननी ही पड़ेगी। वैसे तो आप जानते ही हैं कि अपने नाखूनों में फंसा ब्लेड और लोगों की जेब में पर्स सलामत रहे, तो फिर अपने को कुछ नहीं चाहिए। भगवन! अब आपसे क्या छिपाऊं। मुझे नाखूनों में फंसे ब्लेड पर इतना भरोसा है कि अगर कोई ठीकठाक दाम देने को तैयार हो जाए, तो आगरे का ताजमहल उड़ाकर बेच दूं और पकड़ा न जाऊं।’
इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने अगरबत्ती सुलगाई और मूर्ति के चारों ओर घुमाते हुए बोले, ‘भगवन! अब तक लोगों की पाकेट मार कर अपना गुजारा करता रहा। लेकिन आप तो जानते हैं कि इस पेशे में कोई दम नहीं रहा। जब से नेता और अफसर मिलकर लोगों की पाकेट मारने लगे, तब से अपना कोई स्कोप नहीं रह गया। अब लोगों की जेब से सौ दो सौ रुपये से ज्यादा निकलता भी नहीं है। ज्यादातर पर्स से निकलते हैं प्रेमपत्र, अश्लील फोटोग्राफ्स या फिर राशन की दुकान का बिल, दवाओं की पर्चियां। इससे इतनी कोफ्त होती है कि अब पाकेटमारी छोड़ने का जी करता है।’
अब तक आंखें मूंदे प्रार्थना कर रहे मुजरिम ने चारों ओर देखा और कानाफूसी वाले अंदाज में बुदबुदाये, ‘गुरु...बस किसी तरह मुझे इस बार सांसद बनवा दो। सांसद मैं भले ही दो-चार दिन ही रहूं, लेकिन अगर एक बार सांसद बन गया, तो फिर जिंदगी भर की मौज हो जायेगी। बिना कुछ किये ही तनख्वाह के रूप में इतनी मोटी-मोटी गड्डियां मिलेंगी कि पूछो न...सुना है कि सांसद अपनी तनख्वाह खुद ही बढ़ा सकता है। एक बार सांसद बन गया, तो सबसे पहले बराक ओबामा की सैलरी पता करूंगा और उनसे चार रुपये अपनी तनख्वाह ज्यादा रखूंगा। और अगर आपने किसी को इस बार सांसद बनाने का आश्वासन दे रखा हो, तो कोई बात नहीं। दिल्ली के किसी क्षेत्र से विधायक ही बनवा दो। सुना है कि दिल्ली के विधायकों की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में जाने वाला है। मैंने आपको सामने दोनों आप्शन रख दिये हैं। आप जो चाहें बनवा दें। आप तो जानते ही हैं। मुझमें नेताओं के सारे गुण हैं। झूठ बोलना, झांसे देना, बिना कुछ किये कमीशन खाना आदि गुणों में तो बचपन से ही पारंगत हूं।’
उस्ताद मुजरिम अनवरत बोले जा रहे थे। उनके हाथ की अगरबत्ती कब की जलकर खत्म हो गयी थी। केवल सींक हाथ में पकड़े गोल-गोल घुमाते जा रहे थे, ‘अगर इसके बदले आपको कुछ चाहिए, तो अभी से बता दें। बात साफ रहे, तो हमारी आपकी दोस्ती निभ भी सकती है। अगर आप सांसद बनवाने के बदले नकद चाहते हैं, तो सवा रुपये एडवांस रखे जा रहा हूं। बाकी सांसद बनकर जब लूटखसोट कर अपना घर भरूंगा, तो हिसाब चुकता कर दूंगा। एक बात और बता दें भगवन! आगे से आप कैश लेंगे या चेक से काम चल जायेगा। हां, अगर आप अपना हिस्सा गोल्ड या डायमंड के रूप में चाहेंगे, तो अपने पास उसका भी इंतजाम है। बस आपके इशारे की देर है। लगे हाथ आप यह भी बता दें कि आपको पैसा इंडिया में चाहिए या किसी और देश में। वैसे चिंता मत करें। अगर कहीं और आपको पैसा चाहिए, तो भी उसका इंतजाम हो जायेगा। कई हवाला कारोबारी अपने गिरोह में हैं।’ इतना कहकर उस्ताद मुजरिम ने पूजा खत्म की और बाहर आ गये।

म्युनिसपैल्टी का दफ्तर था उप्र हिंदी संस्थान


आगरा निवासी प्रख्यात कवि और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष सोम ठाकुर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी रचनाएं कवि सम्मेलनों में बड़े सम्मान के साथ सुनी जाती हैं। सन 1997 में उनकी पुस्तक ‘एक ऋचा पाटल को’ को निराला पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेश है हिंदी की दशा और दिशा के साथ-साथ उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर अशोक मिश्र से हुई बातचीत के संपादित अंश।
एक पारंपरिक सवाल से बातचीत की शुरुआत की जाए। आपको अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है?

-मैं भी वही पारंपरिक जवाब दे रहा हूं। एक पिता को अपनी कौन सी संतान सबसे प्रिय है, यह कह पाना सबसे कठिन है। लेकिन फिर भी इतना कहूंगा कि सन 55 में मेरा गीत ‘लौट आओ मांग के सिंदूर की सौगंध तुमको, नैन का सावन निमंत्रण दे रहा है’ और सन 57 में लिखा गीत ‘जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम, चांद की किरन निहारते न बीत जाये रात’ काफी सुने गए। लोग कवि सम्मेलनों में अक्सर इसे सुनाने को कहते थे। सन 1957 में दिल्ली के लाल किले में एक कवि सम्मेलन हुआ था। इसमें चालीस कवि थे। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने किया था। इसमें हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर जैसे कई ख्यातिप्राप्त कवि थे। इस कवि सम्मेलन में मुझे सिर्फ दो गीत सुनाने पड़े। बाकियों ने एक ही रचनाएं सुनार्इं। मैं युगधर्म से जुड़ी रचनाएं करता रहा। सन 62 में चीन का हमला हुआ, तो मैंने लिखा,‘धरती जागी आकाश जगा, जागे कुबेर कंगाल जगे।’ सन 65 में पाकिस्तान का हमला हुआ, तो मेरा गीत ‘सागर चरण पखारे गंगा शीश चढ़ावे सौ-सौ नमन करूं मैं भइया’ बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन दिनों पारंपरिक गीतों के साथ नवगीत भी पढ़ता था।

आज जब संचार माध्यमों और सरकारी योजनाओं के जरिये हिंदी को इतना बढ़ावा दिया जा रहा है। उस पर भी क्या हिंदी साहित्य और भाषा की स्थिति संतोषजनक है?

-हिंदी की दशा-दिशा कतई संतोषजनक नहीं है। मैं तो तब मानूंगा, जब हिंदी भाषा किसी बेरोजगार को रोजी-रोटी मुहैया कराये। हिंदी भाषा के विकास का ढिंढोरा लाख पीटा जाये, लेकिन सब बेकार। अब आप कहेंगे कि कंप्यूटर आ जाने से हिंदी के प्रचार-प्रसार का मार्ग काफी सुगम हो गया है। लेकिन कंप्यूटर के उपयोग का माध्यम क्या है? अंग्रेजी न...और अंग्रेजी भाषा रोजगार दिलाती है, इसलिए इसका प्रचार प्रसार निरंतर हो रहा है। हिंदी भाषा को भी ऐसा ही होना होगा।

जब आप उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष थे, तो आपने हिंदी के विकास के लिए क्या किया? कौन-कौन सी योजनाएं चलार्इं? उनकी हिंदी भाषा या साहित्य के विकास में क्या भूमिका रही?

-जब मैंने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का कार्यभार संभाला, उससे पहले 50-50 हजार रुपये के पुरस्कार दिये जाते थे। मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से कहकर उसकी रकम बढ़वाई। यश भारती पुरस्कार एक लाख रुपये का दिया जाता था। मैंने मुलायम सिंह से कहा कि एक लाख रुपये के पुरस्कार तो कई हैं। यश भारती पुरस्कार पांच लाख रुपये का होना चाहिए। और वही हुआ। हिंदी संस्थान की लाइब्रेरी को पब्लिक लाइब्रेरी बनाया। सबके लिए लाइब्रेरी के द्वार खोले। हिंदी संस्थान की इमारत काफी खस्ताहाल थी, 75 लाख रुपये खर्च करके उसकी दशा सुधारी। सोलह लाख रुपये खर्च करके लिफ्ट लगवाई। पहले हिंदी संस्थान म्युनिसपैल्टी का दफ्तर लगता था, मैंने उसे फाइव स्टार होटल जैसा बनाया। हिंदी भाषी प्रदेशों के साहित्यकारों को अहिंदी भाषी प्रदेशों में ले गया। वहां परिचर्चाएं, सेमिनार और गोष्ठियां करार्इं। गैर हिंदी भाषी प्रदेशों के रचनाकारों को हिंदी प्रदेशों में लाकर उनका हिंदी के रचनाकारों से परिचय कराया। गैर हिंदी भाषी प्रदेशों के लोग चाहते हैं कि हिंदीतर भाषी प्रदेश का रचनाकार कहा जाये। लेकिन अब हिंदी संस्थान में कुछ भी नहीं हो रहा है।

इमारतों को सुधारने या रचनाकारों की पुरस्कार राशि बढ़ा देने से हिंदी भाषा या साहित्य का क्या भला हुआ?

-क्यों...हिंदी भाषी रचनाकारों का अहिंदी भाषी प्रदेशों से परिचय कराने और दोनों तरह के प्रदेशों में कार्यक्रम कराने से हिंदी भाषा का विकास नहीं हुआ! और भी बहुत से काम मैंने अपने कार्यकाल में किये जिनसे हिंदी साहित्य का उन्नयन हुआ। सुना है कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इन दिनों तो कुछ भी नहीं हो रहा है। हिंदी के विकास की कोई सार्थक पहल नहीं हो रही है।

अच्छा यह बताएं...मुलायम सिंह की सरकार ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष आपको ही क्यों चुना? किसी और को क्यों नहीं?

-इसका जवाब तो वे ही बेहतर दे सकते हैं। मैं मुलायम सिंह या समाजवादी पार्टी के पास नहीं गया था। वे ही आये थे मुझे बुलाने।कुछ साहित्यकार मुलायम सिंह की सरकार के समय में कैबिनेट मंत्री का दर्जा पा गये। जैसे कि आप, गोपालदास नीरज...इससे साहित्य का कितना भला हुआ? सपा का ठप्पा लगने से आप कितना संतुष्ट हैं?-देखिये...सपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष बनना ठप्पा लगवाने जैसा नहीं है। नीरज जी की सपा से नजदीकी का कारण उनका इटावावासी होना है। मुलायम सिंह और गोपालदास नीरज काफी पहले से एकदूसरे के निकट रहे हैं। इसका कोई राजनीतिक कारण नहीं रहा। उनका कोई कार्यक्रम लखनऊ में हो रहा है और मैं वहां मौजूद रहा, तो मुलायम सिंह जी ने मुझे मंच पर बुला लिया। इसका कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं तलाशा जाना चाहिए।

इससे आपको कोई नुकसान हुआ?

-हां...नुकसान हुआ। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष बनने से पहले मैं लखनऊ महोत्सव में बुलाया जाता था। जब तक उपाध्यक्ष रहा, बुलाया जाता रहा। लेकिन जब से मायावती की सरकार बनी है, लखनऊ महोत्सव वालों ने बुलाना बंद कर दिया है। उसके आयोजक बदल गये। उन्होंने मुझ जैसे कई साहित्यकारों को बुलाने की जरूरत नहीं समझी। यह नुकसान तो हुआ न...। वैसे मेरा मानना है कि राजनीतिक दलों से साहित्यकार को दूर ही रहना चाहिए। साहित्यकार तटस्थ रहकर जितना अच्छा लिख सकता है, उतना अच्छा किसी राजनीतिक दल से जुड़कर नहीं। इससे साहित्यकार का व्यक्तिगत नुकसान होता है।

आज कविता का बाजार से रिश्ता टूट चुका है। कहने का मतलब यह है कि आज प्रकाशक कविता छापने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए आप दोषी किसे मानते हैं? प्रकाशक को, कवियों को या पाठकों को।

-सबसे बड़ा दोषी तो बाजार व्यवस्था है जिसने काव्य को भी वस्तु बना दिया। आज प्रकाशक कविता का बाजार देखते हैं। उनकी अपनी चयन समितियां हैं, इन समितियों के सदस्य तय करते हैं कि प्रकाशक को पुस्तक छापनी चाहिए या नहीं। स्वयं प्रकाशक तो काव्य की बारीकियों को समझता नहीं है। वह दूसरों पर निर्भर रहता है। समिति सदस्य बाजार को ध्यान में रखते हैं, ऐसे में वे कवियों की पुस्तकों का प्रकाशन क्यों करेंगे। जो किताबें छपती भी हैं, उनकी कीमत बहुत ज्यादा होती है। सामान्य पाठकों की पहुंच से बाहर। हमारे रचनाकार बंधु भी ऐसी स्थिति के लिए कम दोषी नहीं हैं। वे आम जन में काव्य का प्रसार करने की जगह मंचीय होना ज्यादा उपयुक्त समझते हैं। मंचीय कवि का मतलब है जनता द्वारा स्वीकृत कवि। लेकिन आजकल तो मंचीय कवि का तात्पर्य आयोजक द्वारा स्वीकृत कवि हो गया है।

मंचों पर आजकल या तो चुटकुलेबाजी की जा रही है, कविता के नाम पर फूहड़ तुकबंदी? क्या आप इससे अपना सामंजस्य बिठा पाते हैं?

-यह स्थिति काफी दुखद है। इससे कविता का भला नहीं होगा। इसके लिए कवि सम्मेलनों के आयोजक दोषी हैं। यह सही है कि इन दिनों मंचों पर या तो नारेबाजी होती है किसी सियासी दल के समर्थन में या फिर फूहड़ चुटकुलेबाजी। ऐसा करने वाले कवियों को आयोजक पसंद करते हैं क्योंकि उनकी दुकान ऐसे ही कार्यक्रमों से चलती है। आयोजक तो कवियों को पैसा ही इसी बात का देते हैं कि वे रंग जमा देंगे। आयोजकों के अपनी-अपनी पसंद के कवि हैं। पैसे ने कवियों का स्तर गिरा दिया है। पहले शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे। स्कूल-कालेजों में नाटक, कविता, कहानी और सामाजिक मुद्दों पर कार्यक्रम होते थे, सेमिनार और बहस गोष्ठियां आयोजित की जाती थीं। छात्र यूनियनें इन कार्यक्रमों का नेतृत्व करती थीं। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने अपने शासनकाल में यूनियनें क्या खत्म की, कार्यक्रम होने बंद हो गये। इसका नतीजा यह हुआ कि कार्यक्रम आयोजकों की बन आयी।

कवियों में अब बेहतर काव्य सृजन का दम भी तो नहीं दिखायी देता है? निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध जैसे कवियों का नितांत अभाव है।

-हां, यह बात सही है। निराला, मुक्तिबोध नहीं पैदा हो रहे हैं। लेकिन कुछ लोग अच्छा लिख रहे हैं। मैं पहले भी कह चुका हूं कि कविता तभी प्रसिद्ध होती है, जब वह उपयोगी होगी। अंग्रेजों की भाषा पहले फ्रेंच थी, लेकिन जब जॉन मिल्टन, विलियम शेक्सपियर जैसे महान कवियों ने अंग्रेजी में रचनाएं की, तो उन्हें भी अंग्रेजी अपनानी पड़ी। भाषा के उन्नयन के लिए साहित्य का श्रेष्ठ होना आवश्यक है। इन दिनों हंसाने वाली कविताएं ज्यादा लिखी जा रही हैं, लेकिन गंभीर साहित्य का अभाव हिंदी प्रेमियों को स्पष्ट दिखायी देता है। हां, गद्य में काम ज्यादा हुआ है। श्रीलाल शुक्ल, गोपाल चतुर्वेदी जैसे साहित्यकार बढ़िया काम कर रहे हैं।

इसका कारण क्या है?

-इसका कारण यह है कि लोग पढ़ना नहीं चाहते। हम लोगों ने जब इस क्षेत्र में कदम रखा था, तो हमारे बुजुर्ग बार-बार खूब पढ़ने को कहते थे। दूसरे कवियों की रचनाएं पढ़नी पड़ती थीं। उर्दू में तो एक परंपरा ही है कि वे अपने शार्गिद को सात-आठ सौ गजलें याद करा देते हैं, ताकि वे मुहावरों और कहावतों से परिचित हो जायें। वे भाषा का स्वरूप समझ लें। उर्दू में तो आज भी ‘इस्लाह’ और ‘सलाह’ के बिना मंचों पर उतरने की इजाजत नहीं मिलती। लेकिन पंडित हरिशंकर शर्मा अकसर कहा करते थे कि हमारे यहां तो ‘एक इंच काता और लेकर दौड़े जुलाहे के पास, कपड़ा बुन दो’ वाली स्थिति है। एक कविता क्या लिखी कि दौड़ लिए मंचों की ओर। यह स्थिति काफी दुखद है।


कृते गीत-स्वतंत्रता उवाच
मैं नहीं आयी यहां, बहकी हवाओं की तरह
पीढ़ियों के सर चढ़े बलिदान ले आये यहां।

जन्म तो मेरा हुआ संकल्प के ही वंश में
ये सहज संयोग है, मैं शक्ति के हाथों पली
खुशबुओं के घर बसाने थे, मुझे हर हाल में
दम-बदम मुझको खली है हर कली की बेकली
हो न हो स्वीकार तुमको, पर सचाई है यही
वे शहादत से जगे श्मशान ले आये मुझे।

पांव मेरे पड़ न पाये बंद गलियों में कभी
वास्ता कुछ भी नहीं मेरा उठी दीवार से
रास आ पाई न मुझको नफरतों वाली घुटन
मैं सदा फलती रही हूं प्यार की बौछार से
मजहबी कोहर न जिसकी राह पर छाया कभी

मंजिलों तक धूप के फरमान ले आये मुझे।

रह सकूंगी मैं न पलभर ध्वंस की चौपाल पर
कब सुहाया है मुझे ओछे समय का आचरण
लोग माने या न माने, शर्त मेरी है यही
कर सकेगा बस सृजन का पुत्र ही मेरा वरण
स्वार्थ की शैया बुलाती तो न मैं आती कभी
फांसियों पर झूलते अरमान ले आये मुझे।
कुछ कमी छोड़ी नहीं थी जाफरो-जयचंद ने
लोग थे, जो कारवां अपना नहीं रुकने दिया
वे निहत्थे ही लड़े हर बार अंधे जुल्म से
लाठियां खाते रहे, परचम नहीं झुकने दिया
देश आधा तन ढके आवाज देता था मुझे
वे अहिंसा सत्य के संधान ले आये मुझे।

बोल मत सिंहासनों से
बोल मत सिंहासनों से, वे अंधेरों से घिरे हैं
सूर्य का आकाश देगी सिर्फ मृगछाला तुझे

रोशनी के नाम कोई दिन न होगा
यह अनोखी त्रासदी है इस सदी की
ग्रंथ सारे दीमकों ने चाट डाले
अब न परिभाषा रही नेकी-बदी की
तू स्वयं में कुछ नहीं है, फैसला इस बात पर है-
किस तुला पर तौलता है तौलने वाला तुझे।

दीप होकर आंधियों के साथ रहना
इस सफर में आदमी की बेबसी है
भोर का संकल्प है संबल हमारा
जन्म से ही जिंजगी जिसमें कसी है
कंठ से स्वीकार ह ोगा जब गरल का आचमन तो-
धारनी होगी गले में शब्द की माला तुझे।

फूल तो चाहे अकेला ही खिला हो
पर चमन में शूल इकलौता नहीं है
जिंदगी तो है चुनौती पर चुनौती
मावसों से संधि समझौता नहीं
तू भले सात समंदर मुट्ठियों में बांध ले पर
चैन से रहने न देगी वक्त की ज्वाला तुझे।

Monday, June 7, 2010

'टाईअप-ब्रेकअपÓ का खेल

मैं पार्क में पहुंचकर सीमेंट की बेंच पर बैठा ही था कि बगल में खाली स्थान पर एक चौदह वर्षीय लड़की आकर बैठ गयी। उसकी आंखें नम थीं। लगा कि वह कुछ देर पहले रो रही थी। मैं पार्क में जमा जोड़ों की अठखेलियां निहारने में मशगूल हो गया। पार्क की खूबसूरती बढ़ाने के लिए जगह-जगह झाडिय़ों को काट-छांटकर विभिन्न पशुओं की आकृतियां प्रदान की गयी थी। पार्क से कुछ दूर बैठा एक प्रेमी युगल आपस में चुहलबाजियां कर रहा था। तभी मेरा ध्यान उस लड़की की ओर गया। वह सुबक रही थी। मुझे लगा कि एक अच्छे नागरिक होने के नाते उससे उसका दुख-दर्द पता करके यदि संभव हो, तो दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। मैंने उससे सहानुभूतिपूर्वक पूछा, 'क्या हुआ...तुम रो क्यों रही हो? कोई परेशानी हो, तो बताओ। मैं दूर करने का प्रयास करूंगा।Óउसने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, 'अंकल...आप मेरी परेशानी नहीं दूर कर सकते।Óमैंने भी हाकिमताई बनने का पूरा फैसला कर लिया था। सो मामले की पूंछ पकडऩे की कोशिश में लगा रहा, 'फिर तुम रो क्यों रही हो?Ó
'दरअसल...आज ही मेरा अपने ब्वायफ्रेेंड से ब्रेकअप हो हुआ है। उसकी याद आ रही थी, तो आंसू नहीं रोक पायी।Ó कहकर लड़की सामने बैठे प्रेमी युगल को निहारने लगी।मैं चौंक उठा। उसे एक बार गौर से निहारा। सोचा, बाप रे बाप...छंटाक भर की इस छोकरी को मुझ अपरिचित से अपने ब्वायफ्रेेंड के बारे में चर्चा करने में झिझक नहीं हुई। मुझे अपना जमाना याद आया, जब आशिक दीदार-ए-यार के लिए घंटों माशूका के घर के चक्कर लगाया करते थे। 'जान-ए-जिगरÓ की एक झलक देखने को आशिक जेठ की दोपहरी में घंटों छत पर बैठे टकटकी लगाये रहते थे और दूर से ही दीदार हो जाने पर इस तरह खुश होते थे मानो कारू का खजाना मिल गया हो। दीदार को घंटों छत पर खड़े रहने से आंखें बटन हो जाती थीं। माशूका के भाई, बहन या मां-बाप, अड़ोसी-पड़ोसी को तो छोडि़ए, अपने ही भाई-बहन या अड़ोसी-पड़ोसी के देख लेने पर पिटने का खतरा था। कई बार तो 'वन वे ट्रैफिकÓ होने पर माशूका के हाथों पिटने की नौबत तक आ जाती थी, लेकिन मजनूं इसे भी लैला की एक अदा मानकर जी-जान न्यौछावर करने को तैयार रहते थे।
मामले की संवेदनशीलता जानते-बूझते हुए भी मैंने टांग अड़ा दी। हालांकि कई बार तो ऐसे मामले में टांग के शहीद होने का खतरा ज्यादा रहता है, 'तुम्हें इस उम्र में इन फालतू बातों पर ध्यान देने की बजाय पढ़ाई करनी चाहिए। यह कोई उम्र है इश्क फरमाने की।Óलड़की मेरी बेवकूफी पर हंस पड़ी। बोली, 'अंकल...यह गाना तो आपके ही जमाने में गया था...यार बिना चैन कहां रे...इश्क की कोई उम्र नहीं होती...जब हो जाये, समझो...वही उम्र सही है।Ó
'तुम्हारा उससे यह निगोड़ा इश्क कब से चल रहा था?Ó मैंने दरियाफ्त करने की नीयत से पूछा।
लड़की मानो अतीत में खो गयी। उसने कहा, 'यह मेरा सातवां ब्वायफ्रेेंड था। चार महीने पहले वह मेरा ब्वायफ्रेेंड बना था। उससे पहले नीलेश सपना का ब्वायफ्रेेंड था। सपना मेरे से दो क्लास आगे यानी कि दसवीं में पढ़ती है। सपना का नीलेश छठा ब्वायफ्रेेंड था और सपना नीलेश की नौवीं गर्लफ्रेेंड थी। अंकल...आप ऊंट की आकृति वाली झाड़ी के पास स्थित बेंच पर बैठे उन दोनों लड़के-लड़की को देख रहे हैं...वह लड़का मेरा एक्स ब्वायफ्रेेंड नीलेश है। उसके साथ मनोरमा है...जो मेरी सहेली की बहन है। कल ही मनोरमा और नीलेश का 'टाईअपÓ हुआ है।Ó इतना कहकर लड़की चुप हो गयी। उसकी आंखें नम हो गयीं।
'और नीलेश का नंबर कितना था?Ó मेरी उत्सुकता ने यह सवाल करने को मजबूर कर दिया। हालांकि इस मामले में मैं एहसास-ए-कमतरी (माइनॉरिटी कांप्लेक्स) के बोझ से दबा जा रहा था। मुझे अपने जवानी के वे दिन याद आ गये, जब छबीली से आंखें चार होने के बावजूद उसके सामने इजहार-ए-इश्क की हिम्मत नहींजुटा पाया। नतीजतन...घर परिवारवालों ने जिसके पल्ले बांध दिया, अब तक बिना चूं-चपड़ किये उसी के इर्द-गिर्द कोल्हू के बैल की तरह आंखों पर पट्टी बांधे घूम रहा हूं। रोज सुबह उठकर बेगम अपनी किस्मत को कोसती हैं और मैं अपनी गल्ती पर पछताता हूं कि काश! मैंने थोड़ी सी हिम्मत दिखायी होती...? ऐसे में लड़कपन से ही आंखें लड़ाने वाली इस बित्ता भर की छोकरी के हिम्मत की दाद दिये बिना मैं नहीं रह सका।
वह कुछ देर सोचने के बाद बोली, 'नीलेश शायद सातवां था...अगर प्रदीप को भी ब्वायफ्रेेंड में गिना जाये, तो आठवां...प्रदीप से मेरा अफेयर सिर्फ एक सप्ताह चला था। उसके बाद वह शालिनी के चक्कर में फंस गया और मेरी उसकी बात खत्म हो गयी थी।Óमैंने फिर सवालों का गोला दागा, 'तुम्हारा पहला अफेयर...मेरा मतलब है कि तुम्हारा पहला टाईअप कब और किससे हुआ था?Ó
'मैं पांचवींक्लास में मेरा पहला अफेयर क्रिस्टीना के कजन डेविड से हुआ था। क्रिस्टीना मेरी क्लासफेलो थी। अब वह हैदराबाद में पढ़ती है। छह महीने तक यह अफेयर चला था। इसके बाद परमजीत अच्छा लगने लगा। परमजीत ने मेरे लिए किरणजोत को छोड़ दिया।Ó'क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस उम्र में तुम्हें यह सब कुछ नहीं करना चाहिए? अभी तुम्हारी पढऩे-लिखने की उम्र है, मन लगाकर पढ़ाई करो...अपना भविष्य सुधारो। पढ़-लिखकर कुछ बन जाओ...तब यह सब करना।Ó मैंने अपना धर्म निभाया और उसे उपदेश की घुट्टी पिलाई।
'अंकल...क्या आपको नहीं लगता कि कैरियर बनते-बनते मैं बूढ़ी हो जाऊंगी। 28-29 साल की उम्र कैरियर बनाने में निकल जायेंगे। हो सकता है कि उससे पहले ही मम्मी-डैडी किसी बेवकूफ के साथ बांध दें, तब अफेयर करने का मौका कहां मिलेगा। न...बाबा..न...मैं यह रिस्क नहीं ले सकती। जितने दिन मौज-मस्ती की जा सकती है, उतने दिन खूब जमकर करूंगी। उसके बाद तो कोल्हू का बैल बनना ही है।Ó लड़की काफी समझदार हो गयी थी।
'तुम्हारे मम्मी-डैडी को तुम्हारी इस 'करतूतÓ का पता है?Ó मैं सवाल पूछे बिना नहीं रह पाया।
'हां...नीलेश के बारे में मम्मी को पता है। उन्होंने डांट भी लगायी थी। लेकिन जब मेरी क्लास की सारी सहेलियां अपने ब्वायफ्रेेंड के बारे में चर्चा करती हैं, तो मुझसे रहा नहीं जाता और किसी न किसी से अफेयर कर बैठती हूं। आपको पता नहीं होगा, मेरे मम्मी-डैडी ने लव मैरिज की थी। मेरे डैडी मम्मी के आठवें ब्वायफ्रेेंड थे और मेरे डैडी की ग्यारहवींप्रेमिका मम्मी थीं। लेकिन उनकी लव मैरिज सिर्फ तीन साल चली, बाद में दोनों ने डाइवोर्स ले लिया।Ó लड़की के चेहरे पर न चाहते हुए भी दर्द उभर आया। लेकिन यह दर्द ज्यादा देर तक नहीं टिक सका।
मैंने पूछा, 'अब आगे क्या इरादा है?Ó
लड़की ने चुहुल भरे अंदाज में कहा, 'सोचती हूं...अब आपको अपना ब्वायफ्रेेंड बना लूं। आप दूसरों के मुकाबले कहीं अच्छे साबित हो सकते हैं।Ó
उसकी बात सुनते ही मुझे झटका लगा। बेगम का रौद्र रूप याद आया और मैं झटके से उठ खड़ा हुआ, 'मुझे काफी देर हो गयी है बैठे-बैठे। चलता हूं घर पर बेगम इंतजार कर रही होंगी।Ó इतना सुनते ही लड़की खिलखिलाकर हंस पड़ी। मैंने जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाये और पार्क से बाहर हो गया। पार्क के बाहर निकलते-निकलते पीछे मुड़कर देखा। लड़की काफी देर से पीछे बैठे एक लड़के का हाथ पकड़े उसकी बाइक की ओर बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर 'ब्रेकअपÓ का दर्द नहीं, बल्कि नए 'टाईअपÓ की खुशी थी।

Sunday, June 6, 2010

कंपनियों का मुनाफा और हमारा विनाश


मुनाफा कमाने की होड़ में लगी राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुनाफा कमाने की होड़ के चलते हमारे देश की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की जैव विविधता खतरे में है। कई वनस्पतियां हमारे बीच से विलुप्त हो चुकी हैं। चिडिय़ा गौरेया, फाख्ता, गिद्ध, कौवे, गंगा में पायी जाने वाली डाल्फिन सहित कई प्रजाति की मछलियां, मेंढक, सांप आदि कल तक हम सबके जीवन का हिस्सा थे, लेकिन आज वे खोजने पर भी नहीं मिलते। नील गाय, मोर, गीदड़, सियार, रोही बिल्ली, पाटा गोह, उडऩे वाली गिलहरी, खनखजूरा, विभिन्न प्रकार के मेंढक अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसका कारण जैव विविधता वाले क्षेत्र यानी प्रकृति में पाये जाने वाले सूक्ष्मतम और विशालतम जीव जंतुओं के जीवन चक्र क्षेत्र में लगातार और अनियंत्रित रूप से बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप है। नदियों और समुद्रों में पाये जाने वाले जीव जंतु बड़े पैमाने पर शिकार और अनुकूल परिस्थितियां न रहने के कारण विनष्ट होते गये। खेती-बाड़ी में उपयोग होने वाले रासायनिक उवर्रकों के चलते प्रकृति के मित्र समझे जाने वाले कीट-पतंग या तो नष्ट हो गये या फिर उनकी प्रजननक्षमता कम हो गयी। नतीजा यह हुआ कि वे धीरे-धीरे हमारे बीच से विलुप्त हो गये, जब तक हमें पता लगता, मामला काफी गंभीर हो चुका था। मोबाइल टावरों, हवाई जहाजों से निकलने वाली तरंगों ने हमारी जैव विविधता को कम नुकसान नहीं पहुंचाया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पशु-पक्षियों के संरक्षण को लेकर सक्रिय संस्था आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन फार नेचर) की रिपोर्ट चौंकाती ही नहीं, प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदें को डराती भी है। आईयूसीएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में पाए जाने वाले जीवों में से एक तिहाई विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह खतरा हर दिन बीतने के साथ बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट में किहांसी स्प्रे टोड के बारे में खास तौर पर चर्चा की गयी है जिसके मुताबिक मेंढक की यह प्रजाति इसलिए विलुप्त हो गयी क्योंकि जिस नदी में इनका निवास था, उस नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध बना दिया गया। पानी के बहाव में कमी आने से ये मेंढक खत्म हो गये। ठीक ऐसा ही हमारे देश में भी हुआ। गंगा, यमुना, राप्ती और व्यास आदि नदियों और उसके किनारे रहने वाले जीव जंतु पानी कम होने की वजह से या तो नष्ट हो गये या भविष्य में नष्ट हो जायेंगे।
आईयूसीएन के रिपोर्ट के मुताबिक महासागरों की हालात काफी चिंताजनक है। रिपोर्ट से पता चलता है कि समुद्री प्रजातियों में से ज्यादातर जीव-जंतु अधिक मछली पकडऩे, जलवायु परिवर्तन, तटीय विकास और प्रदूषण की वजह से नुकसान का सामना कर रहे हैं. शार्क सहित कई समुद्री प्रजाति के जलीय जीव, छह-सात समुद्री प्रजातियों के कछुए विलुप्त होने के कगार पर हैं। चट्टान मूंगों की 845 प्रजातियों में से 27 प्रतिशत विलुप्त हो चुकी हैं, 20 प्रतिशत विलुप्त के निकट हैं। समुद्री पक्षियों पर खतरा कुछ अधिक है। स्थलीय पक्षियों के 11.8 प्रतिशत की तुलना में 27.5 प्रतिशत समुद्री पक्षियों पर विलुप्त होने के खतरा अधिक है। थार की पाटा गोह हो या फोग का पौधा, गंगा की डाल्फिन हो, हिमालय के ग्लेशियर हों या तंजानिया का का किहांसी स्प्रे मेंढक, सब पर खतरा मंडरा रहा है। भारत में 687 पौधे और इतने ही जीवों पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं।
आईयूसीएन की रेड लिस्ट बताती है कि 47,677 में से कुल 17,291 जीव प्रजातियां कब खत्म हो जायें, कहा नहीं जा सकता है। इसमें 22 प्रतिशत स्तनधारी जीव हैं, 30 प्रतिशत मेंढकों की प्रजातियां हैं, इसमें 70 प्रतिशत पौधे और 35 प्रतिशत सरीसृप जैसे जीव हैं। भारत में ही पौधे और वन्य जीवों की कुल 687 प्रजातियां लुप्त होने वाली हैं। इनमें 96 स्तनपायी, 67 पक्षी, 25 सरीसृप, 64 मछली और 217 पौधों की प्रजातियां हैं।
इन प्रजातियों पर सबसे बड़ा खतरा मुनाफा कमाने की होड़ में लगी देशी और विदेशी कंपनियों से है। जैव विविधता पर सबसे ज्यादा हमला करने वाली कंपनियां अमेरिका, रूस, चीन जैसी विकसित देशों की हैं। यही वजह है कि ये विकसित देश दुनिया भर के विकासशील देशों और उनमें बसे लोगों को आगाह कर रहे हैं कि जैव विविधता और ग्लोबल वार्मिंग के चलते इससे पृथ्वी पर एक भीषण खतरा मंडरा रहा है। बेमौसम बरसात, आंधी-पानी, बर्फबारी, भूकंप और ज्वालामुखी का सक्रिय होना, ग्लोबल वार्मिंग का ही नतीजा है। जैव विविधता पर बढ़ते संकट के चलते दुनिया भर में समुद्र, नदियों, पहाड़ों और मैदानों में रहने वाले हजारों जीवों का संकट खतरे में हैं। जीव-जंतुओं की हजारों प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं, हजारों विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह बात भी सही है। मजेदार बात तो यह है कि इस बात को चीख वही लोग कह रहे हैं, जो जैव विविधता पर लगातार बढ़ रहे खतरे और ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा दोषी हैं। विकसित देश दुनियाभर में स्थापित अपनी कंपनियों के माध्यम से न तो जैव विविधता के दोहन पर रोक लगाने को और न ही ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारण कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को कम करने को तैयार हैं। वे विकासशील देशों को प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम करने और कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन घटाने की घुड़की देते रहते हैं।
भारत में सरकार की लापरवाही और लोगों की अनभिज्ञता के चलते जैव विविधता पर खतरा कुछ ज्यादा ही मंडरा रहा है। सरकार के ढुलमुल रवैया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि भारत के दक्षिण पूर्व में स्थित मन्नार की खाड़ी से करोड़ों रुपये का समुद्री शैवाल निर्यात करने वाली कंपनी पेप्सी राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के दबाव के चलते रायल्टी दे भी तो सिर्फ 38 लाख रुपये। अभी पिछले महीने पर्यावरण और वन राज्य मंत्री जयराम रमेश ने एक कार्यक्रम में बड़े गर्व से कहा था कि पेप्सी से हुए करार के तहत समुद्री शैवाल के निर्यात के लिए उससे 38 लाख रुपये की रायल्टी हासिल की गयी है। इस राशि को उस स्थानीय समुदाय के बीच वितरित किया जायेगा, जहां से पेप्सी कंपनी समुद्री शैवाल का निर्यात करती है। करोड़ों रुपये का सालाना कारोबार करने वाली कंपनी से सिर्फ 38 लाख रुपये की रायल्टी वसूल लेना वाकई काबिलेतारीफ है। पेप्सी जैसी विभिन्न कंपनियां जिस समुद्री शैवाल का सिंगापुर, मलेशिया और अन्य देशों में निर्यात करती हैं, उस शैवाल को भारत के दक्षिण पूर्व में स्थित मन्नार की खाड़ी से निकाला जाता है। मन्नार की खाड़ी के आसपास रहने वालों के बीच जब यह रायल्टी (38 लाख रुपये) वितरित किये जायेंगे, तो स्थानीय समुदाय के लोगों को कितनी रकम प्राप्त होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इससे इनका कितना भला हो पायेगा, यह भी विचारणीय प्रश्न है।
अब दुनिया के 193 देशों के प्रतिनिधि आगामी अक्टूबर 2010 में जापान के नागोया शहर में जैव विविधता पर अंतरराष्ट्रीय संधि करने जा रहे हैं। इससे पहले विभिन्न मुद्दों पर आम सहमति बनाने को जुलाई 2010 में कनाडा के मांट्रियाल में एक बैठक होगी। इन दोनों बैठकों में जो भी फैसले होंगे, उसके आधार पर नई दिल्ली में सन 2012 के अक्टूबर महीने में होने वाली कॉप-11 (कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज) की 11वीं बैठक में जैव विविधता पर अंतरराष्ट्रीय संधि होगी जिसका पालन करने को सभी वार्ताकार बाध्य होंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि दिल्ली में होने वाली कॉप-11 की बैठक का नतीजा वही तो नहीं होगा जो अभी कुछ महीने पहले ग्लोबल वार्मिंग को लेकर कोपेनहेगन में होने वाली बैठक का हुआ था। अपने-अपने हितों की सुरक्षा को लेकर अड़े विकसित देशों के अडिय़ल रवैये के चलते कोपेनहेगन में होने वाली यह बैठक सफल नहीं हो पायी थी।

चिरकुट

'नहीं...मैं जो कह रहा हूं। उसे समझो। मुझे कभी 'क्रासÓ करने की कोशिश सपने में भी मत करना।Ó राजेंद्र को विनम्र होते देख दुर्गेश के क्रोध का पारा चढऩे लगा था।
शिवाकांत अपनी सीट पर बैठा यह कौतुक देख सुन रहा था। उसे राजेंद्र से सहानुभूति हो रही थी। अभी कुछ ही देर पहले वह समाचार संपादक तिवारी के सामने लगभग ऐसी ही परिस्थितियों से जूझ रहा था। इस वजह से राजेंद्र के प्रति सहानुभूति मानव स्वभाव के अनुरूप थी। वह अपनी सीट से उठा और दुर्गेश के सामने आ खड़ा हुआ। उसने बिना पूछे सामने पड़ी एक कुर्सी घसीटी और विराजमान हो गया। डा. दुर्गेश ने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। उसने डा. दुर्गेश से कहा, 'क्या डा. साहब! अब जाने भी दीजिए...कहां आप...? लखनऊ की पत्रकारिता जगत के वटवृक्ष और कहां प्रशिक्षु संवाददाता राजेंद्र...जर्नलिज्म के क्षेत्र में नवांकुर... यह आपको क्या क्रास करेगा।...और फिर जब आपका बड़े-बड़े बाल बांका नहीं कर सके, तो फिर यह बेचारा प्रशिक्षु संवाददाता आपका क्या 'उखाड़Ó लेगा।Ó
शिवाकांत ने मजाक करते हुए कहा। वह राजेंद्र की ओर घूमा, 'जाओ यार! खबरें लिखो। सुप्रतिम आता ही होगा।...खबरें न मिलने पर वह भी 'झांय-झांयÓ करेगा।Ó शिवाकांत ने 'झांय-झांयÓ शब्द पर जोर दिया।
शिवाकांत के बीच में पडऩे से राजेंद्र ने मुक्ति की सांस ली। शिवाकांत की इसी आदत से कुछ वरिष्ठ नाराज रहते थे। जब भी कोई वरिष्ठ अपने किसी कनिष्ठ साथी को 'कसनेÓ की कोशिश करता, वह बीच में पड़कर कनिष्ठ साथी को बचा लेता। इससे वरिष्ठ सहकर्मी आहत हो जाते। उन्हें लगता कि कनिष्ठ के सामने उसे औकात बताने की कोशिश की जा रही है। शिवाकांत का मामले के बीच कूद पडऩा, उन्हें आहत कर जाता। कई बार तो साथियों से झगड़ा होते-होते बचता। उसके दूसरे साथी कभी संकेतों ेसे, तो कभी खुलकर समझाते, लेकिन वह इस मामले में चिकना घड़ा घड़ा साबित होता। कई बार वह मूड ठीक होने पर स्वीकार भी करता कि उसका लोगों के मामले में टांग अड़ाना अनुशासन की दृष्टि से गलत है। लेकिन जैसे ही कोई मामला उसके सामने आता, एक अजीब सी सनक उस पर सवार हो जाती। वह अपनी उस बात को भूल जाता और वरिष्ठ साथियों से पहले की तरह भिड़ जाता। उसके शुभचिंतक समझाते, 'देखो! अपने से कनिष्ठ साथियों के सख्ती से पेश आना, उन्हें थोड़ा बहुत प्रताडि़त करना, उत्पीडऩ नहीं है। यह अनुशासन बनाये रखने को जरूरी है। यह सब तो पत्रकारिता के निजाम का एक हिस्सा है। ऐसा होता आया है, भविष्य में भी इस पर रोक लगने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। और फिर यह मानवाधिकारों के हनन का भी कोई मामला नहीं है जिसके पीछे तुम लट्ठ लेकर घूमो। तो फिर तुम बेवजह सिरदर्द क्यों मोल लेते हो।Ó
शिवाकांत उखड़ जाता, 'निजाम का हिस्सा नहीं 'येÓ है।Ó वह एक अंग विशेष का नाम लेकर अपना गुस्से का इजहार करता।
दुर्गेश पांडेय ने राजेंद्र को अपनी सीट पर जाने का इशारा किया, तो वह कारागार से छूटे बंदी की तरह भाग निकला। डा. दुर्गेश ने चारों ओर निगाह दौड़ायी और फिर आगे की ओर झुकते हुए मंद स्वर में बोले, 'तुम बड़े मौके पर आये शिवाकांत.... बेवजह अपने कनिष्ठ साथियों को डांटने-डपटने की अपनी आदत तो है नहीं, यह तो तुम जानते ही हो। लेकिन क्या करें, यह सब करना पड़ता है। कभी अपना हित साधने के लिए, तो कभी संपादक, डेस्क इंचार्ज या मालिक के कहने पर। शायद तुम्हें मालूम हो, इन दिनों राजेंद्र से सुप्रतिम अवस्थी किसी बात पर नाराज है। सुबह की मीटिंग में मामूली-सी गलती पर सुप्रतिम एक घंटे तक राजेंद्र को हौंकता रहा। बाद में मुझसे भी कहा कि मैं भी उसे बात-बेबात पर हौंकता रहूं।Ó
शिवाकांत मन ही मन मुस्कुराया। उसने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। कुछ देर बाद उसने पूछ ही लिया, 'पर गुरु...हौंकने का कोई कारण तो होगा। कोई भला बेवजह किसी को क्यों हौंकेगा?Ó
'कारण...कारण तो बस एक ही है और वह है 'डग्गा।Ó परसों एक टेक्सटाइल मिलवालों की ने एक प्रेस कान्फ्रेेंस बुलाई थी...ताज होटल में। आदित्य सोनकर की गैरमौजूदगी में यह बीट राजेंद्र देखता है। आदित्य उस दिन छुट्टी पर था। सुप्रतिम उस कान्फ्रेेंस में पीयूष को भेजना चाहता था, लेकिन राजेंद्र अड़ गया,'मेरी बीट है...मैं ही जाऊंगा, वरना इस बीट की कोई खबर कवर नहीं करूंगा।Ó मजबूरन सुप्रतिम को राजेंद्र की बात माननी पड़ी। तभी से सुप्रतिम राजेंद्र से खार खाया हुआ है।Ó
'लेकिन इसमें डग्गा कहां से आ गया?Ó
'इसमें डग्गा ही तो आया..Ó दुर्गेश ने मेज पर पड़ी पिन उठाकर दांत खुरचते हुए कहा, 'मिलवालों ने डग्गे में अच्छी क्वालिटी की एक लोई और सूटपीस दिया था। पीयूष कान्फ्रेेंस में जाता, तो फोटो के साथ खबर लगवाने का आश्वासन देकर दो-दो अदद डग्गे ले आता। एक अपने लिए...दूसरा सुप्रतिम के लिए...। लेकिन राजेंद्र यह डग्गा खुद हजम कर गया और डकार भी नहीं ली। आदित्य सोनकर का मामला सुप्रतिम और प्रदीप तिवारी से सेट है। डग्गा मिलने पर वह सुप्रतिम को बता देता है। पंद्रह दिन बाद तीनों मिलकर सारे 'डग्गेÓ आपस में बांट लेते हैं। लेकिन गड़बड़ उसी दिन होती है, जिस दिन यह बीट राजेंद्र के पास होती है। राजेंद्र डग्गे में हिस्सा देने को तैयार नहींहोता। मैंने कई बार संकेतों से समझाया भी कि कौन सी तुम्हारे बाप की कमाई से डग्गा आता है। दे दिया करो उसमें से हिस्सा..लेकिन वह माने तब न! राजेंद्र लालची भी तो बहुत है।Ó

Saturday, May 22, 2010

चिरकुट

अप्रैल के पहले हफ्ते में ही काफी गर्मी पडऩे लगी थी। सुबह से ही चलने वाली गर्म हवाएं पशु-पक्षियों और इंसानों को व्याकुल कर रही थीं। ग्यारह बजते-बजते सड़के जन शून्य हो जाती थीं। लोग मजबूरी में ही दोपहर को घर से निकलते थे। सुबह से ही कई कार्यक्रम निबटाने के बाद शिवाकांत दैनिक प्रहरी के दफ्तर पहुंचा, तो हांफ रहा था। स्कूटर स्टैंड पर खड़ा करने के बाद वह पहली मंजिल पर स्थित दफ्तर में पहुंचा, तो उसे राहत महसूस हुई। उसने अपनी कुर्सी पंखे के नीचे खिसकाई और कमीज के ऊपरी दो बटन खोलकर पसीना सुखाने लगा। थोड़ी देर बाद उसने कमरे में निगाह दौड़ायी। कोने में बैठी मंजरी उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रही थी। उसे अपनी ओर देखता पाकर उसने झट से अपनी कमीज के बटन बंदकर लिये। उसे अपनी ओर देखता पाकर उसमें खीझ पैदा हुई-'साली रंड़ी! आफिस में ऐसे सजकर आई है जैसे स्वयंवर रचाने आई हो।Ó
उसने मेज पर रखा पानी का गिलास उठाया और गटागट पी लिया। उस पर भी प्यास नहीं बुझी, तो उसने कोने में रखे जग से लेकर तीन गिलास पानी और पिया। उसने सोचा कि शीघ्रता से खबरें लिख ले, तो उसे अपनी स्पेशल स्टोरी पर काम करने का मौका मिल जायेगा। यही सोचकर शिवाकांत अपनी सीट पर आकर बैठा ही था कि चपरासी रामशरण ने आकर कहा, 'तिवारी जी आपको दो एक दफा पूछ चुके हैं। आप उनसे मिल लीजिए।Ó
शिवाकांत ने सरसरी निगाह रामशरण पर डालते हुए कहा, 'तुम चलो, मैं आता हूं।Ó'ठीक हैÓ कहकर रामशरण आगे बढ़ गया। शिवाकांत मेज पर रखी कलम को कमीज की जेब में खोंसते हुए बुदबुदाया, 'साले! काम ही नहीं करने देते। बाद में हौंकेेंगे....तुमने खबर इतनी देर से क्यों दी? तुम्हारे कारण अखबार देर से छूटा। समय-असमय बुलाकर अपने पास बिठाकर दरबार सजाओगे, तो कोई खबर समय पर क्या खाक लिखेगा। साला...दल्ला!Ó
शिवाकांत मरी सी चाल चलता हुआ समाचार संपादक प्रदीप तिवारी के चेंबर में पहुंचा। उसे आता देखकर तिवारी जी व्यस्त हो गये। यह उनकी पुरानी आदत थी। जब उन्हें अपना महत्व और किसी व्यक्ति की उपेक्षा करनी होती थी, तो वे उस व्यक्ति को बुलाकर सामने बिठा लेते और काफी देर तक व्यस्त होने का बहाना करते। सामने बैठा व्यक्ति ऊबकर कुछ पूछता, तो वे आंऽऽऽ...कहकर या तो फिर चुप्पी साध लेते या कह देते, 'बस थोड़ी देर रुको। अभी तुमसे बात करता हूं।Ó उन्होंने शिवाकांत को बैठने का इशारा किया और मेज पर रखा पुराना अखबार उठाकर पढऩे लगे। शिवाकांत कुछ देर तक उन्हें पढ़ता हुआ देखता रहा। फिर उसने पूछ लिया, 'भाई साहब! आप मुझे पूछ रहे थे?Ó
आंऽऽऽ....हांऽऽ.. कहकर तिवारी जी ने चौंकने का अभिनय किया। अखबार को मोड़कर एक तरफ रखते हुए उन्होंने शिवाकांत से पूछा, 'तो तुम कब जा रहे हो?Ó
'कहां जा रहा हूं....?Ó
'अरे वहीं....।Ó
'वहींकहां?Ó शिवाकांत ने प्रतिप्रश्न किया।
'वहींजहां तुम जा रहे हो?Ó
'मेरी तो समझ में नहींआ रहा है कि मैं कहां जा रहा हूं? अभी तो मैं कल ही सात दिन की छुट्टी के बाद लौटा हूं। अब मैं कहां जा रहा हूं, यह आप ही बता दें, भाई साहब!Ó, शिवाकांत खीझ उठा।
'सात दिन बाद लौटे हो, तभी तो पूछ रहा हूं कि कहां जा रहे हो?Ó, तिवारी जी अब भी खुलकर खेलने के मूड में नहीं थे। वे सोच रहे थे कि बिना कोई चाल चले ही सामने वाले को मात हो जाये, तो फिर बेकार में दिमाग खपाने से क्या फायदा। उन्हें अब इस शह और मात के खेल में मजा आने लगा था। वे चुप हो गये। उन्हें सामने वाली की चाल का इंतजार था।शिवाकांत समझ गया कि सामने बैठा समाचार संपादक उसे लपेटने के चक्कर में है। वह कुर्सी से उठता हुआ बोला, 'भाई साहब...आप लाल बुझक्कड़ी छोड़कर साफ-साफ बतायें कि मामला क्या है? वरना मैं चला...मेरे पास समय कम है और कई खबरें लिखनी है।Ó
तिवारी जी के पास अब खुलकर खेलने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहींबचा था। उन्होंने सामने झुककर खड़े शिवाकांत की बड़ी और गहरी आंखों में झांकते हुए कहा, 'देखो शिवाकांत! दाई से पेट नहीं छिपाया जाता। अगर तुम्हें जाना है, तो जाओ। लेकिन मर्दों की तरह...यह क्या बात हुई कि मां की बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी ली और पहुंच गये दिल्ली...जनसत्ता के दफ्तर में नौकरी मांगने। तुम क्या समझते हो, मुझे खबर नहीं होगी। मेरे भी सूत्र जनसत्ता के दफ्तर में हैं। मुझे तो यहां तक मालूम है कि तुम्हारी कब और किससे क्या-क्या बातें हुईं?Ó
अब यह सब कुछ शिवाकांत के लिए असह्यï हो उठा। क्रोधातिरेक में उसकी कनपटी लाल हो गयी। उसने भभके स्वर में कहा, 'तिवारी जी, एक बात आपको साफ-साफ बता दूं। आप दाई हों, तो हों। लेकिन मैं गर्भवती हो भी नहींसकता। जहां तक दैनिक जनसत्ता के दफ्तर में जाने की बात है, तो मैं वहां पिछले कई महीने से गया ही नहीं। वैसे आपके सामने स्पषटीकरण पेश करने की मुझे कतई आवश्यकता नहींहै। लेकिन फिर भी आपको बता दूं कि दैनिक जनसत्ता के दफ्तर में पहले भी आता-जाता रहा हूं, आगे भी आता-जाता रहूंगा। आपसे जो करते बने, कर लीजिएगा।Ó
इतना कहकर शिवाकांत मुड़ा और समाचार संपादक के चेंबर से बाहर आ गया। वह अपनी सीट पर पहुंचा, तब तक स्थानीय डेस्क के सभी संवाददाता आ चुके थे। अमितेश रावत, आदित्य सोनकर, दिवाकर शुक्ल अपनी खबरें लिखने में व्यस्त थे। स्थानीय डेस्क के इंचार्ज सुप्रतिम अवस्थी या तो आए नहींथे या हमेशा की तरह कहीं बैठे निंदा रस के आस्वादन में व्यस्त होंगे। डा. दुर्गेश पांडेय अपनी बीट के जूनियर साथी राजेंद्र शर्मा को ज्ञान दे रहे थे, 'तुम अपनी आदतें सुधार लो, वरना बहुत ज्यादा दिन नौकरी नहींकर पाओगे। मैं तो तुमसे तंग आ गया हूं।Ó
'आखिर मुझसे गलती क्या हुई? यह तो बताएंगे, सर!Ó राजेंद्र शर्मा ने असमंजस भरे स्वर में कहा। दरअसल उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी बीट का इंचार्ज उसे 'हौंकÓ क्यों रहा है। राजेंद्र शर्मा को दैनिक प्रहरी से जुड़े अभी कुछ ही महीने हुए थे। इससे पहले वह एक साप्ताहिक 'जमानाÓ का प्रतिनिधि रह चुका था। पत्रकारिता जगत के इस नवप्रशिक्षु पत्रकार में संभावनाएं कुछ अधिक हैं, इसका अंदाजा दुर्गेश को हो चुका था। पिछले सत्रह साल से दैनिक प्रहरी मं शिक्षा संवाददाता के रूप में जमे दुर्गेश अब तक कई संभावनाशील पत्रकारों का 'कामÓ लगा चुके थे। संपादक से लेकर अखबार के मालिक तक सबके प्रिय थे। दुर्गेश पांडेय अपने लिए 'डाक्टर साहबÓ कहलवाना पसंद करते थे।