बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
अगर किसी को आलसी और कामचोर बनाना है, तो सबसे उत्तम यही होगा कि उसकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करना शुरू कर दो। धीरे-धीरे वह आदमी काम-धंधा छोड़कर पूरी तरह उस अनुदान पर निर्भर हो जाएगा, तो उसे दिया जा रहा है। आलसी आदमी यही सोचने लगेगा कि जब घर बैठे जरूरतें पूरी हो रही हैं, तो वह काम धंधा क्यों करे। एक राजा ने अपनी प्रजा के साथ ऐसा ही किया था।बहुत पुरानी बात है। एक राजा अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। वह अपने राज गुरु की बात बहुत मानता था। एक बार उसके मन में आया कि गरीब लोगों की मदद की जाए। उसने महल के बाहर सोने के सिक्कों से भरा थाल रखवाकर घोषणा की कि जिसको जरूरत हो, वह एक मुट्ठी सोने के सिक्के ले जा सकता है। नतीजा यह हुआ कि लोग काम-धंधा छोड़कर स्वर्ण मुद्रा लेने निकल पड़े।
कुछ दिनों बाद यह बात राजगुरु को पता चली, तोवह वेष बदलकर वहां पहुंचे। एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा ली और चल पड़े। थोड़ी दूर जाने के बाद वह लौटे और स्वर्ण मुद्रा जमीन पर पटक दी। पूछने पर राजगुरु ने कहा कि सोचता हूं, शादी कर लूं। लेकिन इतनी स्वर्ण मुद्रा से क्या होगा? तब राजा ने कहा कि एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और ले लो। थोड़ी दूर जाने के बाद वह फिर वापस आए और बोले, शादी करूंगा, तो घर भी चाहिए।
राजा ने एक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और लेने को कहा। इस बार भी वही हुआ। लौटने के बाद बोले, शादी के बाद बच्चे भी तो होंगे, उनका क्या करूंगा। राजा नेएक मुट्ठी स्वर्ण मुद्रा और लेने को कहा। तब राजगुरु असली वेष में आए और बोले, इस तरह स्वर्ण मुद्राएं बांटकर आप लोगों को आलसी बना रहे हैं। इन मुद्राओं का उपयोग लोगों को काम दिलाने में कीजिए तो बेहतर रहेगा। यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं।
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