अशोक मिश्रअरावली की पहाड़ियों ने सदियों से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली को प्राणवायु प्रदान की है। इनकी प्राकृतिक नालियों ने इन चारों राज्यों के भूगर्भ जल स्तर को बनाए रखने में सैकड़ों साल तक अहम भूमिका निभाई है। मानसूनी मौसम में इन नालियों के जरिये बरसाती पानी धरती के नीचे जाकर भूगर्भ जल स्तर को स्थिर रखता रहा है, लेकिन अब यह प्रक्रिया बाधित होने लगी है। लोगों ने इन नालियों पर अतिक्रमण करके स्वाभाविक प्रवाह को बाधित किया है जिसकी वजह से भूगर्भ जल स्तर घटता जा रहा है।
गुड़गांव से फरीदाबाद तक फैली अरावली की तलहटी में सैकड़ों प्राकृतिक नाले थे जो मानसून का पानी बिना किसी बाधा के यमुना और अन्य निचले क्षेत्रों तक पहुंचा देते थे। पिछले दो दशकों में इन नालों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। कॉलोनियां, इंडस्ट्रियल प्लॉट, सड़कें और रिसॉर्ट बन गए और नालों को पाटकर या मोड़कर कंक्रीट के नीचे दबा दिया गया। नतीजा सामने है। अब जब थोड़ी तेज बारिश होती है तो गुरुग्राम का साइबर सिटी, द्वारका एक्सप्रेसवे और फरीदाबाद के निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं।
पहले बरसात के दिनों में प्राकृतिक नालियों के माध्यम से जमीन पर उतरता था जिसे धरती सोख लेती थी। लेकिन अब अरावली के इर्द-गिर्द कंक्रीट का जंगल उग आने की वजह से अरावली की नालियों से निकला पानी सीधे नालों में चला जाता है और सारा पानी व्यर्थ चला जाता है। यही कारण है कि हरियाणा का भूजल स्तर संकट में आता चला जा रहा है। कई इलाके डार्क जोन में आ चुके हैं। बरसात के दिनों में कई जिलों में लोग पानी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है।
अरावली वन्यजीवों का कॉरिडोर है। नालों के बंद होने से जानवरों के पानी पीने के स्रोत खत्म हुए हैं और उनका प्राकृतिक रास्ता टूटा है। पानी और भोजन की तलाश में अब वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इस स्थिइत से बचने के लिए जरूरी है कि अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक नालियों की पहचान की जाए, उनको संरक्षित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले ही कह चुके हैं कि अरावली के सभी प्राकृतिक नालों की पहचान कर उन्हें प्रोटेक्टेड घोषित किया जाए।
सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन सर्वे से 2010 से पहले के नक्शों के आधार पर नालों की पुरानी जमीन चिह्नित की जा सकती है। अगर अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग को बचाया नहीं गया तो हर मानसून में राज्य के शहर डूबेंगे, भूजल और घटेगा और गर्मी और बढ़ेगी। सरकार, कोर्ट, नागरिक और उद्योग अगर मिलकर नालों को उनका रास्ता वापस दें तो अरावली फिर से हरियाणा की ढाल बन सकती है। नहीं तो हम हर साल बाढ़ और सूखे दोनों का दंश झेलते रहेंगे।
No comments:
Post a Comment