Monday, July 20, 2026

गुरु बोले, तब मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हर गुरु की यही इच्छा होती है कि जो भी शिष्य उसके पास शिक्षा प्राप्त करने आए, वह बिल्कुल कोरा हो। एक दम खाली स्लेट की तरह। वह कुछ भी न जानता हो, तो गुरु को सिाखाने में काफी सहूलियत होती है क्योंकि जिसको शुरुआत से शिक्षा हासिल करनी है, वह गुरु की बातों को ध्यान से सुनेगा। जिसे थोड़ा बहुत ज्ञान होगा, वह गुरु से सवाल भी करेगा और संतुष्ट न होने पर वह गुरु पर अविश्वास भी करेगा। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक युवक रहता था। उसे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान था। वह अपने संगीत ज्ञान को बढ़ाना चाहता था। वह चाहता था कि अपने संगीत के ज्ञान से दुनिया को चमत्कृत कर दे। यह सोचकर वह एक महान संगीतज्ञ के पास गया। उसने संगीतज्ञ गुरु के सामने अपनी इच्छा प्रकट की। संगीतज्ञ ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि मैं तुम्हें संगीत सिखा दो दूंगा, लेकिन उसके लिए धन देना होगा। 

युवक ने गुरु से कहा, ठीक है। मैं आपको संगीत सिखाने का शुल्क जरूर दूंगा। गुरुदेव कितना शुल्क मुझे देना होगा। गुरु ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं। युवक ने कहा कि सौ स्वर्ण मुद्राएं हैं तो बहुत ज्यादा, लेकिन मैं प्रस्तुत कर दूंगा। वैसे भी मैं संगीत के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूं। यह सुनते ही गुरु ने कहा कि अब तो मैं दो सौ स्वर्ण मुद्राएं लूंगा। युवक ने कहा कि मैं थोड़ा बहुत जानता हूं, तो आपको कम शुल्क लेना चाहिए था क्योंकि मेहनत कम करनी पड़ेगी। आप शुल्क दोगुना कर रहे हैं। 

गुरु ने कहा कि जो तुमने थोड़ा बहुत सीख रखा है, उसको मिटाने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ेगी। अगर कुछ नया सीखना है, तो पुराने को मिटाना होगा। तभी तुम ठीक से सीख पाओगे। यह सुनकर युवक निरुत्तर हो गया।

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