Sunday, November 30, 2025

इससे अच्छा है कि मैं मर जाऊं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

प्रकृति ने किसी को अमर नहीं बनाया है। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मौत निश्चित है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड भी परिवर्तनशील है। आज है, करोड़ों-अरबों साल बाद इसी रूप में नहीं रहेगा। विनाश और विकास की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। जब किसी वस्तु का विनाश होता है, तो उसके स्थान पर नई वस्तु सामने आती है। सिकंदर के बारे में एक कथा कही जाती है। यह कथा सच नहीं है, लेकिन कुछ लोगों ने गढ़ ली है। 

कहते हैं कि विश्व विजेता कहे जाने वाले सिकंदर के मन एक बार अमर होने की लालसा पैदा हुई। लोगों की अमरता की कहानियां उसने सुनी थी। उसे किसी ने बताया था कि पृथ्वी पर कहीं ऐसा जल पाया जाता है जिसको पीने से व्यक्ति अमर हो जाता है। कथा बताती है कि उसने अपने जीते हुए राज्यों में उस अमृत जल की बहुत तलाश की। आखिरकार उसने एक गुफा में उस अमृत जल को खोज निकाला। 

वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उस गुफा में प्रवेश किया, तो देखा कि अमृत जल कल-कल की ध्वनि करता हुआ बह रहा था। उसने चुल्लू में पानी भरा और पीने लगा। तभी वहां मौजूद एक कौआ बोला, रुको। जल पीने की गलती मत करना। सिकंदर को बहुत गुस्सा आया। उसे अपने विश्व विजेता होने पर बहुत अभिमान था। उसने रोषपूर्वक उस कौए से कहा, तू मुझे जल पीने से रोकने वाला कौन है? 

उस कौए ने जवाब दिया। मेरी कहानी सुन लो, फिर तुम्हारी जो मर्जी हो, वह करना। एक दिन मैंने भी यह जल खोज निकाला था। जल पीकर मैं अमर हो गया। लेकिन मेरे पंख झड़ गए हैं, अंधा हो गया हूं। शरीर गल गया है। मैं मौत मांग रहा हूं, लेकिन मेरी मौत नहीं हो रही है। मेरी हालत देख लो, फिर तुम तय करना कि तुम्हें अमर होना है या नहीं। सिकंदर ने सोचा कि ऐसी अमरता को लेकर मैं क्या करूंगा? असहाय होकर जीने से अच्छा है कि मैं मर जाऊं। इसके बाद सिकंदर ने जल पीने का विचार त्याग दिया।

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